होर्मुज़ की सुरक्षा पर नया सवाल! अमेरिका ने चीन से मांगा साथ, क्या अमेरिका के साथ आएगा चीन?

मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कई देशों से इस रणनीतिक समुद्री रास्ते की सुरक्षा में सहयोग करने की अपील की है। ट्रम्प ने विशेष रूप से चीन समेत उन देशों का नाम लिया है जो इस मार्ग से गुजरने वाले तेल और ऊर्जा आपूर्ति पर काफी निर्भर हैं।


हालांकि चीन ने इस मुद्दे पर सावधानी भरा रुख अपनाया है। बीजिंग ने साफ कहा है कि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है और यहां शांति व स्थिरता बनाए रखना पूरी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की साझा जिम्मेदारी है।


चीन का बयान: स्थिरता सबके हित में
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने मीडिया के सवालों के जवाब में कहा कि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य और इसके आसपास का समुद्री क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए बेहद अहम है।


उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना केवल किसी एक देश का नहीं बल्कि पूरे विश्व समुदाय का हित है। चीन का यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका इस मार्ग की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहा है।


हालांकि चीन ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह अमेरिका के प्रस्तावित सैन्य प्रयास में शामिल होगा या नहीं।

US China Hormuz support

अमेरिका का प्रस्ताव: जहाजों की सुरक्षा के लिए गठबंधन

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका जल्द ही यह घोषणा कर सकता है कि कुछ देश हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों को सुरक्षा देने के लिए एक गठबंधन बनाने पर सहमत हो गए हैं। इस योजना के तहत युद्धपोतों की मदद से व्यापारी जहाजों को सुरक्षित मार्ग दिया जाएगा।

 

ट्रम्प ने कई देशों से कहा है कि जो देश इस मार्ग से गुजरने वाले तेल पर निर्भर हैं, उन्हें इसकी सुरक्षा में योगदान देना चाहिए।

 

उन्होंने कहा, “जिन देशों को इस रास्ते से ऊर्जा मिलती है, उन्हें इसकी रक्षा के लिए आगे आना चाहिए। आखिर यह वही मार्ग है जिससे उन्हें तेल और गैस मिलती है।”

 

चीन को लेकर ट्रम्प की नाराज़गी

ट्रम्प ने खास तौर पर चीन का जिक्र करते हुए कहा कि चीन की तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आता है। उनके अनुसार चीन के लगभग 90 प्रतिशत कच्चे तेल के आयात इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं।

 

इसके विपरीत अमेरिका की निर्भरता इस मार्ग पर काफी कम है। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका को अपने कुल तेल आयात का केवल 1 से 2 प्रतिशत ही इस रास्ते से मिलता है।

 

इसी वजह से उन्होंने सवाल उठाया कि जब इस मार्ग का सबसे ज्यादा फायदा अन्य देशों को मिलता है तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उन्हीं देशों को उठानी चाहिए।

 

शी जिनपिंग से मुलाकात पर भी दबाव

ट्रम्प ने चीन पर दबाव बनाने के लिए एक और संकेत दिया है। उन्होंने कहा कि अगर चीन हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा में सहयोग नहीं करता तो उनकी प्रस्तावित बीजिंग यात्रा टल सकती है।

रिपोर्टों के अनुसार ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच इस महीने के अंत में मुलाकात होने की संभावना है।

 

ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका यह जानना चाहता है कि चीन इस मामले में क्या रुख अपनाने वाला है। अगर सहयोग नहीं मिला तो बैठक को आगे टाला भी जा सकता है।

 

तेल की कीमतों में तेजी

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।

 

वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमत लगभग 99 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है, जबकि वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड करीब 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।

 

ईरान का रुख और जहाजों की आवाजाही

हाल के दिनों में ईरान ने इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। कुछ मामलों में जहाजों की आवाजाही भी सीमित कर दी गई है।

 

हालांकि रिपोर्टों के अनुसार कुछ चीन से जुड़े तेल टैंकरों को इस मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई है।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे संकेत मिलता है कि ईरान कुछ देशों के साथ अलग-अलग स्तर पर समझदारी बनाकर जहाजों को गुजरने दे रहा है।

 

चीन क्यों नहीं करना चाहता सैन्य हस्तक्षेप

अमेरिका के दबाव के बावजूद चीन इस मुद्दे पर सैन्य भूमिका निभाने को लेकर उत्साहित नहीं दिख रहा है।

 

विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, चीन ईरान के साथ अपने संबंधों को खराब नहीं करना चाहता। दूसरा, चीन ने पिछले दो दशकों में अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाने की कोशिश की है ताकि किसी एक क्षेत्र पर ज्यादा निर्भरता न रहे।

 

इसके अलावा चीन ने बड़े पैमाने पर रणनीतिक तेल भंडार भी बनाए हैं ताकि आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में देश की जरूरतें पूरी की जा सकें।

 

कूटनीति को प्राथमिकता देता है चीन

चीन की विदेश नीति का एक अहम पहलू यह रहा है कि वह आम तौर पर विदेशी सैन्य संघर्षों में सीधे शामिल होने से बचता है।

 

इससे पहले लाल सागर में जहाजों पर हुए हमलों के दौरान भी चीन ने अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभियान में शामिल होने से दूरी बनाए रखी थी।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा संकट में भी चीन संभवतः सैन्य भूमिका निभाने के बजाय कूटनीतिक समाधान की कोशिश करेगा।

 

मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है चीन

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।

 

संभव है कि चीन ईरान से बातचीत करके जलडमरूमध्य को खुला रखने की अपील करे, वहीं अमेरिका और उसके सहयोगियों से भी कुछ रियायत देने के लिए कहे।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर चीन इस दिशा में कदम उठाता है तो वह क्षेत्र में तनाव कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

 

वैश्विक व्यापार के लिए अहम मार्ग

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यह ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा रास्ता है जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है।

 

दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग एक-पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। इसलिए यहां किसी भी प्रकार का तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर सकता है।

 

आगे क्या हो सकता है

फिलहाल स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है। अमेरिका इस मार्ग की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाने की कोशिश कर रहा है, जबकि चीन अभी तक कोई स्पष्ट सैन्य प्रतिबद्धता देने से बच रहा है।

ईरान भी अपने कदम सोच-समझकर उठा रहा है और जहाजों की आवाजाही पर सख्त नजर रख रहा है।

ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या बड़े देश मिलकर इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित बनाने के लिए कोई साझा रास्ता निकालते हैं या फिर तनाव और बढ़ता है।

 

निष्कर्ष:

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य का संकट केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। अमेरिका चाहता है कि चीन समेत अन्य देश इस मार्ग की सुरक्षा में सैन्य भूमिका निभाएं, लेकिन चीन फिलहाल सावधानी से कदम उठा रहा है और कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देता दिख रहा है।