असम विधानसभा में सोमवार को यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC से जुड़ा बड़ा बिल पेश किया गया। मुख्यमंत्री हेमन्ता बिस्वा शर्मा की सरकार ने इसे राज्य में एक समान नागरिक कानून लागू करने की दिशा में अहम कदम बताया है। बिल को विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने पेश किया। इस पर 27 मई को चर्चा होगी। अगर यह विधेयक पास हो जाता है, तो असम देश का तीसरा ऐसा राज्य बन जाएगा जहां UCC लागू होगा। इससे पहले उत्तराखंड और गुजरात इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं।
राज्य सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद अलग-अलग समुदायों में लागू निजी कानूनों को सरल बनाना और विवाह, तलाक, संपत्ति तथा लिव-इन संबंधों जैसे मामलों में समान नियम लागू करना है। हालांकि बिल आते ही राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इसे धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
क्या-क्या बदलेगा इस नए कानून में?
सरकार के मुताबिक UCC बिल मुख्य रूप से चार बड़े मुद्दों को कवर करेगा। इनमें शादी की न्यूनतम उम्र, बहुविवाह पर रोक, बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियम शामिल हैं।
बिल के अनुसार पुरुषों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और महिलाओं के लिए 18 साल तय रहेगी। इसके अलावा किसी भी धर्म के व्यक्ति को एक से ज्यादा शादी करने की अनुमति नहीं होगी। यानी बहुविवाह पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा गया है।
सरकार का कहना है कि इससे महिलाओं को ज्यादा कानूनी सुरक्षा मिलेगी और परिवार से जुड़े विवादों में समानता आएगी। बिल में यह भी प्रस्ताव है कि सभी शादियों और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा। शादी या तलाक के 60 दिनों के भीतर सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में इसकी जानकारी देनी होगी।

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी सख्त नियम
इस बिल का सबसे ज्यादा चर्चा वाला हिस्सा लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। सरकार चाहती है कि लिव-इन में रहने वाले जोड़े एक महीने के भीतर अपना रजिस्ट्रेशन करवाएं। सरकार का तर्क है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
अगर किसी लिव-इन संबंध से बच्चा पैदा होता है, तो उसे पूरी तरह वैध माना जाएगा। साथ ही अगर किसी महिला को उसका पार्टनर छोड़ देता है, तो वह अदालत के जरिए आर्थिक सहायता की मांग कर सकेगी।
सरकार का कहना है कि यह प्रावधान उन महिलाओं की सुरक्षा के लिए जरूरी है, जो लंबे समय तक बिना कानूनी पहचान वाले रिश्तों में रहती हैं।
आदिवासी समुदाय को छूट
मुख्यमंत्री सरमा ने साफ किया है कि अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा जाएगा। यानी पहाड़ी और मैदानी दोनों तरह की जनजातियों पर यह कानून लागू नहीं होगा।
इसके अलावा पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों और विवाह पद्धतियों को भी छूट दी जाएगी। उदाहरण के तौर पर निकाह, आनंद कारज, वैदिक विवाह, अहोम चकलोंग और अन्य धार्मिक परंपराओं के अनुसार विवाह करने की अनुमति बनी रहेगी।
सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य सांस्कृतिक पहचान खत्म करना नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रियाओं को समान बनाना है।
UCC आखिर होता क्या है?
भारत में दो तरह के कानून चलते हैं – क्रिमिनल कानून और सिविल कानून।
क्रिमिनल कानून चोरी, हत्या, हिंसा और अपराधों से जुड़े मामलों पर लागू होता है। यह सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है।
लेकिन शादी, तलाक, गोद लेने, संपत्ति और परिवार से जुड़े मामले अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ के तहत चलते हैं। जैसे मुस्लिम समुदाय में मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू होता है, जबकि हिंदुओं के लिए हिंदू मैरिज एक्ट और अन्य कानून हैं।
UCC का मतलब है कि इन सभी निजी कानूनों की जगह एक समान कानून लागू किया जाए, जो हर नागरिक पर बराबरी से लागू हो, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो।
उदाहरण के तौर पर अभी कुछ समुदायों में बहुविवाह की अनुमति है, जबकि दूसरे समुदायों में यह अपराध माना जाता है। UCC लागू होने पर सभी के लिए एक जैसा नियम लागू होगा।
उत्तराखंड और गुजरात पहले ही उठा चुके हैं कदम
उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना। वहां फरवरी 2024 में विधानसभा में विधेयक पेश हुआ और बाद में राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जनवरी 2025 से इसे लागू कर दिया गया।
उत्तराखंड में बेटे-बेटी को संपत्ति में बराबर अधिकार दिए गए हैं और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी किया गया है।
इसके बाद गुजरात ने भी UCC बिल पारित किया। गुजरात मॉडल में विवाह, उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में समान नियम लागू करने का प्रस्ताव रखा गया।
अब असम इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ओवैसी ने उठाए सवाल
असदुद्दीन ओवैसी ने असम सरकार के UCC बिल की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि यह “यूनिफॉर्म” नहीं है क्योंकि इसमें आदिवासी समुदायों को बाहर रखा गया है।
ओवैसी का कहना है कि अगर आदिवासी समुदायों को उनकी संस्कृति बचाने के लिए छूट दी जा सकती है, तो मुस्लिम समुदाय की परंपराओं को क्यों नहीं बचाया जा रहा।
उन्होंने यह भी कहा कि इस कानून के जरिए उत्तराधिकार और तलाक जैसे मामलों में हिंदू कानूनों की सोच थोपी जा रही है। ओवैसी के मुताबिक इस्लाम में बेटियों को संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, लेकिन नए कानून में वसीयत के जरिए ऐसा संभव हो सकता है।

हालांकि असम सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि कानून का मकसद केवल समान अधिकार और पारदर्शिता लाना है।
क्वाड, राजनीति और राष्ट्रीय बहस के बीच आया बिल
असम में UCC बिल ऐसे समय आया है जब देशभर में समान नागरिक संहिता को लेकर बहस तेज है। केंद्र सरकार लंबे समय से इसे संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों से जुड़ा विषय बताती रही है।
राजनीतिक तौर पर भी यह मुद्दा काफी अहम माना जा रहा है। बीजेपी इसे महिलाओं के अधिकार और समानता से जोड़कर देखती है, जबकि कई विपक्षी दल इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों के नजरिए से देखते हैं।
असम सरकार का दावा है कि यह कानून राज्य में पारिवारिक कानूनों को आधुनिक और सरल बनाएगा। वहीं विरोधी दलों का कहना है कि इसे लागू करने से पहले व्यापक चर्चा और सभी समुदायों की सहमति जरूरी है।
अब आगे क्या होगा?
27 मई को असम विधानसभा में इस बिल पर विस्तृत चर्चा होगी। अगर बहुमत से इसे मंजूरी मिल जाती है, तो राज्य में विवाह, तलाक, संपत्ति और लिव-इन संबंधों से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
इस बिल ने एक बार फिर पूरे देश में यह बहस तेज कर दी है कि क्या भारत में सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल कानून लागू होना चाहिए या फिर अलग-अलग समुदायों की परंपराओं को बनाए रखना ज्यादा जरूरी है।

