दुनिया इस समय तेल और गैस संकट की चर्चा में उलझी हुई है, लेकिन एक और गंभीर संकट धीरे-धीरे सामने आ रहा है – हीलियम की कमी। यह वही गैस है जिसे आम तौर पर गुब्बारों से जोड़ा जाता है, लेकिन असल में यह आधुनिक तकनीक, स्वास्थ्य सेवाओं और अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए बेहद जरूरी है। अब वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।
वेस्ट एशिया में क्या हुआ?
हाल ही में ईरान और उसके आसपास के क्षेत्रों में हुए हमलों ने ऊर्जा ढांचे को प्रभावित किया है। ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड और कतर के रस लाफान इंडस्ट्रियल सिटी जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर हमले हुए। खासकर कतर के LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) प्लांट पर मिसाइल हमले के बाद वहां आग लग गई, हालांकि बाद में उसे काबू में कर लिया गया।
यह घटनाएं सिर्फ ऊर्जा आपूर्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर हीलियम उत्पादन पर भी पड़ा है। क्योंकि हीलियम का उत्पादन LNG के साथ जुड़ा हुआ है, इसलिए जैसे ही गैस उत्पादन प्रभावित होता है, हीलियम की सप्लाई भी रुक जाती है।

साउथ पार्स और रस लाफान क्यों अहम हैं?
साउथ पार्स दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस क्षेत्र है, जो ईरान और कतर के बीच फैला हुआ है। इसका एक हिस्सा ईरान में है और दूसरा कतर में, जिसे नॉर्थ फील्ड कहा जाता है।

दूसरी तरफ, कतर का रस लाफान प्लांट दुनिया का सबसे बड़ा LNG उत्पादन केंद्र है, जो वैश्विक सप्लाई का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा देता है। यही जगह हीलियम उत्पादन का भी सबसे बड़ा केंद्र है।
हालिया हमलों के कारण कतर की LNG क्षमता का करीब 17 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ है। इसका सीधा असर हीलियम उत्पादन पर पड़ा है, जिससे वैश्विक बाजार में कमी और कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है।
हीलियम क्या है और क्यों खास है?
हीलियम एक रंगहीन, गंधहीन और बेहद हल्की गैस है। यह ब्रह्मांड में हाइड्रोजन के बाद दूसरी सबसे हल्की गैस है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यह बहुत कम तापमान पर भी तरल बन सकती है, जिससे इसे सुपरकूलिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
यह गैस अन्य तत्वों के साथ आसानी से प्रतिक्रिया नहीं करती, इसलिए इसे संवेदनशील तकनीकी प्रक्रियाओं में इस्तेमाल किया जाता है।
धरती पर हीलियम कैसे बनता है?
हीलियम धरती के अंदर लाखों-करोड़ों साल में बनता है। यह यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के टूटने से बनता है और धीरे-धीरे गैस के रूप में जमा हो जाता है।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब इसे बाहर निकाला जाता है, तो यह हवा में ऊपर उठकर अंतरिक्ष में चला जाता है और हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। यानी एक बार इस्तेमाल के बाद इसे वापस नहीं लाया जा सकता।
हीलियम कैसे निकाला जाता है?
हीलियम सीधे नहीं निकाला जाता, बल्कि यह प्राकृतिक गैस के साथ मिलता है। जब LNG बनाने के लिए गैस को बहुत कम तापमान (-269°C) तक ठंडा किया जाता है, तो बाकी गैसें तरल बन जाती हैं, लेकिन हीलियम गैस के रूप में अलग हो जाता है।
इस प्रक्रिया के बाद इसे साफ करके 99.99% शुद्ध हीलियम बनाया जाता है। इसका मतलब यह है कि अगर LNG उत्पादन बंद होता है, तो हीलियम का उत्पादन भी अपने आप रुक जाता है।
हीलियम का उपयोग कहां होता है?
हीलियम का इस्तेमाल कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में होता है –
1. सेमीकंडक्टर उद्योग: चिप बनाने में हीलियम बेहद जरूरी है। यह सिलिकॉन वेफर को ठंडा रखने और साफ वातावरण बनाए रखने में मदद करता है। AI, स्मार्टफोन, डेटा सेंटर – सब इसी पर निर्भर हैं।
2. स्वास्थ्य सेवाएं: MRI मशीनों में हीलियम का उपयोग होता है, जो शरीर के अंदर की जांच के लिए जरूरी है।
3. अंतरिक्ष और रक्षा: रॉकेट लॉन्च के दौरान ईंधन टैंक को दबाव में रखने और सिस्टम को साफ करने के लिए हीलियम का इस्तेमाल होता है।
4. वैज्ञानिक रिसर्च: पार्टिकल एक्सेलेरेटर और बड़े वैज्ञानिक उपकरणों में भी हीलियम जरूरी है।
इन सभी क्षेत्रों में हीलियम का कोई सस्ता या आसान विकल्प नहीं है।
दुनिया में हीलियम की कमी क्यों हो रही है?
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि हीलियम सीमित है और दोबारा नहीं बन सकता। दुनिया में इसका ज्यादातर उत्पादन अमेरिका और कतर से होता है। दोनों मिलकर करीब 70 प्रतिशत सप्लाई देते हैं।
अमेरिका में 2021 में एक बड़ा हीलियम रिजर्व बंद कर दिया गया, जिससे वैश्विक उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा कम हो गया।
दूसरी तरफ, मांग लगातार बढ़ रही है। MRI मशीनें कुल हीलियम का 25-30 प्रतिशत इस्तेमाल करती हैं, जबकि सेमीकंडक्टर उद्योग 20-25 प्रतिशत।
अब वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष ने इस संतुलन को और बिगाड़ दिया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते के प्रभावित होने से हर महीने लाखों क्यूबिक मीटर हीलियम की सप्लाई रुक गई है।
कीमतों में तेजी और असर
हीलियम की कमी के कारण इसकी कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। कुछ बाजारों में तो कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं।
इसका सबसे बड़ा असर सेमीकंडक्टर उद्योग पर पड़ सकता है। अगर हीलियम की कमी लंबे समय तक बनी रही, तो चिप उत्पादन धीमा पड़ सकता है। इससे स्मार्टफोन, कार, कंप्यूटर और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों पर असर पड़ेगा।
किन देशों पर ज्यादा असर?
जापान, भारत, तुर्की और दक्षिण कोरिया जैसे देश हीलियम और LNG पर काफी निर्भर हैं। खासकर दक्षिण कोरिया, जो चिप निर्माण में आगे है, उसे कुछ ही महीनों में सप्लाई संकट का सामना करना पड़ सकता है।
छोटे और कमजोर अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो सकती है, क्योंकि बढ़ती कीमतों के कारण उनकी मांग घट सकती है।
स्टोरेज और सप्लाई की दिक्कत
हीलियम को स्टोर करना आसान नहीं है। इसे या तो बहुत ठंडे तापमान पर तरल रूप में रखना पड़ता है या दबाव में गैस के रूप में।
दुनिया में इसकी स्टोरेज क्षमता बहुत सीमित है। कुछ ही जगहों पर बड़े स्तर पर इसे स्टोर किया जा सकता है, जैसे अमेरिका के टेक्सास और जर्मनी में।
अधिकतर स्टोरेज टैंक सिर्फ कुछ दिनों या हफ्तों की सप्लाई ही संभाल सकते हैं। इसलिए लंबे समय तक संकट आने पर स्थिति और खराब हो सकती है।
क्या कोई विकल्प है?
फिलहाल हीलियम का कोई बड़ा विकल्प नहीं है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां बहुत कम तापमान और साफ वातावरण की जरूरत होती है।
रिसाइक्लिंग की कोशिशें जरूर हो रही हैं, लेकिन यह अभी शुरुआती स्तर पर है और बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए पर्याप्त नहीं है।
आगे क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वेस्ट एशिया का संकट लंबा चला, तो हीलियम की कमी और बढ़ सकती है। नई जगहों पर हीलियम खोजने और निकालने में महीनों लग सकते हैं।
इसके अलावा, कंपनियों को अब कई सप्लायर्स से हीलियम खरीदने की रणनीति अपनानी होगी, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।

