नेतन्याहू की जंग में क्यों साथ आये ट्रंप? ईरान को कमजोर करने से किसे ज्यादा फायदा-अमेरिका या इज़राइल? सऊदी अरब का रुख क्या है?

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर बातचीत कई बार आख़िरी मोड़ तक पहुँची, लेकिन हर बार ठीक निर्णायक समय पर हालात बदल गए। जून 2025 और फिर फरवरी 2026 में ऐसा ही हुआ। जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच समझौता लगभग तय माना जा रहा था, उसी दौरान इज़राइल ने ईरान के परमाणु ढांचे पर हमला कर दिया। बाद में अमेरिका भी सीधे तौर पर इस संघर्ष में शामिल हो गया।


सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या यह अमेरिका की अपनी रणनीति थी, या फिर इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को अपने एजेंडे के मुताबिक कदम उठाने के लिए राज़ी कर लिया? और अगर ऐसा है, तो इससे सबसे ज्यादा लाभ किसे मिला-अमेरिका को या इज़राइल को?


यह पूरा घटनाक्रम समझने के लिए पिछले डेढ़ साल की कड़ियों को जोड़ना जरूरी है।

US Israel attack on Iran

दो दशक पुरानी चेतावनी और 2025 की पृष्ठभूमि

नेतन्याहू लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब है और यह इज़राइल के अस्तित्व के लिए खतरा है। फरवरी 2025 में जब वे अमेरिका पहुँचे और ट्रंप से मुलाकात की, उसी समय से माहौल बदलना शुरू हुआ।

 

इसी दौरान इज़राइली खुफिया एजेंसियों ने अमेरिकी प्रशासन को संदेश दिया कि ईरान तेजी से परमाणु बम बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। मार्च 2025 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की एक रिपोर्ट आई, जिसमें कहा गया कि ईरान ने 60% तक शुद्धता वाला यूरेनियम तैयार किया है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया कि एजेंसी को किसी गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम के सबूत नहीं मिले।

 

जून 2025 में एजेंसी के प्रमुख Rafael Grossi ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनके पास यह साबित करने के लिए ठोस प्रमाण नहीं हैं कि ईरान परमाणु बम बना रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का आकलन भी यही था कि ईरान हथियार बनाने की दिशा में सक्रिय रूप से काम नहीं कर रहा।

 

इसके बावजूद इज़राइल का रुख आक्रामक बना रहा।

 

बातचीत के बीच हमला और अमेरिका की एंट्री

जून 2025 में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते पर बातचीत चल रही थी। बताया जाता है कि ट्रंप उस समय नहीं चाहते थे कि इज़राइल कोई बड़ा सैन्य कदम उठाए, क्योंकि इससे बातचीत पटरी से उतर सकती थी।

 

लेकिन जब वार्ता आगे नहीं बढ़ी, तो इज़राइल ने यह तर्क दिया कि सैन्य दबाव बनाने से ईरान समझौते के लिए मजबूर होगा। 13 जून 2025 को इज़राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला शुरू कर दिया। शुरुआत में ट्रंप ने दूरी बनाए रखी, पर जैसे ही इज़राइल को शुरुआती बढ़त मिली, अमेरिका खुलकर उसके साथ आ गया।

 

22 जून 2025 को अमेरिकी बी-2 बमवर्षकों ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया। इन हमलों से ईरान के कार्यक्रम को काफी नुकसान पहुँचा और वह अपने लक्ष्य से कई साल पीछे चला गया।

 

हमलों के बाद बातचीत दोबारा शुरू हुई, लेकिन इस बार इज़राइल ने ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को भी बड़ा खतरा बताना शुरू कर दिया।

 

दूसरी बार हमला: फरवरी 2026 की कहानी

फरवरी 2026 में एक बार फिर बातचीत आख़िरी दौर में थी। अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर ईरानी प्रतिनिधियों से चर्चा कर रहे थे। ओमान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था।

 

26 फरवरी को जिनेवा में तीसरे दौर की वार्ता हुई। ओमान के विदेश मंत्री Badr Albusaidi ने कहा कि समझौता करीब है और ईरान संवर्धित यूरेनियम का भंडारण छोड़ने को तैयार है।

 

अगले हफ्ते तकनीकी मुद्दों पर वियना में चर्चा होनी थी। लेकिन उससे पहले इज़राइल और अमेरिका ने फिर से हमला कर दिया। यह दूसरी बार था जब निर्णायक बातचीत से ठीक पहले सैन्य कार्रवाई हुई।

 

सऊदी अरब की परदे के पीछे भूमिका

सार्वजनिक तौर पर सऊदी अरब कूटनीतिक समाधान की बात करता रहा, लेकिन रिपोर्टों के अनुसार सऊदी क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman ने निजी तौर पर ट्रंप से संपर्क कर सख्त कदम उठाने की पैरवी की।

 

उनका तर्क था कि अगर अभी कार्रवाई नहीं की गई तो ईरान और ताकतवर हो जाएगा। सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने भी अमेरिकी अधिकारियों से इसी तरह की बात कही।

 

सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा है। एक सुन्नी नेतृत्व वाला देश होने के कारण सऊदी अरब, शिया बहुल ईरान को अपने लिए रणनीतिक चुनौती मानता है। ऐसे में ईरान का कमजोर होना उसे अपने हित में दिखता है।

 

इज़राइल के दो बड़े लक्ष्य

इस पूरे संघर्ष के पीछे इज़राइल के दो मुख्य मकसद बताए जाते हैं।

 

  1. अमेरिका-ईरान समझौता रोकना

अगर दोनों देशों के बीच समझौता हो जाता, तो ईरान पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंध हट सकते थे। इससे उसे आर्थिक राहत मिलती और वह क्षेत्र में मजबूत स्थिति में आ जाता। इज़राइल नहीं चाहता था कि वॉशिंगटन और तेहरान के रिश्ते सुधरें।

 

  1. क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को कमजोर करना

इज़राइल का मानना है कि ईरान हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे संगठनों को समर्थन देता है। हाल के वर्षों में हमास और हिज़्बुल्लाह काफी कमजोर हुए हैं। ऐसे में ईरान ही इज़राइल के सामने बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बचता है।

 

अगर तेहरान की ताकत घटती है या वहां सत्ता परिवर्तन होता है, तो इज़राइल को क्षेत्र में बड़ी राहत मिल सकती है।

 

अमेरिका को क्या फायदा?

अमेरिका दशकों से इज़राइल का सबसे बड़ा समर्थक रहा है। 1948 से अब तक अमेरिका इज़राइल को 300 अरब डॉलर से ज्यादा सहायता दे चुका है। 2019 के एक समझौते के तहत उसे हर साल 3.8 अरब डॉलर की सैन्य मदद मिलती है।

 

अगर ईरान में ऐसा नेतृत्व आता है जो अमेरिका के करीब हो, तो वॉशिंगटन को पूरे पश्चिम एशिया में रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। फिलहाल अमेरिका की सैन्य मौजूदगी कतर, इराक, सीरिया, जॉर्डन और कुवैत जैसे देशों में है, लेकिन ईरान में उसका कोई आधार नहीं है।

 

हालांकि, अमेरिकी जनता इस युद्ध के पक्ष में नहीं दिखती। एक सर्वे में सिर्फ 21% लोगों ने ईरान के खिलाफ युद्ध का समर्थन किया। कई सांसदों ने भी सैन्य कार्रवाई का विरोध किया।

 

क्या खामेनेई की हत्या से बदल जाएगी तस्वीर?

इज़राइल के कुछ नेताओं ने ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei को हटाने की बात कही है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ उनकी हत्या से सत्ता परिवर्तन आसान नहीं होगा।

 

ईरान की राजनीतिक व्यवस्था संस्थाओं पर आधारित है। वहां उत्तराधिकारी की प्रक्रिया पहले से तय होती है। ऐसे में अचानक खालीपन पैदा नहीं होगा।

 

साथ ही, बाहरी हमले से ईरान में राष्ट्रवाद और बढ़ सकता है। आम लोग विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ सरकार के साथ खड़े हो सकते हैं। बिना जमीनी सेना भेजे सिर्फ हवाई हमलों से शासन बदलना लगभग असंभव माना जाता है-और जमीनी सेना भेजना इज़राइल के लिए व्यावहारिक नहीं है।

 

अरब देशों ने ईरान का साथ क्यों नहीं दिया?

पश्चिम एशिया में सुन्नी और शिया देशों के बीच पुराना मतभेद है। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश अमेरिका के साथ मजबूत संबंध रखते हैं। वे नहीं चाहते कि ईरान परमाणु ताकत बने।

 

इन देशों को अमेरिका से सुरक्षा गारंटी मिली हुई है। बदले में उन्होंने परमाणु हथियार न रखने का वादा किया है। ऐसे में ईरान का परमाणु कार्यक्रम उन्हें भी असुरक्षित महसूस कराता है।

 

निष्कर्ष: किसकी जंग, किसका फायदा?

दो बार निर्णायक वार्ता से ठीक पहले हमला होना संयोग नहीं लगता। घटनाओं की कड़ी बताती है कि इज़राइल ने लगातार दबाव बनाकर अमेरिका को अपने साथ खड़ा किया।

 

इज़राइल को इससे सीधा फायदा दिखता है-ईरान कमजोर हुआ, समझौता टला और क्षेत्र में उसका दबदबा बना रहा। अमेरिका को रणनीतिक लाभ मिल सकता है, लेकिन घरेलू स्तर पर उसे आलोचना और थकान का सामना करना पड़ रहा है।