भारत बना रहा बेबी ब्रह्मोस: क्या ‘बेबी ब्रह्मोस’ बदल देगा जंग का गणित

दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतें इन दिनों ऐसे हथियारों पर तेजी से निवेश कर रही हैं, जो दुश्मन की सीमा के भीतर दूर तक सटीक हमला कर सकें। मिसाइलों की रेंज, रफ्तार और दुश्मन की पकड़ से बचने की क्षमता अब आधुनिक युद्ध की पहचान बन चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की लड़ाइयां लंबी चल सकती हैं। ऐसे में केवल महंगे हथियार ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में किफायती और भरोसेमंद सिस्टम होना भी जरूरी है।

 

इसी बदलते माहौल में भारत ने अपनी रणनीति को नए सिरे से ढालना शुरू किया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पिनाका रॉकेट सिस्टम के एक नए हवाई संस्करण (Air-Launched Version) पर काम किया है। यह कदम भारत की मारक क्षमता को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।

 

पिनाका: जमीन से आसमान तक

पिनाका मूल रूप से भारतीय सेना के लिए बनाया गया मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (Multi-Barrel Rocket Launcher) है। इसे 8×8 हाई मोबिलिटी मिलिट्री ट्रक पर लगाया जाता है। एक लॉन्चर ट्रक में 12 रॉकेट ट्यूब होते हैं। यह सिस्टम रेगिस्तान, पहाड़ और मैदानी इलाकों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी खासियत यह है कि यह फायर करने के बाद तुरंत स्थान बदल सकता है, जिससे दुश्मन के लिए इसे निशाना बनाना मुश्किल होता है।

 

पिनाका का इस्तेमाल 1999 के कारगिल युद्ध में भी हुआ था। इसके बाद इसे सेना में शामिल किया गया और समय-समय पर इसके अलग-अलग संस्करण विकसित किए गए।

अब इसे लड़ाकू विमानों से दागे जाने योग्य बनाया गया है। हवाई संस्करण में इसकी लंबाई घटाकर लगभग 4.8 मीटर की गई है ताकि यह फाइटर जेट पर फिट हो सके। ऊंचाई से छोड़े जाने के बाद यह अपने पंखों जैसी सतहों की मदद से लक्ष्य की ओर ग्लाइड करता है और बीच रास्ते में दिशा बदलने की क्षमता भी रखता है। इससे इसे रोकना कठिन हो जाता है।

Baby BrahMos missile

ब्रह्मोस से तुलना क्यों?

जब भी किसी नए हमलावर हथियार की बात होती है, तो तुलना ब्रह्मोस (BrahMos) से होती है। ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (Supersonic Cruise Missile) है, जो लगभग मैक 3 की गति से उड़ती है। यह युद्धपोत, मजबूत बंकर और कमांड सेंटर जैसे बड़े लक्ष्यों को नष्ट करने के लिए बनाई गई है। इसकी कीमत लगभग 35 से 40 करोड़ रुपये प्रति मिसाइल मानी जाती है।

 

इसके मुकाबले पिनाका की एक यूनिट की लागत करीब 2.3 करोड़ रुपये बताई जाती है। यानी कीमत के लिहाज से यह कहीं ज्यादा किफायती है। पिनाका का मकसद बड़े रणनीतिक ठिकानों को खत्म करना नहीं, बल्कि सीमित क्षेत्र में तेजी से और सटीक हमला करना है। यह दुश्मन के टैंक, सैनिक जमावड़े, एयरफील्ड और आगे की सप्लाई लाइन को निशाना बना सकता है।

 

सीधे शब्दों में कहें तो जहां ब्रह्मोस बड़े और भारी लक्ष्य के लिए है, वहीं पिनाका कम लागत में तेज और सटीक जवाब देने का साधन है। दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन दोनों घातक हैं।

 

कम लागत, बड़ा असर

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हवाई पिनाका का मकसद महंगे स्टैंड-ऑफ वेपन (Stand-Off Weapon) जैसा प्रभाव पैदा करना है, लेकिन कम खर्च में। अगर यही क्षमता विदेश से खरीदी जाए तो कीमत लगभग 10 गुना तक हो सकती है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका का M142 HIMARS सिस्टम लगभग 20 करोड़ रुपये प्रति यूनिट तक पड़ सकता है।

 

ऐसे में भारत का स्वदेशी विकल्प न केवल घरेलू जरूरतें पूरी करता है, बल्कि निर्यात के लिहाज से भी आकर्षक बनता है। रक्षा क्षेत्र में खबर है कि फ्रांस ने भी पिनाका में रुचि दिखाई है। फ्रांसीसी सेना अपने पुराने रॉकेट आर्टिलरी सिस्टम को बदलने की योजना बना रही है और पिनाका को संभावित विकल्प के तौर पर देख रही है। हालांकि अभी कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है।

 

जंग से मिले सबक

हाल के संघर्षों ने यह दिखाया है कि युद्ध केवल महंगे हथियारों से नहीं जीते जाते। इजरायल-हमास संघर्ष में इजरायल को हजारों सस्ते रॉकेट रोकने के लिए लाखों की मिसाइलें दागनी पड़ीं। यूक्रेन युद्ध में सस्ते ड्रोन ने महंगे टैंकों को तबाह कर दिया। इससे यह समझ बढ़ी कि किफायती हथियारों का बड़ा भंडार रखना जरूरी है।

 

सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने भी कहा है कि अगर देश के पास कम लागत में तैयार उच्च तकनीक वाले हथियार होंगे, तो लंबी और घनी लड़ाई (High Density War) में बढ़त बनाई जा सकती है।

 

संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में जोर दिया है कि भारत को ऐसे हथियारों की जरूरत है, जिन्हें बड़े पैमाने पर देश के भीतर ही बनाया जा सके। बजट में भी स्वदेशी खरीद के लिए बड़ा हिस्सा सुरक्षित रखा गया है ताकि संकट के समय विदेशी सप्लाई पर निर्भरता कम हो।

 

पिनाका के अलग-अलग संस्करण

पिनाका के कई वेरिएंट विकसित किए गए हैं:

  • Mk-I: 37 से 40 किलोमीटर तक (अनगाइडेड)
  • Mk-I एन्हांस्ड: 45 से 60 किलोमीटर
  • Mk-II: 60 से 75 किलोमीटर
  • गाइडेड पिनाका: 75 से 90 किलोमीटर
  • LRGR-120 / Mk-III: 90 से 120 किलोमीटर (गाइडेड)

इनमें गाइडेड संस्करण में नेविगेशन सिस्टम लगा होता है, जिससे दूर से भी सटीक निशाना साधा जा सकता है।

 

इजरायल के साथ समानांतर बातचीत

भारत केवल स्वदेशी सिस्टम पर ही निर्भर नहीं है। खबर है कि इजरायल ने “गोल्डन होराइजन” नाम की एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (Air-Launched Ballistic Missile) की पेशकश की है। इसकी अनुमानित रेंज 1,000 से 2,000 किलोमीटर बताई जा रही है। अगर इसे शामिल किया जाता है, तो यह भारतीय वायुसेना के सुखोई Su-30MKI बेड़े के साथ काम कर सकती है।

 

यह मिसाइल गहरे और मजबूत लक्ष्यों, जैसे भूमिगत बंकर, को भेदने के लिए डिजाइन की गई मानी जा रही है। ऊंचाई पर छोड़े जाने के बाद यह तेज गति से ऊपर उठेगी और फिर बहुत अधिक रफ्तार से नीचे आएगी, जिससे टकराव के समय इसकी मारक क्षमता बढ़ जाएगी।

 

बहु-स्तरीय रणनीति

भारत अब एक ऐसी परतदार (layered) रणनीति बना रहा है, जिसमें अलग-अलग स्तर के हथियार शामिल हों। पिनाका जैसे टैक्टिकल रॉकेट, ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइल और संभावित एयर-लॉन्च्ड बैलिस्टिक सिस्टम-ये सभी मिलकर युद्ध के अलग-अलग स्तर पर विकल्प देते हैं।

 

इस पूरी रणनीति में सबसे बड़ा बदलाव है-लागत का संतुलन। 2.3 करोड़ रुपये में एक सटीक हवाई हमला करने की क्षमता खरीद गणित को बदल देती है। इससे न केवल भारत की जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि निर्यात बाजार में भी भारत की स्थिति मजबूत हो सकती है।