मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अब एक नई कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा को लेकर कई देश एक साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। इसी बीच भारत ने भी पुष्टि की है कि उसे इस अंतरराष्ट्रीय पहल में शामिल होने का न्योता मिला है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि भारत को इस पहल में भाग लेने का निमंत्रण मिला है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर बैठक जल्द ही शुरू होने वाली है और उसमें भारत की भूमिका के बारे में बाद में जानकारी दी जाएगी।
क्यों अहम है यह पहल?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। वैश्विक तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
इसी खतरे को देखते हुए ब्रिटेन और फ्रांस ने एक साझा पहल शुरू की है, जिसका मकसद इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित और निर्बाध बनाए रखना है। भारत को भी इसी मिशन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है।
यूरोप की बड़ी पहल
इस बीच यूरोप के बड़े देश भी इस मुद्दे पर सक्रिय हो गए हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पेरिस में बैठक कर इस स्थिति पर चर्चा की।
बताया जा रहा है कि दोनों नेता जल्द ही करीब 40 देशों के साथ एक वर्चुअल समिट आयोजित करने की तैयारी में हैं। इस बैठक में टैंकर सुरक्षा, समुद्री निगरानी और जरूरत पड़ने पर समुद्र में बिछाई गई माइंस को हटाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है।
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भी इस प्रक्रिया में शामिल होने वाले हैं। उन्होंने सुझाव दिया है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी इस पूरी पहल में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि रणनीति और प्रभावी बन सके।

अमेरिका का सख्त रुख जारी
जहां एक तरफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय शांति और सुरक्षा की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, वहीं अमेरिका ने अपना सख्त रुख बरकरार रखा है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ किया है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी तब तक जारी रहेगी, जब तक दोनों देशों के बीच कोई ठोस शांति समझौता नहीं हो जाता।
उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि यह नाकेबंदी सिर्फ ईरान से जुड़ी है और तब तक लागू रहेगी, जब तक बातचीत पूरी तरह सफल नहीं हो जाती।
ईरान की ओर से नरमी, लेकिन सतर्कता बरकरार
इसी बीच ईरान ने हाल ही में होर्मुज स्ट्रेट को व्यापारिक जहाजों के लिए फिर से खोलने का ऐलान किया है। यह कदम इजराइल और लेबनान के बीच हुए युद्धविराम के बाद उठाया गया।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की कि सभी व्यापारिक जहाज तय मार्ग के अनुसार सुरक्षित तरीके से इस रास्ते से गुजर सकते हैं।
हालांकि, इस घोषणा के बावजूद स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। कई शिपिंग कंपनियां अभी भी सतर्क हैं और पूरी सुरक्षा की गारंटी मिलने का इंतजार कर रही हैं।
ट्रम्प का दावा और बातचीत की स्थिति
राष्ट्रपति ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से माइंस हटाने का काम कर रहा है और इसमें अमेरिका की मदद ली जा रही है।
उन्होंने इस कदम का स्वागत करते हुए सोशल मीडिया पर “थैंक यू” भी लिखा, लेकिन साथ ही यह भी दोहराया कि जब तक औपचारिक समझौता नहीं होता, तब तक दबाव जारी रहेगा।
ट्रम्प ने यह भी कहा कि ईरान के साथ समझौता “बहुत करीब” है और जल्द ही पूरा हो सकता है। हालांकि, हाल ही में पाकिस्तान में हुई उच्चस्तरीय बातचीत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका।
इस बातचीत का नेतृत्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे थे, लेकिन दोनों पक्षों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं।
लेबनान में राहत के संकेत
इस पूरे तनाव के बीच लेबनान से कुछ राहत भरी खबर भी सामने आई है। इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच हुए संघर्ष में 10 दिन का युद्धविराम लागू होने के बाद लोग अपने घरों की ओर लौटने लगे हैं।
दक्षिण लेबनान और दक्षिणी बेरूत में सड़कों पर लोगों की आवाजाही बढ़ गई है। युद्ध के दौरान लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े थे, लेकिन अब हालात धीरे-धीरे सामान्य होते दिख रहे हैं।
भारत की भूमिका क्यों अहम?
भारत दुनिया का एक बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है और उसका काफी तेल आयात इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
अगर भारत इस पहल में शामिल होता है, तो यह उसकी वैश्विक भूमिका को भी मजबूत करेगा। साथ ही, यह कदम भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा दे सकता है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल यह साफ नहीं है कि भारत इस पहल में किस तरह की भूमिका निभाएगा। यह भी तय होना बाकी है कि क्या कोई औपचारिक गठबंधन बनेगा या सिर्फ सहयोग के स्तर पर काम होगा।
दूसरी ओर, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का नतीजा भी आने वाले समय में हालात को तय करेगा। अगर समझौता हो जाता है, तो तनाव कम हो सकता है।
लेकिन अगर बातचीत विफल रहती है, तो स्थिति फिर से बिगड़ सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

