रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर: डॉलर के मुकाबले 92 पार, क्या इजराइल-ईरान तनाव भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा है?

भारतीय मुद्रा यानी रुपया एक बार फिर दबाव में दिखाई दे रहा है। 4 मार्च को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तेज गिरावट के साथ 92.28 के स्तर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इससे पहले जनवरी में रुपया 91.98 तक गिरा था, लेकिन इस बार गिरावट और गहरी हो गई।


विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल-ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने रुपए पर भारी दबाव बना दिया है।


हाल के महीनों में वैश्विक स्तर पर अस्थिरता बढ़ी है, जिसका असर भारत सहित कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ रहा है। इस साल अब तक रुपया लगभग 2% से अधिक कमजोर हो चुका है। इसी वजह से 2026 में रुपया उभरते बाजारों की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है।


फॉरेक्स बाजार में क्या हुआ
बुधवार को इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 92.05 के स्तर पर खुला। कारोबार के दौरान यह और गिरकर 92.35 तक पहुंच गया, जो दिन का सबसे निचला स्तर था। बाद में कारोबार खत्म होने पर रुपया 92.05 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह पहली बार है जब भारतीय मुद्रा इस स्तर के आसपास बंद हुई है।


एक दिन पहले यानी मंगलवार को घरेलू विदेशी मुद्रा बाजार बंद था क्योंकि उस दिन होली की छुट्टी थी। उससे पहले सोमवार को भी रुपया 41 पैसे गिरकर 91.49 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।


मिडिल-ईस्ट संकट का असर
फॉरेक्स ट्रेडर्स का कहना है कि वैश्विक स्तर पर निवेशकों का मूड अचानक बदल गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और मिडिल-ईस्ट में बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने दुनिया भर के बाजारों को प्रभावित किया है।


जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संकट बढ़ता है, तो निवेशक जोखिम से बचने के लिए सुरक्षित निवेश विकल्प तलाशते हैं। इस समय अमेरिकी डॉलर को सुरक्षित निवेश माना जा रहा है। यही कारण है कि डॉलर मजबूत हो रहा है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं, जिनमें रुपया भी शामिल है, कमजोर हो रही हैं।

Rupee crosses 92 against dollar

रुपए की गिरावट के पीछे तीन बड़ी वजह

 

  1. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल : मिडिल-ईस्ट में इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। जब तेल महंगा होता है तो उसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
  2. निवेशकों का सुरक्षित विकल्प की ओर झुकाव: वैश्विक संकट के समय निवेशक शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले निवेश से पैसा निकालकर सुरक्षित संपत्तियों में निवेश करते हैं। डॉलर को दुनिया की सबसे सुरक्षित मुद्रा माना जाता है।
    यही वजह है कि विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं और डॉलर खरीद रहे हैं। इससे भी रुपए पर दबाव बढ़ रहा है।
  3. महंगाई बढ़ने की आशंका: तेल की कीमत बढ़ने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इसका असर धीरे-धीरे रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर पड़ता है।
    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल लंबे समय तक महंगा रहता है तो भारत में महंगाई बढ़ सकती है। इसी डर से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से दूरी बना रहे हैं।

 

विदेशी निवेशकों की बिकवाली

बाजार के आंकड़ों के अनुसार विदेशी निवेशकों ने बुधवार को भारतीय शेयर बाजार में करीब 8,752.65 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए।


विदेशी निवेशकों की इस बिकवाली ने भी रुपए की कमजोरी को और बढ़ा दिया।

 

शेयर बाजार पर भी असर

रुपए की गिरावट और वैश्विक तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला।बीएसई सेंसेक्स 1,122.66 अंक गिरकर 79,116.19 पर बंद हुआ। वहीं एनएसई निफ्टी 385.20 अंक टूटकर 24,480.50 के स्तर पर पहुंच गया।

 

डॉलर इंडेक्स और तेल बाजार

डॉलर इंडेक्स, जो डॉलर की ताकत को छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मापता है, 98.82 के आसपास कारोबार करता देखा गया। वहीं ब्रेंट क्रूड, जो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार का प्रमुख मानक है, वायदा कारोबार में लगभग 82.46 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा था।

 

ऊर्जा बाजार में यह चिंता भी बनी हुई है कि अगर मिडिल-ईस्ट का संकट बढ़ा तो होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है।

 

विशेषज्ञों की राय

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि मिडिल-ईस्ट में संघर्ष बढ़ने से निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता कम हो गई है। तेल की कीमतों में तेजी से भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर दबाव बढ़ता है। इससे महंगाई और वित्तीय घाटा दोनों बढ़ने का खतरा रहता है।

 

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अगर यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहा तो ऊर्जा और सोने के आयात पर खर्च बढ़ सकता है। इससे व्यापार घाटा भी बढ़ सकता है।

 

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा

रुपए की कमजोरी का असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।

 

विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी: अगर कोई व्यक्ति विदेश में पढ़ाई कर रहा है या विदेश घूमने की योजना बना रहा है तो उसे डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे।

 

इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे: मोबाइल फोन, लैपटॉप और कई इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स विदेश से आयात होते हैं। कंपनियां इनके भुगतान डॉलर में करती हैं। इसलिए रुपया कमजोर होने पर इनकी कीमत बढ़ सकती है।

 

पेट्रोल-डीजल की कीमतें: अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहा तो देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

 

रुपए के कमजोर होने के कुछ फायदे भी

हालांकि रुपया कमजोर होने के कुछ सकारात्मक पहलू भी होते हैं।

  • भारतीय निर्यातकों को ज्यादा फायदा मिल सकता है
  • विदेशी पर्यटकों के लिए भारत सस्ता हो जाता है
  • मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा मिल सकता है
  • विदेश से पैसा भेजने वालों को ज्यादा रुपये मिलते हैं

 

RBI की भूमिका क्या हो सकती है

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रुपया लगातार कमजोर होता रहा तो भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके डॉलर बेच सकता है, जिससे रुपए को सहारा मिल सकता है।

 

करेंसी की कीमत कैसे तय होती है

किसी भी देश की मुद्रा की कीमत मुख्य रूप से मांग और आपूर्ति पर निर्भर करती है। अगर किसी देश की मुद्रा की मांग कम हो जाती है और विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ जाती है तो उस देश की मुद्रा कमजोर हो जाती है।

 

हर देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार होता है, जिसका उपयोग अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान के लिए किया जाता है। अगर विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रहता है तो मुद्रा भी अपेक्षाकृत स्थिर रहती है।

 

आगे क्या होगा

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में रुपए की दिशा काफी हद तक मिडिल-ईस्ट की स्थिति और वैश्विक तेल बाजार पर निर्भर करेगी।
अगर क्षेत्र में तनाव कम होता है तो रुपए को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन अगर संघर्ष बढ़ता है तो दबाव जारी रह सकता है।