सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को लेकर सोमवार (18 मई) को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई। याचिका में मांग की गई थी कि इस समूह से जुड़े लोगों और उनकी गतिविधियों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से कराई जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले की तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एनके गोस्वामी ने अदालत से कहा कि यह समूह न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है और अदालत की गरिमा पर असर डाल रहा है। इस पर चीफ जस्टिस और उनके साथ मौजूद जजों की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हर चीज को इतने भावुक तरीके से देखने की जरूरत नहीं है।
यह मामला उस सोशल मीडिया अभियान से जुड़ा है, जो हाल ही में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद शुरू हुआ था। अदालत में हुई एक सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवाओं को लेकर की गई टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई। इसके बाद विरोध के रूप में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से एक ऑनलाइन अभियान शुरू किया गया।
कैसे शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ विवाद
जानकारी के मुताबिक, यह सोशल मीडिया पेज 16 मई को अभिजीत दीपक नाम के व्यक्ति ने बनाया था। दावा किया जा रहा है कि यह समूह न्यायपालिका और सरकार से जुड़े मुद्दों पर ऑनलाइन अभियान चला रहा है। कुछ ही दिनों में इस पेज ने सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फॉलोअर्स जुटा लिए।
सोमवार दोपहर तक इंस्टाग्राम पर इस पेज के करीब 2.29 करोड़ फॉलोअर्स होने का दावा किया गया। इसके बाद यह मामला और ज्यादा चर्चा में आ गया। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग इस अभियान को लेकर अपनी राय दे रहे हैं।
याचिका में कहा गया कि अदालत में सुनवाई के दौरान जजों की मौखिक टिप्पणियों का इस्तेमाल प्रचार और व्यावसायिक फायदे के लिए किया जा रहा है। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ लोग अदालत की कार्यवाही को सोशल मीडिया कंटेंट बनाकर लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं।
फर्जी डिग्री वाले वकीलों का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान एक अन्य वकील ने अदालत के सामने फर्जी लॉ डिग्री वाले लोगों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग गलत डिग्रियों के सहारे वकालत कर रहे हैं और अदालत की कार्यवाही का इस्तेमाल व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि इस मामले में इतनी तत्काल सुनवाई की जरूरत नहीं है। अदालत बाद में इस पर विचार करेगी। फिलहाल कोर्ट ने किसी भी जांच एजेंसी को तुरंत कार्रवाई का आदेश नहीं दिया।
याचिका दायर करने वाले वकील राजा चौधरी ने अदालत से मांग की कि अदालत की टिप्पणियों के कथित दुरुपयोग और फर्जी वकीलों के नेटवर्क की जांच कराई जाए। याचिका में यह भी कहा गया कि न्यायपालिका से जुड़ी बातों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर लोकप्रियता बढ़ाने के लिए नहीं होना चाहिए।
महाराष्ट्र में CJP संस्थापक के घर के बाहर पुलिस तैनात
इधर महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के संस्थापक बताए जा रहे अभिजीत दीपक के घर के बाहर पुलिस तैनात कर दी गई है। स्थानीय पुलिस अधिकारियों के अनुसार यह कदम एहतियात के तौर पर उठाया गया है।
डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस पंकज अतुलकर ने बताया कि सोशल मीडिया पर यह मुद्दा लगातार ट्रेंड कर रहा है। इसी वजह से भीड़ जुटने की आशंका को देखते हुए सुरक्षा बढ़ाई गई है। हालांकि उन्होंने कहा कि पुलिस को किसी तरह की आधिकारिक धमकी की जानकारी नहीं मिली है।
पुलिस का कहना है कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए गए हैं।

वेबसाइट बंद होने का दावा
इस बीच अभिजीत दीपक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दावा किया कि उनकी पार्टी की वेबसाइट बंद कर दी गई है। उन्होंने लिखा कि वेबसाइट पर करीब 10 लाख लोगों ने रजिस्ट्रेशन किया था और 6 लाख लोगों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग वाले अभियान पर हस्ताक्षर किए थे।
हालांकि बाद में वेबसाइट खुल नहीं रही थी। वेबसाइट खोलने पर ‘This Site Can’t Be Reached’ का संदेश दिखाई दे रहा था। फिलहाल यह साफ नहीं है कि वेबसाइट तकनीकी कारणों से बंद हुई या किसी अन्य वजह से।
सोशल मीडिया और न्यायपालिका पर नई बहस
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर सोशल मीडिया और न्यायपालिका के संबंधों पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कई लोगों का मानना है कि अदालत की कार्यवाही और टिप्पणियों का इस्तेमाल प्रचार के लिए नहीं होना चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल दौर में अदालतों से जुड़ी हर टिप्पणी कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है। ऐसे में न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तुरंत सुनवाई से इनकार किया है, लेकिन आने वाले दिनों में यह मुद्दा कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा में बना रह सकता है।

