मिडिल ईस्ट पर मंथन: ट्रम्प-नेतन्याहू कि मुलाकात से क्या बदलेगा?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की बुधवार को व्हाइट हाउस में करीब दो घंटे तक बंद कमरे में लम्बी बातचीत हुई। यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई जब पश्चिम एशिया में तनाव, ईरान के साथ संभावित परमाणु समझौता, गाजा में जारी संघर्ष और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में हैं। बैठक के बाद ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि उन्होंने नेतन्याहू से स्पष्ट रूप से कहा है कि अमेरिका को ईरान के साथ परमाणु समझौते पर बातचीत जारी रखनी चाहिए। उनके अनुसार चर्चा सकारात्मक रही, लेकिन कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ। ट्रम्प ने यह भी जोड़ा कि यदि ईरान के साथ “अच्छा समझौता” संभव है तो वह बेहतर विकल्प होगा, अन्यथा आगे की रणनीति पर अलग से विचार किया जाएगा।

 

ट्रम्प ने अपने बयान में यह भी याद दिलाया कि पिछली बार जब ईरान के साथ समझौता नहीं हो पाया था, तब अमेरिका ने ‘ऑपरेशन मिडनाइड हैमर’ के नाम से सैन्य कार्रवाई की थी। इससे संकेत मिलता है कि कूटनीति और सैन्य विकल्प-दोनों को अमेरिकी नेतृत्व समानांतर रूप से देख रहा है। बैठक में गाजा की मौजूदा स्थिति और क्षेत्र में शांति प्रयासों पर भी चर्चा हुई। नेतन्याहू ने ट्रम्प से मुलाकात से पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से भी बातचीत की थी, जिससे यह स्पष्ट है कि इजराइल-अमेरिका समन्वय कई स्तरों पर चल रहा है।

Trump-Netanyahu meeting

नेतन्याहू का बयान और अमेरिका पर आरोप

इस मुलाकात से पहले 27 जनवरी को नेतन्याहू ने एक बयान में आरोप लगाया था कि अमेरिका की नीतियों के कारण इजराइल के कुछ सैनिकों की जान गई। टाइम्स ऑफ इजराइल के अनुसार, उन्होंने कहा था कि हमास के खिलाफ गाजा युद्ध के दौरान हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति रोक दी गई थी। उनके मुताबिक जरूरी सैन्य सामग्री की कमी से कुछ सैनिक मारे गए। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कितने सैनिकों की मौत इस कारण हुई। नेतन्याहू ने सीधे तौर पर पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन का नाम नहीं लिया, लेकिन संकेत दिया कि हथियारों की रोक उस समय समाप्त हुई जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बने।

 

‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ पर सख्त रुख

नेतन्याहू ने अलग फिलिस्तीनी देश की संभावना को भी खारिज किया है। उनका कहना है कि किसी भी स्थिति में एक स्वतंत्र फिलिस्तीन नहीं बनने दिया जाएगा। उन्होंने दोहराया कि इजराइल गाजा और कब्जे वाले वेस्ट बैंक पर नियंत्रण बनाए रखेगा, भले ही अन्य देश फिलिस्तीन को मान्यता दें। उन्होंने कहा कि तथाकथित ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ (द्वि-राष्ट्र समाधान) को लागू होने से उन्होंने बार-बार रोका है और आगे भी रोकेंगे। उनके अनुसार इजराइल जॉर्डन नदी से लेकर भूमध्य सागर तक सुरक्षा नियंत्रण बनाए रखेगा।

 

ईरान को लेकर भी नेतन्याहू ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने क्षेत्र में अपना एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप तैनात किया है। ट्रम्प अपने फैसले खुद लेंगे और इजराइल अपना, लेकिन यदि ईरान ने इजराइल पर हमला करने की “बड़ी गलती” की तो उसे ऐसा जवाब मिलेगा जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा होगा।

 

अमेरिका-इजराइल सैन्य सहयोग: आंकड़ों में तस्वीर

वॉर पावर इजराइल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका हर साल इजराइल को लगभग 3.8 अरब डॉलर (करीब 32,000 करोड़ रुपये) की सैन्य सहायता देता है। यह मदद मुख्य रूप से ‘फॉरेन मिलिट्री फाइनेंसिंग’ (FMF) के तहत दी जाती है। इसमें 3.3 अरब डॉलर सामान्य हथियार खरीद के लिए और 500 मिलियन डॉलर मिसाइल रक्षा प्रणाली के लिए शामिल हैं।

 

यह व्यवस्था 2016 में हुए 10 साल के समझौते (MOU) के तहत है, जो 2019 से लागू होकर 2028 तक चलेगा। इस समझौते के तहत कुल 38 अरब डॉलर की सहायता का वादा किया गया था, जो हर साल बराबर किस्तों में दी जाती है। यह समझौता ओबामा प्रशासन के दौरान हुआ था और अमेरिकी कांग्रेस हर साल इसे मंजूरी देती है।

 

अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने अतिरिक्त सहायता भी दी। 2023 से 2025 के बीच कुल 21.7 अरब डॉलर से अधिक की सैन्य मदद दी गई, जिसमें 2024 में 8.7 अरब डॉलर का विशेष पैकेज शामिल है। 2025 में भी सालाना 3.8 अरब डॉलर के आसपास सहायता जारी रही और मार्च 2025 में ट्रम्प प्रशासन ने इमरजेंसी अथॉरिटी के जरिए 4 अरब डॉलर की फास्ट-ट्रैक मदद दी। कुल मिलाकर, अक्टूबर 2023 से अब तक लगभग 17 से 22 अरब डॉलर या उससे अधिक की अतिरिक्त सहायता दी जा चुकी है।

 

सैन्य ताकत: रैंकिंग में इजराइल

जनवरी 2026 तक ग्लोबल फायर पावर (GFP) की रैंकिंग के अनुसार, इजराइल 145 देशों में 15वें स्थान पर है। उसका पावर इंडेक्स स्कोर 0.2661 है-यह स्कोर जितना कम होता है, सैन्य क्षमता उतनी अधिक मानी जाती है। इजराइल की सेना तकनीक, प्रशिक्षण और रणनीति के कारण मजबूत मानी जाती है। वहीं अमेरिका इस सूची में पहले स्थान पर है।

 

युद्ध की कीमत: सैनिकों की मौत

इजराइल-हमास संघर्ष 2023 से जारी है। इस अवधि में लगभग 900 से 1,150 इजराइली सैनिकों की मौत होने के आंकड़े सामने आए हैं। इजराइली अधिकारियों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नवंबर 2025 तक 922 सैनिकों की मौत की पुष्टि हुई थी। इनमें से 471 सैनिक गाजा में जमीनी और सीमा पर चलाए गए अभियानों में मारे गए। इजराइली सेना ने कुल 1,152 सैनिकों की मौत स्वीकार की है, जिनमें से अधिकांश 7 अक्टूबर 2023 के हमले और उसके बाद की कार्रवाई में मारे गए।

 

7 अक्टूबर से शुरू हुआ लंबा संघर्ष

7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजराइल में घुसपैठ कर करीब 251 लोगों को बंधक बना लिया। इसके जवाब में प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने युद्ध की घोषणा की और हमास के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया। दो साल से अधिक समय बीतने के बाद भी संघर्ष का असर गाजा में साफ दिखाई देता है।

 

रिपोर्टों के अनुसार, गाजा की 98% कृषि भूमि बंजर हो चुकी है और केवल 232 हेक्टेयर जमीन ही उपजाऊ बची है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वहां खेती को सामान्य स्थिति में लौटने में लगभग 25 साल लग सकते हैं। 23 लाख की आबादी में से 90% लोग बेघर हो चुके हैं। बड़ी संख्या में लोग पानी-बिजली के बिना अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं और आधे से ज्यादा आबादी भुखमरी की स्थिति में है। लगभग 80% इलाका सैन्य क्षेत्र में बदल चुका है।

 

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, गाजा में जमा 510 लाख टन मलबा हटाने में करीब 10 साल और 1.2 ट्रिलियन डॉलर की जरूरत पड़ सकती है। 80% इमारतें नष्ट हो चुकी हैं, जिससे 4.5 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान आंका गया है।

 

‘वैक्यूम बम’ के इस्तेमाल के आरोप

गाजा में इजराइल पर तथाकथित ‘वैक्यूम बम’ या ‘थर्मोबैरिक बम’ इस्तेमाल करने के आरोप लगे हैं। रिपोर्ट ‘द रेस्ट ऑफ द स्टोरी’ के अनुसार, ये बम दो चरणों में काम करते हैं। पहले चरण में हवा में ईंधन जैसा एयरोसोल बादल फैलता है, और दूसरे चरण में उसमें आग लगाई जाती है। इससे तेज विस्फोट होता है, आग का बड़ा गोला बनता है और आसपास की हवा तेजी से खिंचती है, जिससे दबाव में बड़ा अंतर पैदा होता है। इन विस्फोटों में तापमान 3,500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। एल्यूमिनियम और मैग्नीशियम जैसे तत्वों के कारण कुछ ही सेकेंड में शरीर को गंभीर क्षति हो सकती है। बंद स्थानों में इनका प्रभाव अधिक घातक माना जाता है।

 

मिलिट्री विशेषज्ञों और चश्मदीदों ने भी ऐसे हथियारों के इस्तेमाल की आशंका जताई है। गाजा की सिविल डिफेंस टीम ने 2,842 ऐसे फिलिस्तीनियों का रिकॉर्ड दर्ज किया है जिनके बारे में कहा गया कि दफनाने के लिए उनका कोई हिस्सा तक नहीं बचा। 3,500 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए गए हैं।

 

रिपोर्टों में तीन प्रकार के बमों का जिक्र किया गया है-

  • एमके-84 ‘हैमर’: लगभग 900 किलो का बम, जो अत्यधिक तापमान और दबाव पैदा कर सकता है।
  • बीएलयू-109 बंकर बस्टर: मजबूत ढांचों को भेदकर अंदर विस्फोट करता है।
  • जीबीयू-39: सटीक निशाना साधने वाला ग्लाइड बम, जिसके टुकड़े अल-तबिन स्कूल हमले के बाद मिलने का दावा किया गया।

हालांकि इन आरोपों पर अलग-अलग पक्षों के अपने-अपने दावे हैं, लेकिन मानवाधिकार संगठनों ने घनी आबादी वाले इलाकों में ऐसे हथियारों के इस्तेमाल को गंभीर मुद्दा बताया है।

 

सीजफायर के बाद भी तनाव

गाजा में औपचारिक सीजफायर लागू है और समझौते के 100 दिन पूरे होने के बाद यह दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है। इसके बावजूद 10 अक्टूबर 2025 से अब तक 500 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत की खबरें आई हैं। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, हजारों परिवार अब भी अपने लापता परिजनों की तलाश में अस्पतालों और मुर्दाघरों के चक्कर लगा रहे हैं। इस युद्ध में मरने वालों की संख्या 72,000 से अधिक बताई जा रही है।

 

निष्कर्ष:

व्हाइट हाउस में ट्रम्प-नेतन्याहू की मुलाकात केवल एक द्विपक्षीय बैठक नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति का प्रतिबिंब है। एक ओर ईरान के साथ संभावित समझौते पर चर्चा है, दूसरी ओर गाजा में जारी मानवीय संकट। अमेरिका-इजराइल सैन्य सहयोग मजबूत है और आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। वहीं युद्ध की मानवीय कीमत-सैनिकों की मौत, बेघर लोग, नष्ट शहर और बर्बाद अर्थव्यवस्था-चिंता का विषय बनी हुई है।

 

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कूटनीतिक प्रयास कितनी दूर तक जाते हैं और क्या क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में कोई ठोस पहल हो पाती है। फिलहाल, स्थिति यह दर्शाती है कि सैन्य शक्ति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण भी उतना ही जरूरी है।