ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट : विकास का बड़ा कदम या पर्यावरण और आदिवासी जीवन पर खतरा – राहुल गांधी ने क्यों उठाए सवाल?

भारत के दूरस्थ और शांत द्वीपों में गिने जाने वाले ग्रेट निकोबार द्वीप पर इन दिनों एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। लगभग ₹81,000 करोड़ की लागत से बनने वाला ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ जहां सरकार के लिए एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और पर्यावरण विशेषज्ञ इसे गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं। इस मुद्दे ने तब और जोर पकड़ लिया जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने दौरे के दौरान इस परियोजना पर तीखा हमला किया।

राहुल गांधी ने इसे देश के प्राकृतिक संसाधनों और आदिवासी विरासत के खिलाफ बड़ा अपराध बताते हुए कहा कि यह विकास नहीं, बल्कि विनाश है। उनका कहना है कि इस परियोजना के नाम पर लाखों पेड़ काटे जाएंगे और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों को नुकसान पहुंचेगा।

 

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का उद्देश्य एक दूरदराज द्वीप को एक बड़े आर्थिक और रणनीतिक केंद्र में बदलना है। इस परियोजना के तहत एक आधुनिक शहर बसाने की योजना है, जहां भविष्य में 3 से 5 लाख लोगों की आबादी रह सकेगी।

 

यह प्रोजेक्ट चार मुख्य हिस्सों में बंटा हुआ है –

  1. गैलेथिया बे पोर्ट : इस प्रोजेक्ट का सबसे अहम हिस्सा एक गहरे समुद्र वाला कंटेनर पोर्ट है, जो बड़े जहाजों को संभाल सकेगा। इसका मकसद एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट के बीच होने वाले व्यापार को आसान बनाना है। इससे भारत को सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।
  2. ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: यह एक नया एयरपोर्ट होगा, जिसे नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इससे पर्यटन, व्यापार और आपातकालीन सेवाओं को बढ़ावा मिलेगा।
  3. इंटीग्रेटेड टाउनशिप: इस परियोजना के तहत एक नया शहर बसाया जाएगा, जिसमें रहने की जगह, व्यापारिक क्षेत्र, पर्यटन सुविधाएं और रक्षा से जुड़ी संरचनाएं शामिल होंगी।
  4. पावर प्लांट: इसमें गैस और सोलर ऊर्जा से बिजली उत्पादन किया जाएगा, जिससे पूरे प्रोजेक्ट को लगातार बिजली मिल सके।
Great Nicobar Project

सरकार के आर्थिक लक्ष्य क्या हैं?

सरकार इस परियोजना को भारत की आर्थिक मजबूती के लिए एक बड़ा कदम मानती है।

  • भारत अभी अपने कई जहाजों के लिए सिंगापुर और कोलंबो जैसे बंदरगाहों पर निर्भर है, जिससे हर साल लगभग 200 मिलियन डॉलर का नुकसान होता है। यह प्रोजेक्ट उस निर्भरता को कम करेगा।
  • इससे माल ढुलाई की लागत कम होगी और समय की बचत होगी।
  • यह द्वीप एक बड़े आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित होगा, जिससे रोजगार, पर्यटन और निवेश बढ़ेगा।
  • भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के प्रमुख व्यापारिक मार्गों से जोड़ने में मदद मिलेगी।

 

रणनीतिक महत्व भी कम नहीं

यह परियोजना सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद अहम है।

ग्रेट निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। यहां मजबूत मौजूदगी भारत को रणनीतिक बढ़त दे सकती है।

  • यह प्रोजेक्ट चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब देने में मदद कर सकता है।
  • सेना की आवाजाही और लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाएगा।
  • समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा मजबूत होगी।
  • प्राकृतिक आपदाओं जैसे तूफान और सुनामी के दौरान राहत कार्यों में तेजी आएगी।

 

पर्यावरण पर बड़ा खतरा?

इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण को लेकर जताई जा रही है।

जानकारी के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 130 से 160 वर्ग किलोमीटर तक के वर्षावनों को काटने की योजना है। यह द्वीप के कुल 850 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा है।

इसमें से 84.1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र आदिवासी रिजर्व में आता है, जिसे परियोजना के लिए हटाने का प्रस्ताव है।

पर्यावरणविदों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में जंगलों की कटाई से इलाके की जैव विविधता को भारी नुकसान होगा।

 

खतरे में दुर्लभ जीव-जंतु

ग्रेट निकोबार का जंगल कई दुर्लभ और संकटग्रस्त जीवों का घर है।

  • लेदरबैक समुद्री कछुआ, जो दुनिया का सबसे बड़ा कछुआ है, यहां अंडे देता है
  • निकोबार मेगापोड, एक खास पक्षी जो जमीन पर घोंसला बनाता है
  • खारे पानी का मगरमच्छ
  • निकोबार का लंबी पूंछ वाला बंदर
  • डुगोंग, जो समुद्र में रहने वाला दुर्लभ स्तनपायी है

इन सभी प्रजातियों पर इस प्रोजेक्ट का असर पड़ सकता है।

 

राहुल गांधी ने क्यों उठाए सवाल?

राहुल गांधी ने इस परियोजना को ‘स्कैम’ बताते हुए कहा कि इसके नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई होगी। उन्होंने इसे विकास के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कदम बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि द्वीप पर रहने वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

 

आदिवासी समुदाय की चिंता

ग्रेट निकोबार में शोम्पेन नाम की एक आदिवासी जनजाति रहती है। यह समुदाय बहुत सीमित बाहरी संपर्क रखता है और अपने पारंपरिक जीवन के साथ जंगलों पर निर्भर है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस परियोजना के कारण उनके रहने के क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। कुछ संगठनों का दावा है कि आदिवासियों से उनकी जमीन को लेकर पूरी जानकारी दिए बिना दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए।

 

पर्यावरण के लिए क्यों जरूरी हैं ये जंगल?

ग्रेट निकोबार के जंगल सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे भारत के पर्यावरण के लिए अहम हैं।

  1. तापमान नियंत्रण : ये जंगल बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं और आसपास के तापमान को संतुलित रखते हैं।
  2. बारिश में भूमिका: ये जंगल वातावरण में नमी छोड़ते हैं, जिससे बारिश के पैटर्न पर असर पड़ता है।
  3. तूफानों से सुरक्षा: यहां के जंगल और मैंग्रोव तेज हवाओं और समुद्री लहरों को रोकने में मदद करते हैं।
  4. जैव विविधता: यह क्षेत्र भारत के सबसे कम प्रभावित और सबसे समृद्ध प्राकृतिक इलाकों में से एक है।

 

विकास बनाम संरक्षण की बहस

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

एक ओर सरकार इसे देश के आर्थिक और रणनीतिक भविष्य के लिए जरूरी बता रही है, वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञ इसे पर्यावरण और आदिवासी जीवन के लिए खतरा मान रहे हैं।

 

निष्कर्ष:

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत के लिए एक बड़ा अवसर भी हो सकता है और एक बड़ी चुनौती भी। यह देश को वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्र में नई पहचान दे सकता है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।