पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच केंद्र सरकार ने देशवासियों को भरोसा दिलाया है कि भारत में पेट्रोल, डीजल, गैस या LPG की कोई कमी नहीं है। सरकार के मुताबिक देश के पास करीब 60 दिनों का कच्चा तेल और गैस का भंडार मौजूद है, जबकि घरेलू इस्तेमाल वाली LPG का लगभग 45 दिनों का स्टॉक सुरक्षित रखा गया है। इसके बावजूद सरकार लगातार लोगों से ईंधन बचाने की अपील कर रही है। यही वजह है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर जब देश के पास पर्याप्त भंडार है, तब इतनी चिंता क्यों दिखाई जा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार दो दिनों तक अलग-अलग जनसभाओं में लोगों से पेट्रोल-डीजल कम खर्च करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और गैरजरूरी खर्चों को टालने की अपील की। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक नई बहस शुरू हो गई। कुछ लोगों ने इसे एहतियाती कदम बताया, तो कुछ ने कहा कि सरकार आर्थिक दबाव को लेकर चिंतित है।
सरकार ने क्यों कहा- घबराने की जरूरत नहीं
सोमवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों के समूह की एक अहम बैठक हुई। इसमें पेट्रोलियम, रेलवे, उर्वरक, सिविल एविएशन, पोर्ट और विज्ञान मंत्रालय से जुड़े मंत्री और अधिकारी शामिल हुए। बैठक में साफ कहा गया कि देश में ईंधन की सप्लाई सामान्य है और लोगों को पेट्रोल पंपों पर भीड़ लगाने की जरूरत नहीं है।
सरकार की तरफ से यह भी बताया गया कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी करीब 703 अरब डॉलर है, जो स्थिति को संभालने के लिए मजबूत माना जा रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीद के विकल्पों पर भी काम कर रहा है ताकि सप्लाई प्रभावित न हो।
फिर बचत की अपील क्यों की जा रही है?
असल चिंता तेल की कमी नहीं, बल्कि उसके महंगे होने से जुड़ी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। देश करीब 88% कच्चा तेल आयात करता है। इसके लिए भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। पश्चिम एशिया में युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में तेजी आई है। इससे भारत का आयात बिल लगातार बढ़ रहा है।
पहले भारत रोजाना जिस तेल को खरीदने पर लगभग 3,100 करोड़ रुपए खर्च करता था, वही खर्च अब बढ़कर करीब 4,700 करोड़ रुपए प्रतिदिन तक पहुंच गया है। यानी हर दिन हजारों करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। यही कारण है कि सरकार लोगों से कम खपत की अपील कर रही है ताकि विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो सके।
पीएम मोदी ने क्या कहा
प्रधानमंत्री मोदी ने 10 मई को हैदराबाद और 11 मई को वडोदरा में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि देश को इस समय जिम्मेदारी दिखाने की जरूरत है। उन्होंने लोगों से कहा कि जहां संभव हो, वहां निजी वाहनों की जगह मेट्रो, बस और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें। कारपूलिंग बढ़ाएं और अनावश्यक यात्राओं से बचें।
उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी यात्राओं और सोने की खरीद पर फिलहाल रोक लगाने जैसी सोच अपनानी चाहिए, क्योंकि इनसे भी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है। प्रधानमंत्री ने खाने के तेल की खपत कम करने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की भी बात कही।
तेल कंपनियों पर कितना दबाव है
सरकार के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद सरकारी तेल कंपनियां तुरंत दाम नहीं बढ़ा रहीं। इससे कंपनियों को हर दिन लगभग 1000 करोड़ रुपए तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक हालात ऐसे ही बने रहे तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जल्द बढ़ोतरी हो सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक 15 मई के आसपास पेट्रोल और डीजल के दाम 4 से 5 रुपए प्रति लीटर तक बढ़ सकते हैं। घरेलू गैस सिलेंडर भी करीब 50 रुपए महंगा हो सकता है। हालांकि सरकार की तरफ से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

भारत के पास कितना रणनीतिक भंडार है
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक तेल भंडार पर काफी काम किया है। विशाखापत्तनम, मंगलूरु और पादुर में भूमिगत भंडारण केंद्र बनाए गए हैं। इनकी कुल क्षमता लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है। अभी इनमें लगभग 64% तेल भरा हुआ है।
अगर सरकारी और निजी तेल कंपनियों के स्टॉक को भी जोड़ दिया जाए, तो भारत के पास कुल मिलाकर लगभग 60 दिनों का कच्चा तेल और गैस उपलब्ध है। LPG का स्टॉक करीब 45 दिनों का बताया गया है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मानकों के अनुसार देशों के पास कम से कम 90 दिनों के आयात के बराबर भंडार होना चाहिए। इस हिसाब से भारत अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है, लेकिन 60 से 74 दिनों का बैकअप भी सुरक्षित माना जाता है।
लोगों में डर फैल गया?
प्रधानमंत्री की अपील के बाद कई शहरों में लोगों ने पेट्रोल पंपों पर ज्यादा खरीदारी शुरू कर दी थी। सोशल मीडिया पर यह चर्चा भी होने लगी कि कहीं देश में फिर लॉकडाउन जैसे हालात तो नहीं बनने वाले। इसी के बाद सरकार को सामने आकर सफाई देनी पड़ी कि ईंधन की कोई कमी नहीं है और सप्लाई सामान्य बनी हुई है।
पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि सरकार लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए है और आम लोगों को परेशान होने की जरूरत नहीं है।
गैरजरूरी आयात पर भी नजर
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि सरकार सोना और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे गैरजरूरी आयात को सीमित करने पर विचार कर रही है। इसका मकसद विदेशी मुद्रा बचाना बताया जा रहा है। हालांकि इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
भारत हर साल बड़ी मात्रा में सोना आयात करता है। इसी तरह इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों पर भी भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। युद्ध के कारण अगर तेल और महंगा हुआ, तो सरकार खर्च नियंत्रित करने के लिए कुछ कड़े कदम उठा सकती है।
महाराष्ट्र के मंत्री ने रद्द किया विदेश दौरा
प्रधानमंत्री की अपील के बाद महाराष्ट्र सरकार के मंत्री आशीष शेलार ने घोषणा की कि वे इस साल फ्रांस में होने वाले कांस फिल्म फेस्टिवल में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए विभागीय खर्च कम करने का फैसला लिया गया है।
शेलार ने कहा कि जहां जरूरी होगा, वहां ऑनलाइन माध्यम से बैठकें और कार्यक्रम किए जाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि मराठी फिल्मों के प्रचार से जुड़े जरूरी काम जारी रहेंगे।
1991 जैसा संकट तो नहीं?
कई लोग 1991 के आर्थिक संकट से मौजूदा हालात की तुलना कर रहे हैं। उस समय भारत के पास केवल कुछ दिनों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था और देश को सोना गिरवी रखना पड़ा था। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल स्थिति वैसी नहीं है।
आज भारत के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, रणनीतिक तेल भंडारण और कई देशों से ऊर्जा खरीदने के विकल्प मौजूद हैं। हालांकि अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो दबाव जरूर बढ़ सकता है।
क्या आने वाले दिनों में और सख्ती हो सकती है?
फिलहाल सरकार ने किसी तरह की पाबंदी या राशनिंग लागू नहीं की है। लेकिन जिस तरह लगातार ईंधन बचाने, विदेशी यात्राएं टालने और आयात कम करने की बातें हो रही हैं, उससे साफ है कि सरकार आने वाले समय के लिए तैयारी कर रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है और तेल 150 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचता है, तो भारत को आर्थिक मोर्चे पर ज्यादा कठिन फैसले लेने पड़ सकते हैं। ऐसे में सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा बचत और घरेलू उत्पादन पर जोर और बढ़ सकता है।

