संकटग्रस्त सांस्कृतिक विरासतों की सुरक्षा के लिए यूनेस्को का ऐतिहासिक कदम

हाल ही में यूनेस्को (UNESCO) ने कई संकटग्रस्त पारंपरिक कलाओं और शिल्पों को अपनी तात्कालिक संरक्षण की आवश्यकता वाली अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया। इस कदम का उद्देश्य उन जीवंत परंपराओं को बचाना है जो आधुनिक जीवनशैली के दबाव में धीरे-धीरे गायब हो रही हैं। इससे आने वाले समय में दस्तावेजीकरण, नीति सहयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।

UNESCO historic step to protect endangered cultural heritage

यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत

  • अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का अर्थ: यूनेस्को के अनुसार अमूर्त सांस्कृतिक विरासत वे परंपराएँ हैं, जो लोगों की पहचान से जुड़ी होती हैं। इसमें लोककथाएँ, मौखिक परंपराएँ, नृत्य, संगीत, अनुष्ठान, पर्व, और पारंपरिक शिल्प शामिल होते हैं। यह विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है। समय के साथ इसमें स्वाभाविक परिवर्तन भी होता है।
  • ढांचे की पृष्ठभूमि: इस ढांचे का लक्ष्य उन सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की रक्षा करना है, जो इमारत या स्मारक के रूप में नहीं दिखतीं। वर्ष 2003 में यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण अभिसमय को अपनाया। इसमें सदस्य देशों ने मिलकर यह स्वीकार किया कि भाषा, कला, रीति और शिल्प भी आज के दौर में मूल्यवान हैं। 
  • यूनेस्को की प्रमुख सूचियाँ: इस अभिसमय के तहत तीन प्रमुख व्यवस्थाएँ बनीं। पहली सूची मानवता की प्रतिनिधि अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की है। इसका उद्देश्य सांस्कृतिक विविधता को दुनिया के सामने लाना है। दूसरी सूची उन परंपराओं के लिए है, जो शीघ्र लुप्त होने के खतरे में हैं। तीसरी व्यवस्था अच्छे संरक्षण उपायों का रजिस्टर है। इसमें सफल प्रयासों को साझा किया जाता है।
  • संरक्षण सूची के मानदंड: जो परंपराएँ गंभीर संकट में होती हैं, उन्हें तात्कालिक संरक्षण सूची में रखा जाता है। इसके लिए कुछ शर्तें होती हैं कि परंपरा को अमूर्त विरासत की परिभाषा में आना चाहिए। उसके लुप्त होने का वास्तविक खतरा होना चाहिए। समुदाय की भागीदारी से संरक्षण योजना तैयार होनी चाहिए। वह विरासत देश की आधिकारिक सूची में दर्ज होनी चाहिए। साथ ही समुदाय की स्वतंत्र और सूचित सहमति भी आवश्यक होती है।
  • निर्णय लेने की प्रक्रिया: हर वर्ष यूनेस्को की अंतरसरकारी समिति बैठक करती है। सदस्य देश अपने प्रस्ताव प्रस्तुत करते हैं। समिति तय करती है कि मानदंड पूरे हुए या नहीं। इसके बाद सूची में शामिल करने का निर्णय लिया जाता है। यह प्रक्रिया पारदर्शिता पर आधारित होती है।

 

यूनेस्को की 2025 की संकटग्रस्त अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची

  • डोंग हो लोक वुडब्लॉक प्रिंटिंग (वियतनाम): डोंग हो लोक वुडब्लॉक प्रिंटिंग वियतनाम के बाक निन्ह प्रांत की एक पारंपरिक कला है। इसमें खास कागज पर तस्वीरें छापने के लिए नक्काशीदार लकड़ी के ब्लॉक और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। यह कला सैकड़ों साल पुरानी है और त्योहारों और पूजा-पाठ से जुड़ी है। 
  • बोरेंडो संगीत परंपरा (पाकिस्तान): बोरेंडो पाकिस्तान का एक प्राचीन मिट्टी का वाद्य यंत्र है। यह वाद्य यंत्र और इसकी धुनें सिंधु घाटी क्षेत्र की स्थानीय मौखिक परंपराओं को दर्शाती हैं। बोरेंडो हाथ से बनाया जाता है और इसके लिए मिट्टी को आकार देने और सुर मिलाने का गहरा ज्ञान चाहिए। 
  • मवाज़िंदिका आध्यात्मिक नृत्य (केन्या): मवाज़िंदिका आध्यात्मिक नृत्य केन्या में डाइडा समुदाय का एक पारंपरिक अनुष्ठानिक नृत्य है। यह संगीत, हाव-भाव और कहानी कहने के माध्यम से समुदाय के उपचार, जीवन के संस्कारों और सामाजिक संतुलन का समर्थन करता है। 
  • क्विंचा मिट्टी के घर का निर्माण (पनामा): क्विंचा मिट्टी के घर का निर्माण पनामा की एक निर्माण कला है, जिसमें लकड़ी, मिट्टी और पुआल जैसी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है। यह उष्णकटिबंधीय जलवायु के अनुकूल घर बनाने के सदियों पुराने ज्ञान को दर्शाता है। 
  • नाई’उपो सिरेमिक शिल्प कौशल (पैराग्वे): नाई’उपो पैराग्वे की एक सिरेमिक शिल्प परंपरा है। इसमें खाना पकाने और परोसने के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को आकार देना और पकाना शामिल है। यह प्रथा सामग्री और पकाने की तकनीकों के पैतृक ज्ञान को दर्शाती है। 
  • आसिन टिबुक कारीगरी समुद्री नमक बनाना (फिलीपींस): आसिन टिबुक फिलीपींस के बोहोलानो लोगों द्वारा बनाया गया एक दुर्लभ समुद्री नमक है। इस विधि में राख और मिट्टी से छने हुए समुद्री पानी का उपयोग करके विशिष्ट नमक के क्रिस्टल बनाए जाते हैं। यह तकनीक स्थानीय संस्कृति विरासत से खास तौर पर जुड़ी हुई है।
  • मोलिसेइरो नाव बनाना (पुर्तगाल): मोलिसेइरो नाव बनाना पुर्तगाल के एवेइरो क्षेत्र की एक पारंपरिक समुद्री बढ़ईगीरी कला है। इन नावों का इस्तेमाल ऐतिहासिक रूप से मोलिको समुद्री शैवाल की कटाई और स्थानीय परिवहन के लिए किया जाता था। इस शिल्प के लिए लकड़ी के काम, पेंटिंग और नाव बनाने के खास ज्ञान की ज़रूरत होती है।
  • कोबिज़ तार वाद्य यंत्र शिल्प (उज़्बेकिस्तान): कोबिज़ उज़्बेकिस्तान का एक पारंपरिक तार वाला वाद्य यंत्र है। कहानी सुनाने और संगीत अनुष्ठानों में इसका सांस्कृतिक महत्व है। कोबिज़ बनाने करने के लिए लकड़ी और तार के काम के प्राचीन ज्ञान की ज़रूरत होती है।
  • लाहुता महाकाव्य गायन (अल्बानिया): लाहुता महाकाव्य गायन अल्बानिया की एक पारंपरिक गायन कला है। यह कहानी सुनाने को संगीत के साथ मिलाता है, अक्सर वीर गाथाएँ सुनाई जाती है।
  • नेग्लिउबका कपड़ा विरासत (बेलारूस): नेग्लिउबका बेलारूस का एक कपड़ा शिल्प है, जिसमें बुनाई और कढ़ाई की अनोखी तकनीकें शामिल हैं। यह कपड़े के पैटर्न के माध्यम से स्थानीय प्रतीकों और सांस्कृतिक मूल्यों को व्यक्त करता है।
  • पारंपरिक समुद्री डोंगी शिल्प (बारबाडोस): बारबाडोस लैंडशिप और पारंपरिक समुद्री डोंगी शिल्प समुद्री सांस्कृतिक प्रथाओं को संदर्भित करता है, जिसमें नाव बनाना और औपचारिक आंदोलन शामिल हैं। ये परंपराएँ स्थानीय विरासत और समुद्री यात्रा से ऐतिहासिक संबंधों को दर्शाती हैं।

 

निष्कर्ष:

पारंपरिक कलाएँ और सांस्कृतिक प्रथाएँ किसी समाज की आत्मा होती हैं। वे केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान की पहचान और भविष्य की दिशा भी तय करती हैं। जब कोई परंपरा समाप्त होती है, तो उसके साथ भाषा, स्मृति, कौशल और जीवन का एक पूरा दृष्टिकोण भी खो जाता है। आज के तेज़ी से बदलते समय में विकास, तकनीक और बाज़ार के दबाव ने इन जीवित परंपराओं को सबसे अधिक प्रभावित किया है। ऐसे में संरक्षण का अर्थ केवल संग्रहालयों में सीमित करना नहीं है, बल्कि उन्हें रोज़मर्रा के जीवन से जोड़े रखना है।

समुदाय की सक्रिय भागीदारी, शिक्षा के माध्यम से ज्ञान का हस्तांतरण, कलाकारों को सम्मानजनक आजीविका और नीतिगत समर्थन, ये सभी मिलकर ही किसी परंपरा को जीवित रख सकते हैं। यूनेस्को जैसी पहलें वैश्विक ध्यान आकर्षित करती हैं, लेकिन वास्तविक जिम्मेदारी स्थानीय समाज और अगली पीढ़ी की होती है।

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