ईरान युद्ध से नया संकट भारत में रुकी यूरिया फैक्ट्रियां, क्या चीन बनेगा सहारा?

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अब केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका प्रभाव दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी दिखाई देने लगा है। खासतौर पर ऊर्जा और उर्वरक क्षेत्र इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। ईरान के आसपास चल रहे संघर्ष और उसके कारण वैश्विक व्यापार में आई बाधाओं ने तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर भारत के उर्वरक उद्योग पर पड़ा है, क्योंकि यूरिया बनाने के लिए एलएनजी एक बेहद जरूरी कच्चा माल है।

 

इसी स्थिति को देखते हुए भारत ने चीन से कुछ प्रतिबंधों में ढील देने का अनुरोध किया है ताकि यूरिया की आपूर्ति में संभावित कमी को रोका जा सके। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत और चीन के संबंधों में लंबे समय से तनाव बना हुआ है, फिर भी इस संकट के बीच आर्थिक सहयोग की संभावना दिखाई दे रही है।

 

यूरिया उत्पादन पर संकट क्यों आया?

भारत में यूरिया उत्पादन का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। एलएनजी केवल ऊर्जा का स्रोत ही नहीं है, बल्कि यूरिया निर्माण की प्रक्रिया में यह एक अहम घटक भी होता है। हाल के दिनों में मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के कारण गैस की आपूर्ति बाधित हुई है।

 

कतर भारत को एलएनजी आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में से एक है। लेकिन क्षेत्र में तनाव बढ़ने के बाद कतर ने कुछ समय के लिए भारत को गैस की आपूर्ति कम कर दी। इसका असर यह हुआ कि भारत के उर्वरक संयंत्रों को पूरी मात्रा में गैस नहीं मिल पा रही है।

 

सूत्रों के अनुसार, इस समय भारत के उर्वरक उद्योग को उनकी जरूरत का लगभग 70 प्रतिशत गैस ही मिल पा रहा है। गैस की कमी के कारण कुछ कंपनियों ने अपने संयंत्र अस्थायी रूप से बंद कर दिए हैं, जबकि कुछ ने वार्षिक रखरखाव का काम पहले ही शुरू कर दिया है।

Iran war crisis halts urea factories in India

कई कंपनियों ने रोका उत्पादन

जानकारी के मुताबिक देश की बड़ी उर्वरक कंपनियों में शामिल इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (IFFCO) समेत कई निर्माताओं ने अपनी कुछ उत्पादन इकाइयों को रोक दिया है।

 

उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर किसी संयंत्र को बंद करना पड़ता है, तो उसे दोबारा पूरी क्षमता से शुरू करने में लगभग एक महीने का समय लग सकता है। यही वजह है कि कंपनियां उत्पादन रोकने से पहले सावधानी बरत रही हैं और स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए हैं।

 

हालांकि सरकार और उद्योग दोनों यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि किसानों को उर्वरक की कमी का सामना न करना पड़े।

 

चीन से क्यों की गई अपील?

भारत ने इस बीच चीन से अनुरोध किया है कि वह यूरिया निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों में कुछ ढील देने पर विचार करे। चीन दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया उत्पादक देश है और वहां से बड़ी मात्रा में उर्वरक निर्यात होता है।

 

चीन में यूरिया निर्यात एक कोटा प्रणाली के तहत होता है। पिछले वर्ष कुछ देशों को निर्यात की अनुमति दी गई थी, जिसमें भारत भी शामिल था। लेकिन वर्ष 2026 के लिए अभी तक निर्यात कोटा आवंटित नहीं किया गया है।

 

भारत की चिंता यह है कि अगर गैस संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो घरेलू उत्पादन कम हो सकता है और उस स्थिति में आयात बढ़ाना पड़ेगा। ऐसे में चीन जैसे बड़े उत्पादक से आपूर्ति मिलना भारत के लिए राहत भरा कदम हो सकता है।

 

भारत की उर्वरक स्थिति फिलहाल कैसी है?

सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में उर्वरकों की तत्काल कोई कमी नहीं है। उर्वरक मंत्रालय के अनुसार 10 मार्च तक देश में यूरिया समेत अन्य उर्वरकों का कुल भंडार लगभग 18 मिलियन टन था। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 37 प्रतिशत अधिक है।

 

इसके अलावा चालू वित्त वर्ष में अब तक भारत ने लगभग 9.8 मिलियन टन यूरिया आयात किया है और अगले तीन महीनों में करीब 1.7 मिलियन टन और आने की उम्मीद है।

 

सरकार जल्द ही एक नया आयात टेंडर जारी करने की भी तैयारी कर रही है ताकि जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

 

मानसून से पहले क्यों बढ़ती है मांग?

भारत में यूरिया की मांग जून के आसपास तेजी से बढ़ जाती है, क्योंकि इसी समय मानसून के साथ खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होती है।

 

देश के किसान धान, कपास, गन्ना और कई अन्य फसलों के लिए बड़े पैमाने पर उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि सरकार मानसून से पहले उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने की कोशिश करती है।

 

अगर गैस की आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है, तो भारत को आयात पर ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है। इससे वैश्विक बाजार में कीमतें भी बढ़ सकती हैं।

 

वैश्विक बाजार पर भी असर संभव

भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक देश है। अगर भारत को अचानक ज्यादा मात्रा में यूरिया खरीदना पड़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं।

 

इसका असर केवल भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि वैश्विक उर्वरक बाजार पहले से ही कई तरह के दबावों का सामना कर रहा है।

 

संभावित विकल्पों के तौर पर चीन के अलावा रूस, इंडोनेशिया, मलेशिया और मिस्र जैसे देशों से भी यूरिया आयात किया जा सकता है।

 

कृषि और महंगाई पर क्या असर पड़ेगा?

भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है। इसके अलावा गेहूं, कपास और चीनी का भी बड़ा उत्पादक है।

 

अगर उर्वरकों की लागत बढ़ती है, तो इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ेगा। इससे फसलों की कीमतें बढ़ सकती हैं और व्यापक स्तर पर महंगाई भी प्रभावित हो सकती है।

 

सरकार इसलिए लगातार यह प्रयास कर रही है कि उर्वरक की आपूर्ति बनी रहे और किसानों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।

 

उद्योग और सरकार की कोशिशें

फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुसार देश का उर्वरक उद्योग एलएनजी आयात पर काफी हद तक निर्भर है और इसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है।

 

उद्योग संगठनों का कहना है कि वे सरकार के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि यूरिया उत्पादन के लिए गैस की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जाए।

 

आंकड़ों के अनुसार 31 जनवरी तक के दस महीनों में भारत का कुल उर्वरक उत्पादन और आयात मिलाकर लगभग 65 मिलियन टन तक पहुंच गया था, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 57 मिलियन टन था। यह दिखाता है कि अभी तक आपूर्ति की स्थिति संतुलित रही है।

 

निष्कर्ष:

मध्य पूर्व में चल रहा संघर्ष केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक व्यापार और खाद्य सुरक्षा तक पहुंच रहा है। एलएनजी की आपूर्ति में आई बाधा ने भारत के उर्वरक उद्योग को भी प्रभावित किया है।

 

हालांकि फिलहाल देश में उर्वरकों का पर्याप्त भंडार मौजूद है, लेकिन अगर गैस संकट लंबा खिंचता है तो भारत को अतिरिक्त आयात करना पड़ सकता है। ऐसे में चीन सहित अन्य देशों से सहयोग की उम्मीद बढ़ जाती है।