दिल्ली में आयोजित AI समिट के दौरान हुए शर्टलेस प्रदर्शन के मामले ने दो राज्यों की पुलिस को आमने-सामने ला खड़ा किया। इंडियन यूथ कांग्रेस के तीन नेताओं की गिरफ्तारी को लेकर दिल्ली और हिमाचल पुलिस के बीच करीब 18 घंटे तक खींचतान चली। मामला इतना बढ़ गया कि रातभर नाकाबंदी, कोर्ट में बहस, मेडिकल जांच और ट्रांजिट रिमांड की प्रक्रिया के बाद ही दिल्ली पुलिस आरोपियों को अपने साथ ले जा सकी।
यह पूरा विवाद 20 फरवरी को दिल्ली के भारत मंडपम में हुए एक प्रदर्शन से जुड़ा है। उस दिन इंडियन यूथ कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने AI समिट के दौरान शर्ट उतारकर विरोध किया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर वाली टी-शर्ट लहराई थी। टी-शर्ट पर मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर के साथ “PM इज कॉम्प्रोमाइज्ड” लिखा था। प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी भी की गई थी।
शिमला के पास होटल से गिरफ्तारी
दिल्ली पुलिस को सूचना मिली थी कि इस प्रदर्शन में शामिल तीन नेता-अरबाज, सौरव और सिद्धार्थ-हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू क्षेत्र के चिड़गांव स्थित एक होटल में ठहरे हुए हैं। ये तीनों मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से जुड़े बताए गए हैं।
बुधवार, 25 फरवरी को सुबह दिल्ली पुलिस की 18 सदस्यीय टीम सादे कपड़ों में तीन गाड़ियों से शिमला से लगभग 120 किलोमीटर दूर चिड़गांव पहुंची। वहां स्थित चांशल होटल से तीनों को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने होटल के रजिस्टर और CCTV की DVR भी अपने कब्जे में ली ताकि सबूत सुरक्षित रखे जा सकें।
दिल्ली पुलिस की टीम तीनों को लेकर वापस निकल गई। लेकिन यहीं से मामला उलझ गया।

हिमाचल पुलिस ने रोका रास्ता
जैसे ही हिमाचल पुलिस को पता चला कि बिना औपचारिक सूचना के राज्य में कार्रवाई की गई है, उसने तुरंत नाकाबंदी कर दी। शिमला बस स्टैंड, शोघी और सोलन के धर्मपुर में पुलिस ने नाके लगाए। अलग-अलग जगहों पर दिल्ली पुलिस की गाड़ियों को रोक लिया गया।
हिमाचल पुलिस का कहना था कि किसी भी दूसरे राज्य की पुलिस जब दबिश देती है, तो स्थानीय पुलिस को पहले से सूचना देना जरूरी होता है। उनके अनुसार, दिल्ली पुलिस ने यह प्रोटोकॉल नहीं अपनाया। इसके बाद तीनों नेताओं को दिल्ली पुलिस की कस्टडी से लेकर हिमाचल पुलिस अपने साथ शिमला ले गई।
कोर्ट में आमना-सामना
बुधवार शाम करीब 4:45 बजे तीनों को शिमला की चक्कर कोर्ट में पेश किया गया। वहां दिल्ली और हिमाचल पुलिस के अधिकारियों के बीच तीखी बहस हुई। हिमाचल पुलिस ने कोर्ट को बताया कि उन्हें पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी।
दिल्ली पुलिस का पक्ष था कि वे कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रहे थे। बहस के दौरान कोर्ट ने पूरे मामले की फाइल तैयार करने के निर्देश दिए।
शाम करीब 7:25 बजे दिल्ली पुलिस फिर तीनों को लेकर शिमला से रवाना हुई। लेकिन शोघी के पास एक बार फिर उन्हें रोक लिया गया। हिमाचल पुलिस का कहना था कि आरोपियों को दूसरे राज्य ले जाने के लिए ट्रांजिट रिमांड जरूरी है और उनके पास वैध दस्तावेज नहीं हैं। यहां तक कि FIR दर्ज करने की चेतावनी भी दी गई।
मेडिकल और ट्रांजिट रिमांड
रात करीब 11:30 बजे हिमाचल पुलिस तीनों को मेडिकल जांच के लिए शिमला के रिपन अस्पताल लेकर गई। मेडिकल के बाद देर रात करीब 2 बजे उन्हें CJM के घर पर पेश किया गया। वहां से दिल्ली पुलिस को ट्रांजिट रिमांड मिला।
इसके बाद गुरुवार सुबह लगभग 5:45 बजे दिल्ली पुलिस तीनों नेताओं को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हो गई। इस तरह करीब 18 घंटे तक चला यह घटनाक्रम खत्म हुआ।
दिल्ली पुलिस की जांच
दिल्ली पुलिस के सूत्रों के अनुसार, तीनों नेता 24 फरवरी से होटल में छिपे हुए थे। उन्हें एक स्थानीय कांग्रेसी नेता ने कमरा दिलाया था। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि कमरा किसके नाम पर बुक था और उनसे मिलने कौन-कौन आया था। होटल के मालिक और रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया है। इनमें आपराधिक साजिश, सरकारी कर्मचारी को चोट पहुंचाना, काम में बाधा डालना और अन्य गंभीर आरोप शामिल हैं।
हिमाचल पुलिस का पक्ष
शिमला के SSP गौरव सिंह ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि 15-20 अज्ञात लोग सादे कपड़ों में आए और होटल में ठहरे तीन मेहमानों को जबरन ले गए। होटल मालिक की शिकायत पर चिड़गांव में केस दर्ज किया गया।
हिमाचल पुलिस का कहना है कि यदि किसी दबिश के दौरान कोई अप्रिय घटना हो जाती, तो उसकी जिम्मेदारी राज्य पुलिस की होती। इसलिए सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिहाज से पहले सूचना देना जरूरी है।
हिमाचल हाईकोर्ट के एडवोकेट पवन शर्मा ने भी कहा कि दूसरे राज्य की पुलिस को कार्रवाई से पहले स्थानीय पुलिस को जानकारी देना अनिवार्य होता है। यह सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि सुरक्षा से जुड़ा नियम है।
राजनीतिक बयानबाजी तेज
इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक बयान भी तेज हो गए। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि हिमाचल देवभूमि है, इसे अपराधियों की शरणस्थली नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि खराब करने की कोशिश की गई और ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
वहीं, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने पर लाठी और मुकदमे मिलते हैं।
राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में कहा कि पेपर लीक से परेशान युवाओं से लेकर महिला पहलवानों और किसानों तक, कई मामलों में असहमति को दबाया गया। उन्होंने AI समिट के दौरान हुए विरोध को भी इसी क्रम में बताया।
AI समिट विवाद की पृष्ठभूमि
20 फरवरी को भारत मंडपम में AI समिट 2026 आयोजित था। इस दौरान यूथ कांग्रेस के 11 कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर कार्यक्रम स्थल में घुसकर शर्ट उतारकर प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि वे भारत-अमेरिका ट्रेड डील के खिलाफ विरोध दर्ज कर रहे हैं।
टी-शर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर के साथ “PM इज कॉम्प्रोमाइज्ड” लिखा था। दिल्ली पुलिस ने इसे सुरक्षा में सेंध और सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा बताया।
कानून बनाम राजनीति?
यह मामला अब सिर्फ गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि दो राज्यों की पुलिस के बीच अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया का बन गया है। एक पक्ष कह रहा है कि कानून के तहत कार्रवाई की गई, तो दूसरा पक्ष प्रोटोकॉल की अनदेखी की बात कर रहा है।
सवाल यह भी है कि क्या इस पूरे घटनाक्रम को बेहतर तालमेल से टाला जा सकता था? क्या स्थानीय पुलिस को पहले सूचना देकर यह टकराव रोका जा सकता था?
दिल्ली पुलिस अब आरोपियों को लेकर आगे की पूछताछ कर रही है, जबकि हिमाचल पुलिस ने भी अपनी ओर से दर्ज केस की जांच शुरू कर दी है।
AI समिट में हुए इस विरोध ने न सिर्फ राजनीतिक माहौल गरमा दिया है, बल्कि पुलिस की कार्रवाई और प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में कोर्ट और जांच एजेंसियों की भूमिका इस विवाद को किस दिशा में ले जाएगी, यह देखना अहम होगा।

