भारत के T-72 टैंक का राज कैसे पहुंचा CIA तक? दिल्ली जिमखाना क्लब से जुड़ी वो गुप्त कहानी जिसने हिला दी थी दुनिया

साल 1978 में भारतीय सेना ने पहली बार सोवियत संघ से T-72 टैंक खरीदे थे। उस दौर में यह दुनिया के सबसे आधुनिक टैंकों में गिना जाता था। इसकी ताकतवर 125 मिमी की तोप, कम ऊंचाई वाला डिजाइन, मजबूत कवच और तेज रफ्तार इसे बेहद खतरनाक बनाते थे। भारतीय सेना के लिए यह बड़ी सैन्य ताकत साबित हुआ। उस समय पाकिस्तान के पास पुराने पैटन टैंक और चीन के बनाए टैंक थे, जबकि भारत के पास नया और ज्यादा आधुनिक T-72 आ चुका था।

लेकिन यही टैंक अमेरिका और पश्चिमी देशों की चिंता का कारण भी बन गया। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच सैन्य होड़ चरम पर थी। अमेरिका जानना चाहता था कि सोवियत तकनीक वाले इस टैंक में आखिर ऐसी क्या खासियत है जो उसे युद्ध में बढ़त दे सकती है। इसी तलाश ने एक ऐसी जासूसी कहानी को जन्म दिया, जिसका एक सिरा दिल्ली के मशहूर जिमखाना क्लब तक पहुंचता है।

India T-72 tank

जब दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई थी

1970 और 1980 का दौर शीत युद्ध का समय था। एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी देश थे, जबकि दूसरी तरफ सोवियत संघ और उसके साथी देश। दोनों गुट लगातार नए हथियार बना रहे थे। उस समय सोवियत संघ के कुछ हथियार पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गए थे। इनमें MiG-25 लड़ाकू विमान, परमाणु पनडुब्बियां और T-72 टैंक शामिल थे।

अगर कभी यूरोप में युद्ध होता, तो माना जा रहा था कि सोवियत सेना इन्हीं T-72 टैंकों के दम पर पश्चिमी देशों की सुरक्षा लाइन तोड़ने की कोशिश करती। यही वजह थी कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और पेंटागन इस टैंक के बारे में हर जानकारी हासिल करना चाहते थे।

भारत क्यों बना CIA की दिलचस्पी का केंद्र

उस समय भारत सोवियत हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका था। भारत लड़ाकू विमान, टैंक और पनडुब्बियां सब कुछ सोवियत संघ से खरीद रहा था। CIA के पूर्व एजेंट रॉबर्ट बेयर ने अपनी किताब See No Evil में लिखा कि भारत उस समय सोवियत सैन्य जानकारी जुटाने के लिए दुनिया का सबसे अहम देश बन गया था।

CIA को उम्मीद थी कि भारत के जरिए उसे सोवियत हथियारों के डिजाइन, तकनीक और कमजोरियों की जानकारी मिल सकती है। इसलिए नई दिल्ली में मौजूद अमेरिकी दूतावास के कुछ अधिकारी लगातार भारतीय सैन्य तंत्र से जुड़ी जानकारियां जुटाने में लगे थे।

 

दिल्ली जिमखाना क्लब बना गुप्त मुलाकातों की जगह

दिल्ली का जिमखाना क्लब उस समय देश के सबसे प्रतिष्ठित क्लबों में गिना जाता था। यहां बड़े अफसर, राजनयिक और प्रभावशाली लोग आते-जाते थे। विदेशी एजेंसियों के लिए यह ऐसी जगह थी जहां बिना ज्यादा शक पैदा किए लोगों से मुलाकात की जा सकती थी।

रॉबर्ट बेयर के अनुसार, विदेशी जासूस यहां भारतीय अधिकारियों से मिलते थे और भारत की खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी IB की नजरों से बचने की कोशिश करते थे। हालांकि IB उस दौर में काफी मजबूत मानी जाती थी और विदेशी एजेंटों पर लगातार नजर रखती थी।

 

T-72 के दस्तावेज हासिल करने की कोशिश

CIA लंबे समय से T-72 टैंक के असली तकनीकी दस्तावेज हासिल करना चाहती थी। एजेंसी ने कई तरीके अपनाए। दावा किया गया कि किसी भारतीय सैन्य अधिकारी को पाकिस्तान की सीमा तक टैंक ले जाने के लिए मनाने की कोशिश हुई। यहां तक कि टैंक के कवच का नमूना निकालने की भी योजना बनाई गई, ताकि उसकी मजबूती को समझा जा सके।

लेकिन ये सभी प्रयास सफल नहीं हुए। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी और सख्ती के कारण CIA को कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पा रही थी।

 

फिर आया वो दिन जिसने सब बदल दिया

रॉबर्ट बेयर के मुताबिक, अगस्त 1978 के आखिर में उन्हें एक भारतीय संपर्क ने एक बैग सौंपा। उस बैग में T-72 टैंक के तकनीकी मैनुअल मौजूद थे। बेयर ने इसे “होली ग्रेल” यानी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया।

समस्या यह थी कि दस्तावेज केवल कुछ घंटों के लिए ही मिल सकते थे। उन्हें जल्दी से कॉपी करके वापस लौटाना जरूरी था, वरना मामला खुल सकता था। उस समय दिल्ली की सड़कों पर IB की निगरानी काफी कड़ी थी।

बेयर ने जोखिम उठाने का फैसला किया। उन्होंने दस्तावेज लेकर अमेरिकी दूतावास पहुंचे और वहां उनकी कॉपी तैयार करवाई। इसके बाद उन्हें तय समय पर दस्तावेज वापस लौटाने थे।

 

फिल्मी अंदाज में हुआ ऑपरेशन

बेयर के अनुसार, जब वे जिमखाना क्लब की तरफ लौट रहे थे, तब उन्हें शक हुआ कि IB की कई गाड़ियां उनका पीछा कर रही हैं। उन्होंने क्लब के अंदर गाड़ी मोड़ी और एक कच्चे रास्ते की तरफ निकल गए, जहां पीछा कर रही गाड़ियां नहीं पहुंच सकीं।

उन्होंने दस्तावेज वाले बैग को टेनिस बैग में छिपाया और क्लब के गेस्ट हाउस के पास मौजूद अपने संपर्क को सौंप दिया। इसके बाद वे सीधे क्लब के बार में चले गए और ऐसे व्यवहार करने लगे जैसे किसी पुराने दोस्त से मिलने आए हों।

उधर भारतीय संपर्क दस्तावेज लेकर वहां से निकल चुका था। इस तरह CIA को T-72 टैंक से जुड़ी बेहद अहम जानकारी मिल गई।

 

अमेरिका को क्या फायदा मिला

इन दस्तावेजों की कॉपी बाद में अमेरिका पहुंचाई गई। CIA और पेंटागन ने इनका अध्ययन किया। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने T-72 की खूबियों और कमजोरियों दोनों को समझा।

CIA की एक रिपोर्ट में बताया गया कि T-72 का फायर कंट्रोल सिस्टम पुराने सोवियत टैंकों से बेहतर था। उसकी तोप ज्यादा ताकतवर थी और कवच भी मजबूत था। लेकिन उसकी एक बड़ी कमजोरी रात में लड़ने की क्षमता मानी गई। उसके नाइट विजन सिस्टम की सीमा पश्चिमी टैंकों की तुलना में कम थी।

माना जाता है कि इन जानकारियों का इस्तेमाल बाद में अमेरिकी रक्षा कंपनियों और सेना ने अपने टैंक और एंटी-टैंक सिस्टम बेहतर बनाने में किया।

 

खाड़ी युद्ध में बदला खेल

1991 के पहले खाड़ी युद्ध में पश्चिमी देशों के आधुनिक टैंक, जैसे M1 Abrams, ने इराकी T-72 टैंकों को आसानी से पीछे छोड़ दिया। पश्चिमी टैंकों में बेहतर थर्मल इमेजर, आधुनिक नाइट विजन और सटीक फायर कंट्रोल सिस्टम थे।

यही वह दौर था जब दुनिया ने देखा कि तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम युद्ध में कितने अहम हो चुके हैं। भारत ने भी बाद में T-72 की सीमाओं को देखते हुए T-90 टैंक शामिल किए।

 

भारत ने शुरू किया आधुनिकीकरण

भारतीय सेना अभी भी बड़ी संख्या में T-72 टैंक इस्तेमाल करती है। इन्हें आधुनिक बनाने के लिए “प्रोजेक्ट राइनो” शुरू किया गया। इसके तहत नए इंजन, बेहतर फायर कंट्रोल सिस्टम और अतिरिक्त सुरक्षा दी जा रही है।

इसके अलावा भविष्य में कुछ T-72 टैंकों को बिना चालक वाले कॉम्बैट प्लेटफॉर्म में बदलने की भी योजना पर काम हो रहा है। सेना चाहती है कि ये टैंक 2030 के बाद भी उपयोगी बने रहें, जब तक नई पीढ़ी के Future Ready Combat Vehicle पूरी तरह सेना में शामिल नहीं हो जाते।

 

भारत में जासूसी का लंबा इतिहास

रॉबर्ट बेयर की कहानी केवल एक घटना नहीं थी। बाद के वर्षों में भी भारत में कई जासूसी मामले सामने आए। 1987 में R&AW के एक अधिकारी को CIA से संबंधों के आरोपों में घेरा गया। 1996 में IB के वरिष्ठ अधिकारी रतन सहगल का नाम भी अमेरिकी संपर्कों के कारण चर्चा में आया।

2004 में R&AW अधिकारी रवींद्र सिंह अमेरिका भाग गए थे। इन मामलों ने दिखाया कि शीत युद्ध खत्म होने के बाद भी भारत विदेशी एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण बना रहा।

 

आज भी उठते हैं कई सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वे लोग कौन थे जिन्होंने T-72 के दस्तावेज CIA तक पहुंचाए? क्या वे सिर्फ पैसे के लिए ऐसा कर रहे थे या किसी और वजह से? और क्या उस दौर में भारत के दूसरे सैन्य राज भी विदेशी एजेंसियों तक पहुंचे?

इन सवालों के जवाब आज भी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं। लेकिन इतना तय है कि दिल्ली जिमखाना क्लब से जुड़ी यह कहानी भारत के जासूसी इतिहास के सबसे दिलचस्प और संवेदनशील अध्यायों में गिनी जाती है।

आज जब दुनिया फिर से बड़े देशों की प्रतिस्पर्धा के दौर में प्रवेश कर रही है, तब यह घटना याद दिलाती है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़े जाते। कई बार सबसे बड़ी लड़ाई जानकारी हासिल करने और उसे छिपाने की होती है।