वेनेजुएला से भारत की ओर कच्चे तेल की सप्लाई एक बार फिर तेज होती दिख रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार तेल छोटे जहाजों में नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े ऑयल टैंकरों में भरकर भेजा जा रहा है। हाल ही में काराकस और वॉशिंगटन के बीच हुए सप्लाई समझौते के बाद अमेरिका ने कुछ पाबंदियों में ढील दी है। इसके बाद वेनेजुएला के तेल निर्यात में तेजी आई है और अब बड़े जहाज सीधे भारत का रुख कर रहे हैं।
सुपर साइज टैंकरों की एंट्री
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेडिंग कंपनियों और खरीदारों ने वेनेजुएला से तेल उठाने के लिए पहली बार बहुत बड़े क्रूड कैरियर यानी VLCC बुक किए हैं। ये जहाज करीब 20 लाख बैरल तक कच्चा तेल ले जा सकते हैं। यह मात्रा सुएजमैक्स जहाजों से लगभग दोगुनी और अफ्रामैक्स जहाजों से लगभग चार गुना ज्यादा है।
इन बड़े जहाजों के इस्तेमाल से माल ढुलाई की लागत कम होती है और डिलीवरी की रफ्तार भी बढ़ती है। इसका मतलब है कि भारत तक तेल कम खर्च में और कम समय में पहुंच सकता है।

किन जहाजों को मिला लोडिंग स्लॉट?
कम से कम तीन बड़े टैंकर-निसोस केआ, निसोस किथ्नोस और अरजानाह-को मार्च में जोसे टर्मिनल से लोडिंग का समय दिया गया है। यह टर्मिनल वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA चलाती है और देश के करीब 70% तेल निर्यात यहीं से होता है। इन तीनों जहाजों को विटोल और ट्रैफिगुरा ने चार्टर किया है और ये भारत के लिए रवाना होने वाले हैं।
इसके अलावा एक और सुपरटैंकर ‘ओलंपिक लायन’ ने भी अपना गंतव्य वेनेजुएला बताया है और वह मार्च के आखिरी हिस्से में वहां पहुंच सकता है। इन बड़े जहाजों की तैनाती से साफ है कि वेनेजुएला का तेल निर्यात फिर पटरी पर लौट रहा है।
भारत के लिए सही समय
भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह बदलाव अहम समय पर आया है। साल 2019 में अमेरिका की पाबंदियों से पहले भारत वेनेजुएला का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार था। लेकिन प्रतिबंधों के कारण सप्लाई लगभग रुक गई थी। अब नए लाइसेंस ढांचे के तहत अमेरिका ने कुछ राहत दी है, जिससे कारोबार दोबारा शुरू हो सका है।
हाल ही में अमेरिकी कंपनी शेवरॉन ने दिसंबर 2023 के बाद पहली बार वेनेजुएला का बोस्कान ग्रेड कच्चा तेल रिलायंस इंडस्ट्रीज को बेचा है। यह लगभग छह साल में इस तरह की पहली डील मानी जा रही है। इसके अलावा रिलायंस ने विटोल से 20 लाख बैरल का एक और कार्गो भी खरीदा है और वह सीधे PDVSA से खरीद की संभावना भी तलाश रही है।
अन्य भारतीय कंपनियां भी सक्रिय
ट्रेडिंग कंपनियों ने वेनेजुएला का हेवी क्रूड इंडियन ऑयल कॉर्प, भारत पेट्रोलियम कॉर्प और एचपीसीएल मित्तल एनर्जी को भी बेचा है। भारत फिलहाल अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके। रूस से आयात बढ़ने के बाद अब भारत दूसरे विकल्पों को भी मजबूत करना चाहता है।
वेनेजुएला का ‘मेरे’ हेवी क्रूड आम तौर पर ब्रेंट के मुकाबले करीब 15 डॉलर प्रति बैरल सस्ता माना गया था, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को फायदा होता है। हालांकि बाजार में ‘बैकवर्डेशन’ की स्थिति-जहां आगे की डिलीवरी सस्ती और तुरंत डिलीवरी महंगी होती है-के कारण मुनाफा कुछ कम हुआ है। फिर भी बड़े जहाजों से ढुलाई का खर्च घट सकता है, जिससे सौदा बेहतर बन सकता है।
निर्यात में तेजी, लेकिन स्टोरेज भरा
जनवरी में वेनेजुएला का तेल निर्यात बढ़कर करीब 8 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया, जबकि दिसंबर में यह लगभग 5 लाख बैरल प्रतिदिन था। तेजी से बढ़ते निर्यात के कारण देश के स्टोरेज टैंकों में लाखों बैरल तेल जमा हो गया है। बड़े जहाजों के जरिए तेज शिपमेंट से इस अतिरिक्त स्टॉक को कम करने में मदद मिल सकती है।
इस साल की शुरुआत में ज्यादातर शिपमेंट मध्यम आकार के जहाजों-जैसे पनामैक्स और अफ्रामैक्स-से अमेरिका या कैरिबियाई स्टोरेज टर्मिनलों तक भेजी गई थीं। वहां से आगे यूरोप और अमेरिका के बंदरगाहों तक तेल पहुंचाया जाता था। अब सीधे VLCC के जरिए भारत भेजना एक बड़ा लॉजिस्टिक बदलाव है।
अमेरिका की भूमिका
अमेरिकी कंपनी शेवरॉन और कुछ अमेरिकी रिफाइनरियां-जैसे वैलेरो एनर्जी, फिलिप्स 66 और सिटगो पेट्रोलियम-भी वेनेजुएला के तेल की प्रोसेसिंग बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। इससे निर्यात स्तर और ऊपर जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार, शेवरॉन और कुछ अमेरिकी रिफाइनरों ने अफ्रामैक्स और पनामैक्स जहाजों को समय-आधारित अनुबंध पर लिया है, ताकि वे वेनेजुएला के तेल को ही ढो सकें। इससे सप्लाई चेन में स्थिरता आएगी।
आगे क्या?
बड़े टैंकरों की तैनाती से साफ है कि वेनेजुएला भारत को फिर से एक अहम बाजार के रूप में देख रहा है। भारत के लिए भी यह मौका है कि वह रियायती दर पर हेवी क्रूड खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करे और सप्लाई के स्रोतों को संतुलित रखे।

