कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर एक बार फिर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। कर्नाटक सरकार द्वारा मेकेदातु परियोजना के लिए भूमि पूजन कराने की तैयारी की खबरों के बाद तमिलनाडु सरकार सक्रिय हो गई है। मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने राज्य सचिवालय में एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाकर कावेरी जल विशेषज्ञों और कानूनी सलाहकारों के साथ विस्तृत चर्चा की।
बैठक का मुख्य उद्देश्य तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा करना और राज्य के किसानों के हितों को सुरक्षित रखना था। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इस मामले में जल्द से जल्द आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए ताकि राज्य के हितों को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे।

क्या है मेकेदातु परियोजना?
मेकेदातु परियोजना कर्नाटक की एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसके तहत कावेरी नदी पर एक बैलेंसिंग रिजर्वायर यानी जलाशय बनाने का प्रस्ताव है। यह स्थान कर्नाटक के कनकपुरा इलाके के पास स्थित है, जहां कावेरी और अर्कावती नदियां मिलती हैं।

कर्नाटक सरकार का कहना है कि इस परियोजना से बेंगलुरु और आसपास के इलाकों को पीने का पानी मिलेगा और करीब 400 मेगावाट बिजली उत्पादन भी किया जा सकेगा। लेकिन तमिलनाडु का आरोप है कि इस बांध से नीचे की ओर बहने वाले पानी की मात्रा कम हो सकती है, जिसका सीधा असर राज्य के किसानों और सिंचाई व्यवस्था पर पड़ेगा।
बैठक में क्या कहा गया?
तमिलनाडु सरकार के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि मेकेदातु परियोजना सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए फैसलों और कावेरी जल बंटवारे से जुड़े आदेशों के खिलाफ हो सकती है। अधिकारियों ने याद दिलाया कि राज्य सरकार पहले भी इस परियोजना का विरोध करते हुए 30 नवंबर 2018 और 7 जून 2022 को सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर चुकी है।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि नवंबर 2025 में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि मेकेदातु परियोजना को अभी तक अंतिम मंजूरी नहीं मिली है और यह केवल शुरुआती स्तर पर है। अदालत ने यह भी कहा था कि यह तय करना केंद्रीय जल आयोग की विशेषज्ञ समिति का काम होगा कि यह परियोजना पहले के आदेशों का उल्लंघन करती है या नहीं।
इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने दिसंबर 2025 में समीक्षा याचिका दाखिल की थी, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। अब राज्य सरकार आगे की कानूनी रणनीति तैयार करने में जुट गई है।
क्यों इतना बड़ा है यह विवाद?
कावेरी नदी दक्षिण भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। यह नदी कर्नाटक से निकलकर तमिलनाडु होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है। दोनों राज्यों की खेती और पीने के पानी की बड़ी जरूरतें इसी नदी पर निर्भर हैं।
यही वजह है कि कावेरी जल बंटवारे को लेकर विवाद नया नहीं है। यह मामला करीब 150 साल पुराना माना जाता है। ब्रिटिश काल में मैसूर रियासत और मद्रास प्रेसीडेंसी के बीच 1892 और 1924 में समझौते हुए थे। इन समझौतों के तहत ऊपरी राज्य को नदी पर बड़े निर्माण कार्यों के लिए निचले राज्य की सहमति जरूरी थी।
लेकिन समय के साथ पानी की मांग बढ़ी और विवाद गहराता गया। 1970 के दशक के बाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच तनाव लगातार बढ़ता रहा।
सुप्रीम कोर्ट और ट्रिब्यूनल का फैसला
कावेरी विवाद को सुलझाने के लिए 1990 में कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल बनाया गया था। ट्रिब्यूनल ने 2007 में अपना अंतिम फैसला दिया, जिसमें चार राज्यों – कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी – के बीच पानी बांटने का फॉर्मूला तय किया गया।
इसके बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले पर बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कावेरी नदी को राष्ट्रीय संपत्ति बताया और ट्रिब्यूनल के ज्यादातर फैसलों को बरकरार रखा। इसी फैसले के बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) बनाया गया ताकि पानी के बंटवारे के आदेशों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
तमिलनाडु का कहना है कि मेकेदातु परियोजना इन व्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकती है।
राजनीतिक दल भी हुए सक्रिय
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तमिलनाडु की समीक्षा याचिका खारिज किए जाने के बाद राज्य की राजनीति भी गर्म हो गई है। कई राजनीतिक दलों ने सरकार से सख्त कदम उठाने की मांग की है।
Anbumani Ramadoss ने केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाने की मांग की ताकि कर्नाटक को परियोजना की DPR यानी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की अनुमति वापस ली जा सके।
वहीं वाम दलों ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल राजनीतिक मामला नहीं बल्कि तमिलनाडु के किसानों और पानी की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।
किसानों की चिंता क्यों बढ़ी?
तमिलनाडु के कई जिलों में खेती पूरी तरह कावेरी नदी के पानी पर निर्भर है। किसानों को डर है कि अगर कर्नाटक में नया जलाशय बनता है तो गर्मियों और सूखे के समय तमिलनाडु तक कम पानी पहुंचेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण भारत में जल संकट लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में किसी भी नई परियोजना का असर पड़ोसी राज्यों पर भी पड़ सकता है। इसी कारण तमिलनाडु सरकार इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से देख रही है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल मेकेदातु परियोजना को लेकर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। तमिलनाडु सरकार अब नई कानूनी राय लेकर आगे की कार्रवाई की तैयारी कर रही है। दूसरी ओर कर्नाटक इस परियोजना को अपने विकास और पेयजल जरूरतों के लिए जरूरी बता रहा है।
आने वाले समय में यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के स्तर पर बड़ा राजनीतिक और कानूनी मुद्दा बन सकता है। सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि दोनों राज्यों की जरूरतों के बीच ऐसा संतुलन बनाया जाए जिससे किसानों, लोगों और पर्यावरण – तीनों के हित सुरक्षित रह सकें।

