अमेरिका ने भारत समेत 18 देशों पर शुरू की बड़ी ट्रेड जांच… क्या बढ़ सकते हैं नए टैरिफ और प्रभावित होगा भारत का निर्यात?

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने एक बड़ा व्यापारिक कदम उठाते हुए भारत, चीन और यूरोपीय संघ सहित दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के खिलाफ जांच शुरू की है। यह जांच अमेरिका के ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 (Section 301) के तहत शुरू की गई है।

 

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि कई देशों की औद्योगिक नीतियों के कारण वैश्विक बाजार में जरूरत से ज्यादा उत्पादन हो रहा है, जिससे अमेरिकी कंपनियों और उद्योगों को नुकसान हो रहा है।

 

इस जांच के बाद अमेरिका इन देशों से आने वाले सामान पर नए आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकता है।

 

दो अलग-अलग जांच शुरू

अमेरिका के ऑफिस ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) ने बुधवार को दो अलग-अलग जांच की घोषणा की।

 

पहली जांच उन देशों की औद्योगिक क्षमता पर केंद्रित होगी जहां उत्पादन बाजार की वास्तविक मांग से ज्यादा दिखाई देता है। इसमें भारत सहित कई बड़े व्यापारिक साझेदार शामिल हैं।

 

दूसरी जांच उन वस्तुओं से जुड़ी है जिनके बारे में अमेरिका का आरोप है कि उनका उत्पादन जबरदस्ती मजदूरी (forced labour) के जरिए कराया जाता है।

US trade investigation India

Section 301 क्या है?

Section 301 अमेरिका का एक शक्तिशाली व्यापारिक कानून है। यह अमेरिकी सरकार को यह अधिकार देता है कि अगर किसी देश की नीतियां अमेरिकी व्यापार या उद्योग को नुकसान पहुंचाती हैं तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

 

इस कानून के तहत अमेरिका किसी देश की व्यापारिक नीतियों, नियमों और बाजार व्यवस्था की जांच करता है। अगर जांच में यह पाया जाता है कि संबंधित देश अनुचित व्यापारिक तरीका अपना रहा है, तो अमेरिका उस देश से आने वाले सामान पर अतिरिक्त टैरिफ, आयात प्रतिबंध या अन्य जवाबी कदम उठा सकता है।

 

महत्वपूर्ण बात यह है कि Section 301 के तहत अमेरिका को कार्रवाई के लिए विश्व व्यापार संगठन (WTO) की मंजूरी जरूरी नहीं होती।

 

किन देशों पर हो रही है जांच?

इस जांच में दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इनमें भारत, चीन, यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और मेक्सिको प्रमुख हैं।

इसके अलावा ताइवान, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे जैसे देशों को भी जांच के दायरे में रखा गया है।

 

अमेरिका का कहना है कि इन देशों में औद्योगिक उत्पादन कई बार वास्तविक बाजार मांग से अधिक दिखाई देता है।

 

अमेरिकी प्रशासन का तर्क

अमेरिकी ट्रेड प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि जांच का मकसद यह समझना है कि क्या कुछ देशों की सरकारी नीतियां कंपनियों को जरूरत से ज्यादा उत्पादन करने के लिए बढ़ावा दे रही हैं।

 

उन्होंने बताया कि कई मामलों में सरकार की ओर से मिलने वाली सब्सिडी, कम मजदूरी, सरकारी कंपनियों को विशेष समर्थन और सस्ती ऋण सुविधा जैसी नीतियां उद्योगों को बढ़ावा देती हैं।

 

अगर किसी देश में उत्पादन जरूरत से ज्यादा होता है तो कंपनियां अतिरिक्त सामान को विदेशी बाजारों में बेचने की कोशिश करती हैं। इससे अमेरिकी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान हो सकता है।

 

वैश्विक उत्पादन क्षमता भी जांच के दायरे में

इस जांच में दुनिया भर के औद्योगिक उत्पादन का भी अध्ययन किया जाएगा। अमेरिकी प्रशासन खास तौर पर ऑटोमोबाइल और उन्नत निर्माण (advanced manufacturing) जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दे रहा है।

 

उदाहरण के तौर पर अमेरिका ने चीन की इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी BYD का जिक्र किया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन पहले से ही घरेलू मांग से ज्यादा है, फिर भी कंपनियां विदेशों में अपनी फैक्ट्रियां तेजी से बढ़ा रही हैं।

 

BYD ने उज़्बेकिस्तान, थाईलैंड, ब्राजील, हंगरी और तुर्की जैसे देशों में उत्पादन शुरू किया है और यूरोप में भी विस्तार की योजना बना रही है।

 

मजबूर मजदूरी से जुड़े सामान पर भी जांच

अमेरिका ने दूसरी जांच उन उत्पादों पर केंद्रित की है जिनके बारे में आरोप है कि उनका निर्माण मजबूर मजदूरी से कराया गया है।

 

यह जांच 60 से अधिक देशों के सामान को प्रभावित कर सकती है।

 

अमेरिका पहले ही चीन के शिनजियांग क्षेत्र से जुड़े उत्पादों पर सख्त नियम लागू कर चुका है। अमेरिका का आरोप है कि वहां उइगर मुस्लिम समुदाय के लोगों से जबर्दस्ती मजदूरी कराई जाती है, हालांकि चीन इन आरोपों को नकारता रहा है।

 

जांच की प्रक्रिया क्या होगी?

USTR ने इस जांच के लिए एक समय-सीमा तय की है।

  • 15 अप्रैल तक सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी जाएंगी।
  • इसके बाद मई के शुरुआत में सार्वजनिक सुनवाई होने की संभावना है।
  • जांच पूरी होने के बाद जुलाई से पहले रिपोर्ट और संभावित कदम सामने आ सकते हैं।

अगर जांच में किसी देश की नीतियों को अनुचित पाया गया तो अमेरिका उस देश से आने वाले सामान पर अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है।

 

ट्रंप प्रशासन ने अभी यह कदम क्यों उठाया?

हाल ही में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की एक टैरिफ नीति को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था।

 

ट्रंप प्रशासन ने पहले आर्थिक आपातकाल का हवाला देकर कई देशों पर व्यापक टैरिफ लगाने की कोशिश की थी, लेकिन अदालत ने कहा कि सरकार ने अपने अधिकारों से ज्यादा कदम उठाया है।

 

इसके बाद प्रशासन ने आयात पर अस्थायी 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, जो फिलहाल 150 दिनों के लिए लागू है और जुलाई में समाप्त हो सकता है।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि Section 301 जांच के जरिए अमेरिका नए तरीके से व्यापारिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

 

चीन के साथ व्यापारिक समीकरण भी अहम

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस जांच का संबंध अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापारिक तनाव से भी है।

 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जल्द ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करने वाले हैं। ऐसे में यह जांच बातचीत के दौरान बेहतर व्यापारिक शर्तें हासिल करने का एक तरीका भी हो सकती है।

 

भारत इस सूची में क्यों शामिल?

भारत को भी जांच में शामिल किया गया है और इसके पीछे कई पुराने मुद्दे बताए जाते हैं।

 

अमेरिका पहले भी भारत की कुछ व्यापारिक नीतियों को लेकर चिंता जताता रहा है। इनमें उच्च आयात शुल्क, स्थानीय सोर्सिंग के नियम और दवा क्षेत्र में कीमत नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल हैं।

 

हालांकि हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा भी तैयार किया गया है।

 

इस समझौते के तहत भारत ने कई अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर शुल्क कम करने या हटाने पर सहमति जताई है। दोनों देशों ने गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और बाजार तक पहुंच बढ़ाने का भी वादा किया है।

 

भारत के निर्यात पर क्या असर पड़ सकता है?

फिलहाल इस जांच का भारत पर तुरंत कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर आगे चलकर अमेरिका नए टैरिफ लगाता है तो भारतीय निर्यात पर असर पड़ सकता है।

 

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। इसलिए किसी भी तरह का अतिरिक्त शुल्क कई उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है।

 

उदाहरण के तौर पर दवा उद्योग भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में से एक है। अगर इस क्षेत्र पर टैरिफ बढ़ता है तो भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।

 

इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी हार्डवेयर, कपड़ा उद्योग, ऑटो पार्ट्स और इंजीनियरिंग उत्पाद भी प्रभावित हो सकते हैं।

 

भारत की संभावित रणनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस मामले में अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखेगा और अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करने की कोशिश करेगा।

 

भारत पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों में बातचीत के जरिए समाधान निकालने में सफल रहा है।

 

सरकार की कोशिश होगी कि भारत के निर्यात पर किसी तरह का बड़ा असर न पड़े और व्यापारिक संबंध स्थिर बने रहें।

 

आगे क्या हो सकता है?

अमेरिका की यह जांच वैश्विक व्यापार में नई अनिश्चितता पैदा कर सकती है। अगर अमेरिका बड़े देशों पर नए टैरिफ लगाता है तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार और सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है।

 

भारत के लिए यह स्थिति चुनौती के साथ-साथ अवसर भी हो सकती है। अगर भारत अपनी औद्योगिक नीतियों और निर्यात रणनीति को मजबूत रखता है तो वह वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति और बेहतर कर सकता है।