उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे से भारत और चीन के बीच सीमावर्ती व्यापार एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। लगभग छह साल के लंबे अंतराल के बाद यह फैसला लिया गया है, जिससे सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों और व्यापारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। हर साल की तरह इस बार भी यह व्यापार जून से सितंबर के बीच संचालित किया जाएगा।
क्यों बंद हुआ था व्यापार?
लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और तिब्बत (चीन) के बीच व्यापार पहले नियमित रूप से होता था। लेकिन 2019 के बाद स्थिति बदल गई। पहले कोरोना महामारी के कारण आवाजाही बंद हुई और फिर भारत-चीन के बीच गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद यह व्यापार पूरी तरह ठप हो गया।
इसके बाद से लगातार व्यापारी इस व्यापार को दोबारा शुरू करने की मांग कर रहे थे। अब केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद इस दिशा में कदम उठाए गए हैं।

कैसे फिर शुरू हो रहा है व्यापार?
पिथौरागढ़ के जिला अधिकारी ने बताया कि केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद स्थानीय स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। विदेश मंत्रालय से जरूरी अनुमति यानी NOC मिलने के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
इसके अलावा गृह मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय से भी हरी झंडी मिल चुकी है। राज्य सरकार और जिला प्रशासन को सभी जरूरी व्यवस्थाएं पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।
क्या-क्या तैयारियां हो रही हैं?
व्यापार को सुचारू रूप से शुरू करने के लिए कई स्तरों पर काम किया जा रहा है-
- व्यापारियों को ट्रेड पास जारी किए जाएंगे
- मुद्रा विनिमय (करेंसी एक्सचेंज) की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी
- कस्टम विभाग की तैनाती की जाएगी
- संचार और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाएगी
- स्वास्थ्य सेवाएं और ट्रांजिट कैंप तैयार किए जाएंगे
धारचूला और गुंजी जैसे इलाकों में खासतौर पर इन व्यवस्थाओं को विकसित किया जा रहा है, ताकि व्यापारियों को किसी तरह की परेशानी न हो।
लिपुलेख दर्रे का ऐतिहासिक महत्व
लिपुलेख दर्रा सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है। यह दर्रा भारत को तिब्बत के तकलाकोट (पुरांग) क्षेत्र से जोड़ता है और सदियों से व्यापार और तीर्थयात्रा का प्रमुख मार्ग रहा है।
ब्रिटिश काल में भी यहां से नमक, ऊन, जड़ी-बूटियां और अन्य स्थानीय उत्पादों का आदान-प्रदान होता था। भारत से व्यापारी अनाज, मसाले, गुड़ और अन्य वस्तुएं लेकर जाते थे।

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह मार्ग बंद हो गया था, लेकिन 1992 में इसे दोबारा खोला गया। इसके बाद यह लगातार चलता रहा, जब तक कि 2019-20 में इसे फिर से बंद नहीं करना पड़ा।
अब व्यापार में क्या बदलाव होगा?
पहले इस दर्रे से व्यापार मुख्य रूप से “वस्तु विनिमय” यानी सामान के बदले सामान के रूप में होता था। लेकिन अब इसमें एक बड़ा बदलाव किया गया है।
हाल ही में भारत और चीन के बीच यह तय हुआ है कि अब व्यापार रुपये और युआन में किया जाएगा। इससे व्यापार प्रक्रिया ज्यादा आधुनिक और आसान होगी।
इसके अलावा, इस बार व्यापार पूरी तरह सड़क मार्ग से होगा। पहले जहां सामान खच्चरों और भेड़ों के जरिए ले जाया जाता था, अब मोटर योग्य सड़क बनने से समय और लागत दोनों कम होंगे।
नेपाल की आपत्ति क्यों?
लिपुलेख दर्रे को लेकर नेपाल ने पहले भी आपत्ति जताई है। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र उसके हिस्से में आते हैं।
2020 में जब भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक सड़क बनाई थी, तब भी नेपाल ने इसका विरोध किया था और अपना नया नक्शा जारी किया था। अब व्यापार फिर से शुरू होने पर नेपाल ने फिर से चिंता जताई है।
हालांकि यह इलाका लंबे समय से भारत के प्रशासन में रहा है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी संवेदनशील बना हुआ है।
व्यापार से कितना फायदा होगा?
लिपुलेख दर्रे से व्यापार शुरू होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। खासकर सीमावर्ती इलाकों के लोगों के लिए यह आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
पिछले आंकड़ों को देखें तो 2005 में इस मार्ग से करीब 12 करोड़ रुपये का आयात और 39 लाख रुपये का निर्यात हुआ था। वहीं 2018 में आयात 5.59 करोड़ रुपये और निर्यात 96.5 लाख रुपये रहा।
हालांकि यह आंकड़े बहुत बड़े नहीं हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसका असर काफी महत्वपूर्ण होता है।
व्यापारियों की क्या प्रतिक्रिया है?
स्थानीय व्यापारियों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे उन्हें अपने पुराने व्यापार को फिर से शुरू करने का मौका मिलेगा।
कई व्यापारियों का सामान 2019 से तिब्बत के गोदामों में पड़ा हुआ है, जिसे अब वापस लाने का रास्ता खुलेगा। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान की भरपाई करने में मदद मिलेगी।
रणनीतिक नजर से क्यों अहम है यह कदम?
लिपुलेख दर्रा सिर्फ व्यापार के लिहाज से नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह भारत-चीन सीमा पर स्थित एक अहम बिंदु है।
इस मार्ग के खुलने से एक तरफ जहां आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, वहीं दूसरी तरफ यह दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार का संकेत भी माना जा सकता है।
हालांकि, क्षेत्रीय विवाद और राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण यह कदम पूरी तरह सरल नहीं है।
बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से बढ़ेगी रफ्तार
2020 में बनी नई सड़क ने इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल दी है। अब जहां पहले कई दिन लगते थे, वहां कम समय में सामान पहुंचाया जा सकेगा।
इससे व्यापार की मात्रा बढ़ने की संभावना है और लागत भी कम होगी। प्रशासन को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इस मार्ग से व्यापार और ज्यादा बढ़ेगा।
निष्कर्ष:
छह साल बाद लिपुलेख दर्रे से व्यापार फिर शुरू होना एक बड़ा कदम है। यह न सिर्फ स्थानीय व्यापारियों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास की नई संभावनाएं भी खोल सकता है।
हालांकि, इसके साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं, जैसे नेपाल का विरोध और क्षेत्रीय संवेदनशीलता। लेकिन अगर सभी पक्षों के बीच संतुलन बना रहा, तो यह पहल लंबे समय में फायदेमंद साबित हो सकती है।

