सोमवार को अमेरिकी टेक दिग्गज IBM के शेयरों में ऐसी गिरावट दर्ज हुई, जिसने निवेशकों को चौंका दिया। कंपनी का स्टॉक एक ही दिन में 13.2 प्रतिशत टूटकर 223.35 डॉलर पर बंद हुआ। यह गिरावट 18 अक्टूबर 2000 के बाद की सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट मानी जा रही है। इस साल अब तक शेयर करीब 25 प्रतिशत नीचे आ चुका है। सवाल उठ रहा है-आखिर ऐसा क्या हुआ कि बाजार ने इतनी तेज प्रतिक्रिया दी?
इस गिरावट की वजह सीधे तौर पर एक AI स्टार्टअप Anthropic की घोषणा को माना जा रहा है। कंपनी ने दावा किया कि उसका AI टूल “Claude Code” अब COBOL नाम की पुरानी प्रोग्रामिंग भाषा को समझ सकता है, उसका विश्लेषण कर सकता है और उसे आधुनिक भाषाओं में बदलने की प्रक्रिया को काफी हद तक ऑटोमेट कर सकता है। यही वह क्षेत्र है, जहां IBM दशकों से मजबूत स्थिति में रहा है।
COBOL क्या है और यह आज भी क्यों अहम है?
COBOL का पूरा नाम है Common Business-Oriented Language। इसे 1959 में बनाया गया था। उस समय इसका मकसद था-बड़े पैमाने पर कारोबारी डेटा को संभालना। जैसे बैंकिंग ट्रांजैक्शन, पेरोल, सरकारी रिकॉर्ड और एयरलाइन बुकिंग सिस्टम।
करीब 66 साल बाद भी यह भाषा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अनुमान है कि अमेरिका में लगभग 95 प्रतिशत एटीएम ट्रांजैक्शन अब भी COBOL पर आधारित सिस्टम से गुजरते हैं। आमने-सामने स्वाइप होने वाले लगभग 80 प्रतिशत क्रेडिट कार्ड लेन-देन भी इसी तकनीक पर निर्भर हैं। दुनिया भर में करीब 250 अरब लाइनों का COBOL कोड अभी भी इस्तेमाल में है। यह कोड मुख्य रूप से IBM के मेनफ्रेम कंप्यूटरों पर चलता है।

IBM और मेनफ्रेम का रिश्ता
IBM केवल COBOL का उपयोग करने वाली कंपनी नहीं है, बल्कि उसने ऐसे बड़े सर्वर सिस्टम यानी मेनफ्रेम बनाए और बेचे हैं, जिन पर यह भाषा चलती है। बैंक, बीमा कंपनियां और सरकारी विभाग इन मेनफ्रेम पर बड़े स्तर के ट्रांजैक्शन प्रोसेस करते हैं।
IBM की कमाई का एक बड़ा हिस्सा हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर लाइसेंस, अपग्रेड और इन सिस्टमों के आधुनिकीकरण (modernisation) से आता है। कंपनी की रणनीति यह रही है कि COBOL को पूरी तरह हटाने के बजाय उसे नई तकनीकों से जोड़ा जाए-जैसे क्लाउड ऐप्स से कनेक्ट करना या API के जरिए आधुनिक सिस्टम के साथ जोड़ना।
समस्या कहां है?
COBOL तकनीकी रूप से आज भी मजबूत है, लेकिन इसे समझने वाले लोगों की संख्या लगातार घट रही है। आज के ज्यादातर कंप्यूटर साइंस छात्र Python, Java और क्लाउड आधारित तकनीकों में प्रशिक्षित होते हैं। COBOL पर काम करना करियर के लिहाज से आकर्षक नहीं माना जाता।
इससे एक टैलेंट की कमी पैदा हो गई है। कंपनियों को पुराने सिस्टम संभालने के लिए कम होते विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे लागत बढ़ती है। कोविड-19 के दौरान अमेरिका के कई राज्यों को बेरोजगारी लाभ सिस्टम चलाने में दिक्कत आई, क्योंकि वे COBOL पर आधारित थे और विशेषज्ञों की कमी थी।
कई बैंकों ने COBOL से बाहर निकलने के लिए लंबी और महंगी परियोजनाएं शुरू कीं, लेकिन कुछ मामलों में सर्विस बाधित हुई और जुर्माने भी लगे। कई संगठनों के लिए पुराना कोड समझना, उसे फिर से लिखने से भी ज्यादा महंगा साबित हुआ। यही वजह है कि इतना पुराना सिस्टम आज भी चल रहा है।
Anthropic ने क्या दावा किया?
Anthropic ने अपने ब्लॉग पोस्ट में कहा कि Claude Code हजारों लाइनों के COBOL कोड का विश्लेषण कर सकता है। यह कोड के बीच संबंधों (dependencies) को पहचान सकता है, वर्कफ्लो का डॉक्यूमेंटेशन तैयार कर सकता है और संभावित जोखिमों को चिन्हित कर सकता है-वह भी कम समय में।
कंपनी का कहना है कि जो काम पहले कई महीनों या सालों तक चलता था और जिसमें बड़ी कंसल्टिंग टीम लगती थी, अब उसे कुछ तिमाहियों में पूरा किया जा सकता है। Anthropic ने “Code Modernisation Playbook” भी जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि AI एजेंट पहले COBOL और JCL स्क्रिप्ट पढ़ेंगे, बिजनेस लॉजिक निकालेंगे, फिर उसे Java या Python में बदलेंगे और टेस्टिंग भी करेंगे।
कंपनी का तर्क है कि आधुनिकीकरण रुकता इसलिए था क्योंकि पुराने कोड को समझना ही सबसे महंगा हिस्सा था। AI इस लागत और समय को कम कर देता है।
बाजार क्यों घबराया?
निवेशकों को डर है कि अगर AI वाकई इतना सक्षम हो गया है, तो IBM और अन्य आईटी सेवा कंपनियों का वह मॉडल प्रभावित हो सकता है, जिसमें वर्षों तक चलने वाली आधुनिकीकरण परियोजनाएं शामिल होती हैं। अगर AI समझने, डॉक्यूमेंटेशन और माइग्रेशन का बड़ा हिस्सा खुद कर ले, तो कंसल्टिंग और इंटीग्रेशन सेवाओं की मांग घट सकती है।
IBM का 13.2 प्रतिशत गिरना केवल एक शेयर की कहानी नहीं है। फरवरी महीने में ही स्टॉक करीब 26 प्रतिशत गिर चुका है। यह 1968 के बाद का सबसे खराब मासिक प्रदर्शन हो सकता है।
Anthropic ने हाल ही में Claude Code में एक सुरक्षा स्कैनिंग फीचर भी जोड़ा। इसके बाद साइबर सुरक्षा कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखी गई। एक प्रमुख सॉफ्टवेयर ETF इस साल 27 प्रतिशत गिर चुका है, जो 2008 के वित्तीय संकट के बाद की सबसे बड़ी तिमाही गिरावट है।
असर भारत तक
AI को लेकर चिंता केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत में भी आईटी शेयर दबाव में आए हैं। 24 फरवरी को निफ्टी आईटी इंडेक्स करीब 4 प्रतिशत गिरा। निवेशकों को डर है कि अगर AI से बड़े प्रोजेक्ट्स का काम कम समय और कम लोगों में हो सकेगा, तो बड़ी डिलीवरी टीमों की जरूरत घट सकती है।
हालांकि, उद्योग के कुछ नेता इस चिंता से सहमत नहीं हैं। विप्रो के मुख्य रणनीतिक और तकनीकी अधिकारी हरि शेट्टी का कहना है कि AI से काम का दायरा बढ़ेगा, घटेगा नहीं। उनका मानना है कि नई तकनीक नई संभावनाएं खोलती है।
वहीं, इन्फोसिस के पूर्व सीईओ विशाल सिक्का ने चेतावनी दी है कि जेनरेटिव AI पहले ही एंटरप्राइज प्रोजेक्ट्स के काम करने के तरीके को बदल रहा है। उनके अनुसार, कोड माइग्रेशन और सिस्टम इंटीग्रेशन में उत्पादकता बढ़ी है और यह बदलाव वास्तविक है।
“वाइब कोडिंग” का डर
बाजार में एक नया शब्द चल रहा है-“वाइब कोडिंग।” इसका मतलब है कि AI सामान्य भाषा में दिए गए निर्देशों से काम करने वाला सॉफ्टवेयर बना सकता है। इससे निवेशक यह सोचने लगे हैं कि भविष्य में सॉफ्टवेयर टूल्स और कंसल्टिंग सेवाओं की कीमत और मांग दोनों पर दबाव आ सकता है।
यह चिंता केवल IBM तक सीमित नहीं है। आईटी सेवाएं देने वाली बड़ी कंपनियां, कंसल्टिंग फर्म और एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर कंपनियां-सभी पर असर पड़ सकता है।
क्या COBOL खत्म हो जाएगा?
फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि COBOL रातों-रात गायब हो जाएगा। बैंकिंग और सरकारी सिस्टम बेहद जटिल होते हैं। इनमें दशकों का डेटा, नियम और प्रक्रियाएं जुड़ी होती हैं। किसी भी माइग्रेशन में कानूनी और नियामकीय पहलू भी शामिल होते हैं।
सवाल यह है कि क्या AI बड़े पैमाने पर, वास्तविक एंटरप्राइज स्तर पर इन चुनौतियों को संभाल पाएगा? या फिर यह दावा फिलहाल प्रयोगात्मक स्तर तक सीमित है?
आगे की राह
बाजार ने फिलहाल यह मान लिया है कि महंगी और लंबी आधुनिकीकरण परियोजनाओं का दौर खत्म हो सकता है। लेकिन असली तस्वीर आने वाले महीनों में साफ होगी। अगर AI वाकई बड़े पैमाने पर सफल हुआ, तो आईटी उद्योग का मॉडल बदल सकता है। अगर नहीं, तो मौजूदा कंपनियां खुद AI को अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत कर सकती हैं।

