सोमवार, 23 फरवरी को IDFC First Bank के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई। बैंक के शेयर बीएसई पर सीधे 20% के लोअर सर्किट पर पहुंच गए। शेयर की कीमत गिरकर ₹66.85 तक आ गई, जो पिछले आठ महीनों का सबसे निचला स्तर है। इससे पहले शेयर 10% की कमजोरी के साथ खुला था, लेकिन बिकवाली लगातार बढ़ती गई और कीमत और नीचे चली गई।
इस तेज गिरावट की वजह बैंक द्वारा शेयर बाजार को दी गई वह जानकारी है, जिसमें चंडीगढ़ स्थित एक शाखा में करीब ₹590 करोड़ के संदिग्ध और अनधिकृत लेनदेन का खुलासा किया गया। बैंक के मुताबिक, इस मामले में कुछ कर्मचारियों की भूमिका सामने आई है और जांच जारी है।
क्या है पूरा मामला?
बैंक ने अपनी नियामकीय फाइलिंग में बताया कि हरियाणा सरकार के एक विभाग ने अपने खाते को बंद करने और राशि को किसी अन्य बैंक में ट्रांसफर करने का अनुरोध किया था। जब बैंक ने इस प्रक्रिया की जांच की, तो अनुरोध में बताई गई रकम और खाते में मौजूद बैलेंस के बीच अंतर पाया गया। इसी दौरान गड़बड़ी सामने आई।
बैंक के अनुसार, चंडीगढ़ शाखा में हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ खातों में कुल लगभग ₹590 करोड़ की राशि मिलान (reconciliation) के तहत है। बैंक ने साफ कहा है कि यह रकम अंतिम नहीं मानी जा सकती, क्योंकि आगे मिलने वाली जानकारी, दावों की पुष्टि, संभावित रिकवरी और कानूनी प्रक्रिया के बाद वास्तविक प्रभाव बदल सकता है।
बैंक ने यह भी बताया कि 18 फरवरी से हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ अन्य खातों में भी इसी तरह की गड़बड़ी देखी गई थी। शुरुआती जांच में पता चला है कि यह अनधिकृत गतिविधियां एक विशेष समूह के सरकारी खातों तक सीमित हैं और चंडीगढ़ शाखा के कुछ कर्मचारियों से जुड़ी हो सकती हैं। बैंक ने कहा है कि अन्य ग्राहकों के खातों पर इसका कोई असर नहीं है।
हरियाणा सरकार की सख्त कार्रवाई
मामला सामने आने के बाद हरियाणा सरकार ने तुरंत कदम उठाए। राज्य के वित्त विभाग ने एक सर्कुलर जारी कर IDFC First Bank और AU Small Finance Bank को सरकारी कामकाज से तत्काल प्रभाव से हटा दिया।
सर्कुलर के मुताबिक, अगले आदेश तक कोई भी सरकारी धन इन बैंकों में जमा, निवेश या लेनदेन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। सभी विभागों, बोर्ड, निगमों और सरकारी उपक्रमों को निर्देश दिया गया कि वे इन दोनों बैंकों में रखी अपनी राशि तुरंत ट्रांसफर करें और खाते बंद करें।
वित्त विभाग ने यह भी कहा कि फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़ी गाइडलाइन का सही पालन नहीं किया गया। जिन पैसों को लचीली या अधिक ब्याज वाली फिक्स्ड डिपॉजिट में रखना था, उन्हें बचत खाते में रखा गया, जिससे कम रिटर्न मिला और नुकसान हुआ।
सभी विभागों को हर महीने मिलान करने, किसी भी गड़बड़ी की रिपोर्ट करने और 31 मार्च 2026 तक पूरा मिलान खत्म करने का निर्देश दिया गया है। 4 अप्रैल 2026 तक प्रमाणित अनुपालन रिपोर्ट जमा करनी होगी।

बैंक ने क्या कदम उठाए?
IDFC First Bank ने चार अधिकारियों को जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया है। बैंक ने कहा है कि दोषी पाए जाने पर संबंधित कर्मचारियों और बाहरी पक्षों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक, सिविल और आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।
मामले को 20 फरवरी 2026 को बैंक के बोर्ड की विशेष समिति के सामने रखा गया। यह समिति धोखाधड़ी से जुड़े मामलों की निगरानी और आगे की कार्रवाई तय करती है।
बैंक ने एक स्वतंत्र बाहरी एजेंसी से फॉरेंसिक ऑडिट कराने का फैसला किया है और इसके लिए KPMG को नियुक्त किया गया है। साथ ही पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है और जांच एजेंसियों को पूरा सहयोग देने की बात कही गई है। जिन खातों में संदिग्ध लेनदेन हुआ है, उनमें रकम सुरक्षित रखने के लिए संबंधित बैंकों को लियन मार्क करने का अनुरोध भी भेजा गया है।
शेयर बाजार में इतनी तेज गिरावट क्यों?
बैंकिंग सेक्टर में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी होता है। जैसे ही ₹590 करोड़ के फ्रॉड की खबर सामने आई, निवेशकों के बीच चिंता बढ़ गई। यह रकम बैंक के सालाना शुद्ध लाभ का लगभग एक चौथाई बताई जा रही है। ऐसे में बाजार को डर है कि इसका असर बैंक की कमाई पर पड़ सकता है।
हाल के समय में शेयर पहले से दबाव में था। एक महीने में यह करीब 10% और तीन महीने में 4% गिर चुका था। हालांकि एक साल में शेयर ने 24% की बढ़त भी दी थी और छह महीने में लगभग 8% चढ़ा था। जनवरी 2026 में शेयर ने ₹87 का 52 हफ्तों का उच्च स्तर छुआ था, जबकि पिछले साल अप्रैल में ₹52.50 का निचला स्तर देखा था। मौजूदा गिरावट के बाद शेयर अपने 52 हफ्तों के उच्च स्तर से 13% से ज्यादा नीचे है।
प्रबंधन का भरोसा
बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी वी. वैद्यनाथन ने इस घटना को “अलग-थलग मामला” बताया है। उनका कहना है कि पिछले 10 सालों में यह पहला बड़ा ऑपरेशनल झटका है और बैंक इससे सीख लेकर जरूरी बदलाव करेगा।
उन्होंने कहा कि बैंक की बुनियादी स्थिति मजबूत है। जमा राशि पिछले सात साल में तेजी से बढ़ी है। विलय के समय यह लगभग ₹38,000 करोड़ थी, जो अब बढ़कर करीब ₹2.8 लाख करोड़ हो गई है। बैंक का कहना है कि नेट इंटरेस्ट मार्जिन बढ़ रहा है और इस तिमाही में क्रेडिट लागत कम होने की उम्मीद है। प्रबंधन का मानना है कि बैंक इस नुकसान को संभालने की क्षमता रखता है।
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह पूरा असर मार्च वित्त वर्ष 2026 में लिया जाएगा, तो उन्होंने कहा कि अभी समय बताना मुश्किल है। रिकवरी, कानूनी स्थिति और दावों की पुष्टि के बाद ही निर्णय लिया जाएगा।
निवेशकों की प्रतिक्रिया
बैंक के बड़े निवेशकों में वारबर्ग पिंकस और ADIA जैसे नाम शामिल हैं। वैद्यनाथन ने कहा कि बोर्ड में शामिल निवेशक पूरी जानकारी रखते हैं और बैंक पर भरोसा जताते हैं। उनका कहना है कि निवेशकों ने बैंक से कहा है कि मजबूत कारोबार पर ध्यान दें, यह समय भी गुजर जाएगा।
प्रबंधन का दावा है कि बैंक की ब्रांड छवि मजबूत है और ग्राहक अनुभव अच्छा है। उनका मानना है कि यह घटना दीर्घकालिक विकास की कहानी को नहीं बदलती।
आगे क्या?
फिलहाल तीन चीजें अहम हैं:
- फॉरेंसिक ऑडिट की रिपोर्ट – इससे साफ होगा कि गड़बड़ी कैसे हुई और जिम्मेदार कौन है।
- संभावित रिकवरी – यदि कुछ राशि वापस मिलती है, तो वित्तीय असर कम हो सकता है।
- कानूनी प्रक्रिया – जांच एजेंसियों की कार्रवाई और अदालत का रुख भी अहम होगा।
निवेशकों के लिए यह समय सावधानी का है। बैंक ने भरोसा दिलाया है कि मामला सीमित दायरे में है और पूरे सिस्टम पर असर नहीं है। लेकिन बाजार आमतौर पर ऐसी खबरों पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है।
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