पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर अब भारत की तेल कंपनियों पर साफ दिखाई देने लगा है। सरकारी तेल कंपनियां इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) लगातार भारी नुकसान झेल रही हैं। सरकार के मुताबिक ये कंपनियां पेट्रोल, डीजल और घरेलू LPG सिलेंडर को कम दाम पर बेच रही हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल और गैस काफी महंगे हो चुके हैं।
केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने बताया कि तीनों सरकारी तेल कंपनियों को हर महीने करीब ₹30 हजार करोड़ की अंडर-रिकवरी यानी नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद कंपनियां आम लोगों को राहत देने के लिए कीमतें नहीं बढ़ा रही हैं।
उन्होंने कहा कि तेल कंपनियां महंगा कच्चा तेल खरीद रही हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को झटका न लगे इसलिए पुराने दामों पर ही पेट्रोल, डीजल और गैस बेच रही हैं। इससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ रहा है।
सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर दी राहत
सरकार ने इस बोझ को कुछ हद तक कम करने के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती की है। सुजाता शर्मा के मुताबिक इस फैसले से सरकार पर खुद करीब ₹14 हजार करोड़ का अतिरिक्त भार आया है। इसके बावजूद तेल कंपनियों का घाटा लगातार बढ़ रहा है।
दिल्ली में इस समय पेट्रोल ₹94.77 प्रति लीटर और डीजल ₹87.67 प्रति लीटर बिक रहा है। वहीं 14.2 किलो वाला घरेलू LPG सिलेंडर ₹913 में मिल रहा है। सरकार ने आखिरी बार 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले पेट्रोल और डीजल के दाम ₹2 प्रति लीटर घटाए थे। तब से अब तक कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
पेट्रोल और डीजल पर कितना नुकसान?
सरकार के अनुसार तेल कंपनियों को पेट्रोल बेचने पर करीब ₹20 प्रति लीटर और डीजल पर लगभग ₹100 प्रति लीटर तक की अंडर-रिकवरी हो रही है। इसके अलावा घरेलू LPG सिलेंडर पर भी कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
हाल ही में कमर्शियल LPG सिलेंडर के दाम करीब ₹1,000 तक बढ़ाए गए थे, लेकिन घरेलू सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया। घरेलू गैस सिलेंडर के दाम आखिरी बार मार्च में ₹60 बढ़ाए गए थे।
अब लगातार बढ़ते नुकसान के कारण बाजार में यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और गैस सिलेंडर के दाम बढ़ सकते हैं।
कच्चे तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात गंभीर बने हुए हैं। यह दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक माना जाता है। यहां किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई या रुकावट का असर सीधे वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ता है।
30 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें चार साल के सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच गई थीं। ब्रेंट क्रूड का भाव 126 डॉलर प्रति बैरल तक चला गया था। शुक्रवार को भी तेल की कीमतों में तेजी बनी रही।
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्षविराम की घोषणा के बाद थोड़ी राहत जरूर मिली थी, लेकिन हाल ही में दोनों देशों की सेनाओं के बीच फिर से तनाव बढ़ने से बाजार में चिंता लौट आई है।

भारत पर क्यों पड़ता है ज्यादा असर?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
जब तेल महंगा होता है तो सरकार और तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ता है। अगर लंबे समय तक कीमतें ऊंची बनी रहें, तो पेट्रोल-डीजल महंगे करना लगभग जरूरी हो जाता है।
वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने भी अपनी अप्रैल समीक्षा रिपोर्ट में कहा था कि कई देशों ने अब बढ़ी हुई तेल कीमतों का असर उपभोक्ताओं पर डालना शुरू कर दिया है। भारत जैसे कुछ देश अभी तक कीमतें नियंत्रित किए हुए हैं, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना मुश्किल हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया कि अगर सप्लाई बाधित रहती है और मांग कम नहीं होती, तो देशों को ऊर्जा के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी।
सिर्फ पेट्रोल नहीं, हर चीज हो सकती है महंगी
तेल की कीमतों का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। जब डीजल महंगा होता है तो ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ता है। इसका असर खाने-पीने के सामान, पैकेजिंग, खेती, फैक्ट्री और रोजमर्रा की वस्तुओं पर पड़ता है।
यानी अगर पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं तो आने वाले समय में दूध, सब्जियां, राशन, FMCG उत्पाद और दूसरी जरूरी चीजें भी महंगी हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया में हालात जल्द नहीं सुधरे और कच्चा तेल लगातार महंगा बना रहा, तो सरकार और तेल कंपनियों के लिए पुराने दाम बनाए रखना मुश्किल होगा।
क्या आम लोगों को जल्द झटका लग सकता है?
फिलहाल सरकार आम उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश कर रही है। लेकिन तेल कंपनियों का बढ़ता घाटा अब चिंता का बड़ा कारण बन गया है। हर महीने ₹30 हजार करोड़ का नुकसान लंबे समय तक संभालना आसान नहीं होगा।
यही वजह है कि आने वाले हफ्तों में पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की कीमतों में बदलाव की संभावना बढ़ती जा रही है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ीं, तो आम लोगों के लिए महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।

