क्या आने वाली है वैश्विक मंदी? IMF ने दिए बड़े संकेत, युद्धग्रस्त देशों को मिलेगा भारी फंड

क्या आने वाली है वैश्विक मंदी? IMF ने दिए बड़े संकेत, युद्धग्रस्त देशों को मिलेगा भारी फंड
क्या आने वाली है वैश्विक मंदी? IMF ने दिए बड़े संकेत, युद्धग्रस्त देशों को मिलेगा भारी फंड

दुनिया की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ी चेतावनी सामने आई है। International Monetary Fund (IMF) ने संकेत दिया है कि वह अपने वैश्विक आर्थिक विकास के अनुमान (ग्रोथ फोरकास्ट) को कम करने जा रहा है। इसकी मुख्य वजह मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और उससे पैदा हुई आर्थिक अनिश्चितता है।

IMF की प्रमुख Kristalina Georgieva ने साफ कहा है कि मौजूदा हालात में दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले जितनी तेजी से आगे नहीं बढ़ पाएगी, भले ही स्थिति बेहतर होने की उम्मीद क्यों न हो।

जंग का असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं

IMF के अनुसार, मिडिल ईस्ट में चल रही लड़ाई का असर केवल उन देशों तक सीमित नहीं है जहां संघर्ष हो रहा है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहा है।

ऊर्जा की कीमतों में तेजी, बुनियादी ढांचे को नुकसान, सप्लाई चेन में रुकावट और बाजार में भरोसे की कमी – ये सभी कारण मिलकर वैश्विक विकास को प्रभावित कर रहे हैं।

Kristalina Georgieva ने कहा कि सबसे अच्छे हालात में भी दुनिया पहले जैसी स्थिति में जल्दी नहीं लौट पाएगी।

प्रभावित देशों को मिल सकती है 50 अरब डॉलर तक मदद

IMF का अनुमान है कि इस संघर्ष से प्रभावित देशों को तुरंत आर्थिक सहायता की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए संस्था 20 अरब डॉलर से लेकर 50 अरब डॉलर तक की मदद दे सकती है।

यह सहायता खासतौर पर उन देशों के लिए होगी, जिनकी अर्थव्यवस्था इस युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हुई है या जो पहले से ही कमजोर स्थिति में हैं।

IMF के मुताबिक, अगर युद्धविराम (सीजफायर) कायम रहता है तो सहायता की जरूरत कम रह सकती है, लेकिन अगर हालात बिगड़ते हैं तो यह राशि और बढ़ सकती है।

खाद्य संकट का खतरा बढ़ा

इस संघर्ष का असर सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन रहा है। अनुमान है कि करीब 4.5 करोड़ लोग खाने की कमी से प्रभावित हो सकते हैं।

World Food Programme (WFP) और अन्य संस्थाओं के साथ हुई बैठक में यह चिंता जताई गई कि तेल, गैस और खाद की कीमतों में बढ़ोतरी से खाद्य वस्तुओं के दाम भी बढ़ेंगे।

इसका सीधा असर गरीब और विकासशील देशों पर पड़ेगा, जहां पहले से ही संसाधनों की कमी है।

तेल और सप्लाई चेन ने बढ़ाई चिंता

मिडिल ईस्ट में संघर्ष के कारण तेल की आपूर्ति पर दबाव पड़ा है। खासकर Strait of Hormuz जैसे अहम समुद्री रास्तों पर असर पड़ा है, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ गई हैं।

तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है, जिसका असर हर चीज की कीमत पर पड़ता है – चाहे वह खाना हो, सामान हो या सेवाएं।

इसके अलावा सप्लाई चेन में रुकावट के कारण सामान की उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है।

गरीब देशों पर सबसे ज्यादा असर

IMF ने इस संकट को “असमान प्रभाव” वाला बताया है। यानी इसका असर हर देश पर एक जैसा नहीं होगा।

ऊर्जा आयात करने वाले गरीब देशों पर इसका सबसे ज्यादा दबाव पड़ेगा। इन देशों को महंगे दाम पर तेल खरीदना पड़ेगा, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।

Kristalina Georgieva ने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रशांत महासागर के छोटे द्वीप देशों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो सकती है, क्योंकि वे सप्लाई चेन के आखिरी छोर पर होते हैं।

विश्व बैंक ने भी जताई चिंता

World Bank ने भी इस स्थिति को गंभीर बताया है। उसके अनुसार, मिडिल ईस्ट क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि 2026 में घटकर लगभग 1.8% रह सकती है, जो पहले के अनुमान से काफी कम है।

यानी यह साफ है कि इस संघर्ष का असर लंबे समय तक देखने को मिल सकता है।

महंगाई बढ़ने का खतरा

IMF का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक महंगाई (इन्फ्लेशन) भी बढ़ सकती है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई चेन की समस्याएं मिलकर कीमतों को ऊपर ले जाएंगी।

इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा, क्योंकि रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं।

युद्ध के लंबे असर

IMF की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिन देशों में युद्ध होता है वहां की अर्थव्यवस्था शुरुआत में ही करीब 3% तक गिर जाती है और इसका असर कई सालों तक बना रहता है।

यानी युद्ध खत्म होने के बाद भी आर्थिक नुकसान जल्दी भरपाई नहीं हो पाता।

वैश्विक संस्थाओं की संयुक्त पहल

इस स्थिति से निपटने के लिए IMF और World Bank ने मिलकर एक समन्वय समूह बनाया है, जो ऊर्जा बाजार और आर्थिक प्रभावों पर नजर रखेगा।

इसके अलावा IMF, विश्व बैंक और World Food Programme के प्रमुखों ने भी मिलकर इस संकट के समाधान पर चर्चा की है।

आगे क्या होगा?

आने वाले दिनों में IMF अपनी फिस्कल मॉनिटर रिपोर्ट जारी करेगा, जिसमें सरकारों के बढ़ते कर्ज और आर्थिक चुनौतियों पर विस्तार से जानकारी दी जाएगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे, तो दुनिया की आर्थिक रिकवरी की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।