अमेरिका में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ को लेकर बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। अमेरिकी इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट ने आदेश दिया है कि इन टैरिफ से वसूली गई बड़ी रकम कंपनियों को वापस की जाए। कोर्ट के इस फैसले के बाद अमेरिकी सरकार को लगभग 14.5 लाख करोड़ रुपये तक की राशि लौटानी पड़ सकती है।
यह फैसला उस समय आया है जब पहले ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ फैसले को लेकर सख्त टिप्पणी कर चुका है। अदालतों का मानना है कि राष्ट्रपति को अपने स्तर पर इतने बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है।
कंपनियों को वापस मिलेगा पैसा
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक इन टैरिफ के जरिए करीब 10.79 लाख करोड़ रुपये वसूले जा चुके थे। अब अदालत के आदेश के बाद कुल रिफंड की राशि लगभग 14.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट के जज रिचर्ड ईटन ने आदेश दिया कि जिन मामलों में अभी तक अंतिम फैसला नहीं हुआ है, उनमें टैरिफ को हटाकर आयात शुल्क की नई गणना की जाए। इसका मतलब है कि जिन कंपनियों से यह शुल्क लिया गया था, उन्हें अब उस रकम का बड़ा हिस्सा वापस मिल सकता है।
एक कंपनी की याचिका से खुला रास्ता
यह पूरा मामला टेनेसी राज्य के नैशविल शहर की कंपनी एटमस फिल्ट्रेशन द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था। यह कंपनी फिल्ट्रेशन से जुड़े उत्पाद बनाती है और उसने कोर्ट में दावा किया कि उससे वसूला गया टैरिफ गैरकानूनी था।
अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए माना कि यदि टैरिफ वैध नहीं है, तो कंपनियों से वसूली गई रकम वापस की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही दे चुका है झटका
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ को रद्द कर दिया था। अदालत ने साफ कहा था कि टैरिफ तय करने का अधिकार अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के पास होता है, न कि राष्ट्रपति के पास।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी टिप्पणी की थी कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध की स्थिति में नहीं है कि ऐसे आपातकालीन कानूनों का इस्तेमाल कर टैरिफ लगाए जाएं।
हालांकि इस फैसले से तीन जजों ने असहमति जताई थी। इनमें जस्टिस सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ शामिल थे।
जज कैवनॉ की अलग राय
जस्टिस ब्रेट कैवनॉ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह बहस अलग है कि टैरिफ नीति सही थी या नहीं, लेकिन उनके अनुसार इसे पूरी तरह गैरकानूनी कहना उचित नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ टैरिफ विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के तहत लगाए गए थे। अपने नोट में उन्होंने भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने के मुद्दे का भी जिक्र किया।
किस कानून का इस्तेमाल किया गया था
ट्रम्प प्रशासन ने ये टैरिफ लगाने के लिए इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट यानी IEEPA का इस्तेमाल किया था। यह कानून 1977 में बनाया गया था।
इस कानून का उद्देश्य यह था कि अगर अमेरिका को किसी विदेशी देश से गंभीर खतरा हो, तो राष्ट्रपति तुरंत आर्थिक कदम उठा सके। इसके तहत विदेशी संपत्तियों को फ्रीज करना, डॉलर ट्रांजैक्शन को नियंत्रित करना या व्यापार पर प्रतिबंध लगाना जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
अब तक इस कानून का इस्तेमाल 80 से ज्यादा बार किया जा चुका है, लेकिन टैरिफ लगाने के लिए इसका इस्तेमाल पहली बार ट्रम्प प्रशासन ने किया था।
निचली अदालतें पहले ही दे चुकी थीं संकेत
टैरिफ विवाद में इससे पहले निचली अदालतें भी ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ फैसला दे चुकी थीं। कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड और फेडरल सर्किट कोर्ट ने कहा था कि IEEPA राष्ट्रपति को इतनी व्यापक शक्ति नहीं देता कि वह अकेले ही बड़े पैमाने पर टैरिफ लगा दें।
इन अदालतों का मानना था कि टैरिफ दरअसल एक तरह का टैक्स है और टैक्स लगाने का अधिकार संसद के पास होना चाहिए।
अब रिफंड प्रक्रिया कैसे होगी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में टैरिफ को रद्द तो कर दिया था, लेकिन कंपनियों को पैसा कैसे लौटाया जाएगा, इस बारे में स्पष्ट दिशा नहीं दी थी। इसी वजह से अब इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट ने इस मुद्दे को लेकर विस्तृत आदेश जारी किया है।
जज रिचर्ड ईटन ने कहा है कि रिफंड से जुड़े मामलों की सुनवाई वे स्वयं करेंगे ताकि प्रक्रिया जटिल न हो और कंपनियों को समय पर राहत मिल सके।
कस्टम विभाग की बड़ी जिम्मेदारी
अब इस फैसले के बाद अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन एजेंसी को रिफंड की पूरी व्यवस्था तैयार करनी होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में कस्टम विभाग रिफंड देता रहता है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर रिफंड देने की व्यवस्था पहले कभी नहीं बनाई गई थी। इसलिए प्रशासनिक स्तर पर यह एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
सरकार के पास तीन विकल्प
फैसले के बाद अमेरिकी सरकार के पास आगे बढ़ने के तीन संभावित रास्ते बताए जा रहे हैं।
पहला विकल्प यह है कि सरकार इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे। दूसरा विकल्प यह है कि सरकार अस्थायी रोक यानी स्टे की मांग करे ताकि रिफंड प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोका जा सके।
तीसरा विकल्प यह है कि प्रशासन प्रक्रिया में देरी करे। अमेरिकी कस्टम नियमों के अनुसार, आयातित सामान पर शुल्क का अंतिम हिसाब तय होने के बाद आयातकों को चुनौती देने के लिए 180 दिन का समय मिलता है। इससे रिफंड की प्रक्रिया लगभग छह महीने तक टाली जा सकती है।
ट्रम्प की तीखी प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रम्प ने अदालत के कुछ जजों की आलोचना भी की थी। उन्होंने कहा था कि कुछ जजों के फैसले देश के लिए सही नहीं हैं और उन्हें इस बात पर शर्म आनी चाहिए।
इसके बाद ट्रम्प ने अगले ही दिन एक नया आदेश जारी करते हुए वैश्विक टैरिफ दर को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया था। यह नया टैरिफ 24 फरवरी से लागू कर दिया गया।
अमेरिकी राजनीति का असर
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 जज हैं। इनमें से 6 जज रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों द्वारा नियुक्त किए गए हैं, जबकि 3 जज डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों द्वारा नियुक्त किए गए हैं।
टैरिफ मामले में असहमति जताने वाले तीनों जज भी रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों द्वारा नियुक्त किए गए थे। ट्रम्प खुद भी रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े हुए हैं, इसलिए इस फैसले को अमेरिकी राजनीति के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला आयातकों और उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है। जिन कंपनियों ने पिछले महीनों में भारी टैरिफ चुकाया था, उन्हें अब बड़ी राशि वापस मिलने की संभावना है।
हालांकि यह भी माना जा रहा है कि इतनी बड़ी रकम लौटाने की प्रक्रिया आसान नहीं होगी और इसमें समय लग सकता है।
आगे क्या होगा
अब सबकी नजर इस बात पर है कि अमेरिकी सरकार इस फैसले पर क्या कदम उठाती है। यदि सरकार अपील करती है तो यह मामला फिर से लंबी कानूनी प्रक्रिया में जा सकता है।
दूसरी तरफ यदि रिफंड प्रक्रिया शुरू होती है तो यह अमेरिकी व्यापार नीति के इतिहास में सबसे बड़े आर्थिक रिफंड में से एक हो सकता है।

