सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की नई चाल: UNSC में विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश, जानें भारत का क्या होगा अगला कदम

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। पाकिस्तान ने हाल ही में इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में उठाने की कोशिश की, जिसके बाद दोनों देशों के बीच पानी और सुरक्षा से जुड़ी बहस और तेज हो गई है। इसी बीच एक विश्लेषण में दावा किया गया है कि पाकिस्तान का असली मकसद कोई कानूनी जीत हासिल करना नहीं, बल्कि दुनिया के सामने खुद को पीड़ित देश के रूप में पेश करना है।

पूर्व IAS अधिकारी केबीएस सिद्धू ने ‘सेवियर्स मैगजीन’ में लिखे अपने लेख में कहा कि पाकिस्तान इस मुद्दे को “मानवीय संकट” के रूप में दिखाकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना चाहता है। लेख के मुताबिक, भारत ने 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को “स्थगित” करने का फैसला लिया था। उस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी और भारत ने इसके लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकियों को जिम्मेदार ठहराया था।

 

पाकिस्तान UNSC क्यों पहुंचा?

विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तान यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत पानी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन लेख में कहा गया है कि UNSC के पास इस मामले में सीधे दखल देने का अधिकार सीमित है, क्योंकि सिंधु जल संधि में विवाद सुलझाने के अपने अलग प्रावधान पहले से मौजूद हैं।

लेख में इसे “डिप्लोमैटिक थिएटर” यानी कूटनीतिक प्रदर्शन बताया गया है। दावा किया गया कि पाकिस्तान का ध्यान असली समाधान से ज्यादा वैश्विक माहौल बनाने पर है ताकि भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाया जा सके।

भारत की क्या दलील है?

भारत का कहना है कि वह ऊपरी धारा वाला देश है और उसकी सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद का समर्थन करता रहा है, जबकि दूसरी तरफ संधि का पूरा फायदा भी लेता है।

लेख में कहा गया कि शुरुआत से ही यह समझौता भारत के लिए “असंतुलित” रहा। संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली के करीब 80% पानी पर पाकिस्तान को अधिकार मिला, जबकि नदियों का स्रोत भारत में है।

Pakistan new move on the Indus Water Treaty

विश्लेषण में यह भी आरोप लगाया गया कि पाकिस्तान ने बगलिहार और किशनगंगा जैसी भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं को बार-बार कानूनी विवादों में उलझाया। वहीं भारत द्वारा 2023 और 2024 में सुझाए गए बदलावों पर पाकिस्तान ने गंभीर बातचीत नहीं की।

 

सिंधु जल संधि आखिर है क्या?

सिंधु नदी प्रणाली में कुल छह नदियां शामिल हैं –  सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज। इन नदियों के किनारे फैला इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में पड़ता है, जबकि भारत, चीन और अफगानिस्तान भी इस क्षेत्र का हिस्सा हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच पानी को लेकर विवाद आज का नहीं है। 1947 के बंटवारे के बाद दोनों देशों के बीच नहरों और नदी के पानी के उपयोग को लेकर तनाव शुरू हो गया था। 1948 में भारत ने कुछ नहरों का पानी रोक दिया था, जिससे पाकिस्तान के पंजाब इलाके में खेती प्रभावित हुई थी।

इसके बाद विश्व बैंक की मध्यस्थता में कई साल बातचीत चली और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यही समझौता बाद में सिंधु जल संधि कहलाया।

 

संधि में किसे क्या मिला?

इस समझौते के तहत पूर्वी नदियां –  रावी, ब्यास और सतलुज –  भारत को दी गईं। वहीं पश्चिमी नदियां –  सिंधु, झेलम और चिनाब –  का मुख्य उपयोग पाकिस्तान के हिस्से में गया।

हालांकि भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का अधिकार मिला। इसी प्रावधान के तहत भारत ने कई बांध और प्रोजेक्ट शुरू किए हैं।

 

क्या भारत पानी रोक सकता है?

कानूनी रूप से यह आसान नहीं है। संधि एक स्थायी समझौता मानी जाती है और इसे एकतरफा खत्म करना सरल नहीं है। आम तौर पर दोनों देशों की सहमति से ही बदलाव संभव होते हैं।

लेकिन कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून की कुछ धाराओं के तहत भारत सुरक्षा कारणों का हवाला देकर समझौते से पीछे हट सकता है। उनका तर्क है कि यदि किसी संधि के हालात पूरी तरह बदल जाएं तो देश उसे चुनौती दे सकता है।

फिर भी जमीन पर स्थिति इतनी सीधी नहीं है। पाकिस्तान जाने वाला अधिकतर पानी पश्चिमी नदियों से आता है और इन्हें पूरी तरह रोकने के लिए भारत के पास अभी पर्याप्त स्टोरेज और डायवर्जन इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है।

 

भारत की परियोजनाएं कितनी आगे बढ़ीं?

पूर्वी नदियों पर भारत पहले से कई बड़े प्रोजेक्ट चला रहा है। भाखड़ा नागल बांध, पोंग बांध, रंजीत सागर बांध, हरिके बैराज और इंदिरा नहर जैसी परियोजनाओं के जरिए भारत इन नदियों के अधिकांश पानी का उपयोग करता है।

2019 के उरी हमले के बाद भारत ने घोषणा की थी कि वह पूर्वी नदियों का 100% पानी खुद इस्तेमाल करेगा। इसके बाद शाहपुर कांडी प्रोजेक्ट, उझ डैम और सतलुज-ब्यास लिंक जैसी परियोजनाओं पर काम तेज हुआ।

पश्चिमी नदियों पर भी भारत ने बगलिहार, किशनगंगा, रतले और पाकल डुल जैसी परियोजनाएं शुरू की हैं। इनमें से कुछ चालू हैं, जबकि कुछ निर्माणाधीन हैं।

 

पानी रोकना भारत के लिए भी चुनौती क्यों?

विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिमी नदियों में सिंधु जल प्रणाली का करीब 80% पानी बहता है। यदि भारत अचानक बड़े स्तर पर पानी रोकने की कोशिश करता है, तो जम्मू-कश्मीर और पंजाब के कुछ हिस्सों में बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है।

इसके अलावा बड़े बांध और जलाशय रातोंरात नहीं बनते। इसके लिए वर्षों का समय, भारी निवेश और तकनीकी तैयारी चाहिए। यही वजह है कि भारत फिलहाल “पानी रोकने” से ज्यादा “अपने हिस्से के पानी का पूरा उपयोग” करने पर ध्यान दे रहा है।

 

क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है?

पाकिस्तान लगातार यह कोशिश कर रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस मामले में भारत पर दबाव बनाएं। लेकिन कई जानकारों का मानना है कि यह विवाद अभी भी मुख्य रूप से द्विपक्षीय ही माना जाएगा।

विश्लेषण में कहा गया है कि भारत को सिर्फ संयुक्त राष्ट्र में जवाब देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे अपनी जल परियोजनाओं को तेजी से पूरा करना चाहिए। लेख में यह भी कहा गया कि लंबे समय में मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर ही भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत बन सकता है।

 

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल दोनों देशों के बीच तनाव कम होता नहीं दिख रहा। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाता रहेगा, जबकि भारत अपनी सुरक्षा और जल अधिकारों का हवाला देता रहेगा।