फैक्ट चेक यूनिट पर फिर शुरू हुई कानूनी लड़ाई: क्या सुप्रीम कोर्ट बदलेगा बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला?

केंद्र सरकार की फैक्ट चेक यूनिट (FCU) को लेकर चल रही कानूनी जंग ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ केंद्र की अपील को बहाल कर दिया है, जिसमें हाईकोर्ट ने आईटी नियमों के तहत बनाई गई फैक्ट चेक यूनिट को असंवैधानिक ठहराया था। अब देश की सबसे बड़ी अदालत इस पूरे मामले की दोबारा सुनवाई करेगी।

 

PIB फैक्ट चेक यूनिट मामला:

  • PIB फैक्ट चेक यूनिट क्या करती है: प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक यूनिट सरकार से जुड़ी खबरों की जांच करती है। अगर किसी अखबार, वेबसाइट, सोशल मीडिया या अन्य प्लेटफॉर्म पर सरकार के कामकाज को लेकर कोई गलत, अधूरी या भ्रामक जानकारी सामने आती है, तो यह यूनिट उसकी पड़ताल करती है। इसके बाद सही तथ्यों के साथ बताती है कि दावा सही है या गलत।
  • फैक्ट चेक की जानकारी कहां जारी की जाती है: PIB फैक्ट चेक अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पोस्ट करता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम और Koo पर इसका अकाउंट @PIBFactCheck नाम से है। यहां पर गलत दावों का खंडन और सही जानकारी साझा की जाती है। इसके अलावा PIB की आधिकारिक वेबसाइट पर भी फैक्ट चेक से जुड़ी जानकारी डाली जाती है।
  • यह यूनिट कब बनाई गई थी: PIB की वेबसाइट के मुताबिक, फैक्ट चेक यूनिट की शुरुआत नवंबर 2019 में हुई थी। इसका मकसद था सरकार से जुड़ी खबरों की सच्चाई सामने लाना। अगर किसी खबर में सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाने वाली या गलत जानकारी हो, तो उसे तथ्यों के आधार पर स्पष्ट किया जाता है।
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फिर से कैसे जिंदा हुई अपील?

दरअसल, केंद्र सरकार ने 26 सितंबर 2024 को आए बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए 24 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी। यह याचिका ‘कुणाल कामरा बनाम भारत संघ’ और उससे जुड़े मामलों में दिए गए फैसले के खिलाफ थी।

 

लेकिन अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को छह हफ्तों का समय दिया था ताकि याचिका में दर्ज तकनीकी कमियों को दूर किया जा सके। अदालत ने साफ कहा था कि तय समय में खामियां नहीं सुधारी गईं तो याचिका खारिज कर दी जाएगी। चूंकि केंद्र समय सीमा में जरूरी सुधार नहीं कर सका, इसलिए जून 2025 में याचिका प्रशासनिक स्तर पर खारिज कर दी गई।

 

इसके बाद केंद्र सरकार ने देरी माफ करने और याचिका बहाल करने के लिए आवेदन दिया। सरकार ने अदालत को बताया कि याचिका दाखिल करने के बाद उसने इस बात पर आंतरिक विचार-विमर्श किया कि क्या हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए मुद्दों को बिना न्यायिक प्रक्रिया के सुलझाया जा सकता है। इन चर्चाओं में कई विभागों से राय ली गई, जिससे समय निकल गया।

 

सरकार ने कहा कि देरी जानबूझकर नहीं हुई, बल्कि सरकारी प्रक्रियाओं के कारण हुई। उसने यह भी दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत उसे न्याय पाने का अधिकार है और एक ईमानदार चूक के कारण यह अधिकार खत्म नहीं होना चाहिए।

 

न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई ने सरकार की दलीलें स्वीकार करते हुए देरी माफ कर दी और SLP को उसके मूल नंबर पर बहाल कर दिया। इस तरह केंद्र की अपील फिर से सुनवाई के लिए तैयार हो गई है। इस मामले में केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अधिवक्ता रजत नायर ने पक्ष रखा।

 

विवाद की जड़ क्या है?

यह मामला सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के नियम 3(1)(b)(v) से जुड़ा है, जिसमें 2023 में संशोधन किया गया था। इस संशोधन के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया कि वह एक फैक्ट चेक यूनिट अधिसूचित कर सके, जो केंद्र सरकार के कामकाज से जुड़ी “फर्जी, झूठी या भ्रामक” जानकारी की पहचान करे।

 

मार्च 2024 में इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) ने प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की फैक्ट चेक यूनिट को इसी संशोधित नियम के तहत अधिसूचित किया। इसके बाद इस कदम को चुनौती दी गई और मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा।

 

सुप्रीम कोर्ट ने भी उस समय अधिसूचना पर रोक लगा दी थी और कहा था कि मामले में गंभीर संवैधानिक सवाल उठते हैं। अदालत ने निर्देश दिया था कि जब तक हाईकोर्ट फैसला नहीं देता, तब तक FCU को लागू नहीं किया जाएगा।

 

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

जनवरी 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच-न्यायमूर्ति जीएस पटेल और न्यायमूर्ति नीला गोखले-ने इस मामले में विभाजित फैसला दिया। न्यायमूर्ति पटेल ने संशोधित नियम को असंवैधानिक बताया, जबकि न्यायमूर्ति गोखले ने इसे सही ठहराया। मतभेद होने पर मामला तीसरे न्यायाधीश को भेजा गया।

 

सितंबर 2024 में तीसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर (जो अब सुप्रीम कोर्ट में हैं) ने न्यायमूर्ति पटेल से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि यह संशोधन आईटी एक्ट, 2000 के तहत दिए गए अधिकारों से परे है और संविधान के अनुरूप नहीं है।

 

हाईकोर्ट ने माना कि “फर्जी, झूठी या भ्रामक” जैसे शब्द स्पष्ट परिभाषा के बिना बहुत व्यापक और अस्पष्ट हैं। इससे सरकार खुद ही अपने मामले में निर्णायक बन जाती है। अदालत ने यह भी कहा कि इससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य इंटरमीडियरी पर दबाव बनेगा, क्योंकि यदि वे FCU की बात नहीं मानेंगे तो उन्हें कानूनी सुरक्षा (सेफ हार्बर) खोने का खतरा रहेगा।

 

अदालत के अनुसार, यह प्रावधान मौलिक अधिकारों, खासकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर डाल सकता है और यह “अनुपातिकता की कसौटी” पर खरा नहीं उतरता।

 

केंद्र की दलील

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा है कि हाईकोर्ट ने संशोधन को गलत तरीके से रद्द किया। सरकार का तर्क है कि जानबूझकर फैलाई गई गलत जानकारी को संविधान संरक्षण नहीं देता। उसका कहना है कि यह नियम केवल “इच्छापूर्वक गलत सूचना” को निशाना बनाता है, न कि आलोचना, व्यंग्य या टिप्पणी को।

 

सरकार के मुताबिक, FCU केवल इंटरमीडियरी को सूचित करती है कि किसी सामग्री पर सवाल है। यह स्वत: हटाने का आदेश नहीं देती। प्लेटफॉर्म को सिर्फ “उचित प्रयास” करने होते हैं।

 

केंद्र ने यह भी कहा कि “फर्जी”, “झूठी” और “भ्रामक” जैसे शब्द सामान्य अर्थ में समझे जाने चाहिए और इन्हें असंवैधानिक रूप से अस्पष्ट नहीं कहा जा सकता। सरकार ने अमेरिकी अभिव्यक्ति कानूनों का हवाला देने को भी खारिज किया और कहा कि भारत का संविधान अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंध की अनुमति देता है।

 

आगे क्या?

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने अपील बहाल कर दी है, तो इस मुद्दे पर अंतिम फैसला शीर्ष अदालत ही देगी। यह मामला सिर्फ एक नियम का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और सरकार की भूमिका जैसे बड़े सवालों से जुड़ा है।

 

एक ओर सरकार का कहना है कि गलत सूचना पर रोक जरूरी है, दूसरी ओर आलोचकों को डर है कि इससे अभिव्यक्ति पर असर पड़ सकता है। अब नजर सुप्रीम कोर्ट पर है-क्या वह हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखेगा या केंद्र के संशोधन को सही ठहराएगा?