भारत में परिवार, स्वास्थ्य और महिलाओं की स्थिति को लेकर एक नई तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2023-24 (NFHS-6) की रिपोर्ट जारी होने के बाद देश में सामाजिक और स्वास्थ्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण बदलावों का पता चला है। रिपोर्ट बताती है कि एक ओर महिलाओं में मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर घरेलू हिंसा और बाल विवाह जैसे मामलों में कमी दर्ज की गई है।
इसके अलावा महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, इंटरनेट उपयोग, बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच और संपत्ति में हिस्सेदारी जैसे कई क्षेत्रों में भी सुधार देखने को मिला है। हालांकि कुछ ऐसे संकेत भी सामने आए हैं जो चिंता बढ़ाने वाले हैं, जैसे बच्चों को मिलने वाला संतुलित पोषण और स्तनपान की घटती दर।
महिलाओं में मोटापा तेजी से बढ़ा
रिपोर्ट के अनुसार देश में महिलाओं के बीच मोटापा और अधिक वजन की समस्या पहले की तुलना में बढ़ गई है। वर्तमान में 30.7% महिलाएं और 27.3% पुरुष अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में आते हैं।
साल 2019-21 के मुकाबले महिलाओं में मोटापे की दर लगभग 7 प्रतिशत बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी और खान-पान की आदतों में बदलाव इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।
राज्यों की बात करें तो आंध्र प्रदेश और सिक्किम में महिलाओं में मोटापे की दर सबसे अधिक 48% दर्ज की गई है। इसके बाद केरल में यह आंकड़ा 46.7% है। दूसरी तरफ मेघालय (13.8%) और झारखंड (16.9%) में यह दर सबसे कम है।
घरेलू हिंसा और बाल विवाह में कमी
रिपोर्ट का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि देश में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में गिरावट दर्ज की गई है।
पिछले सर्वेक्षण में जहां 29.2% महिलाओं ने घरेलू हिंसा का सामना करने की बात कही थी, वहीं अब यह आंकड़ा घटकर 22.3% रह गया है। यह बदलाव महिलाओं की जागरूकता, शिक्षा और कानूनी सहायता तक बेहतर पहुंच का संकेत माना जा रहा है।
इसी तरह बाल विवाह के मामलों में भी कमी आई है। पहले जहां 23.3% लड़कियों की शादी कम उम्र में हो रही थी, अब यह आंकड़ा घटकर 20.1% रह गया है।
हालांकि कुछ राज्यों में स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। केरल में बाल विवाह की दर सबसे कम 2.9% है, जबकि पश्चिम बंगाल (36.4%) और बिहार (34.6%) में यह सबसे ज्यादा दर्ज की गई है।

महिलाओं की भागीदारी और आर्थिक स्थिति में सुधार
देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक अब 30.8% महिलाएं किसी न किसी प्रकार के रोजगार से जुड़ी हुई हैं। पिछले सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 25.4% था।
इसके अलावा महिलाओं की संपत्ति में हिस्सेदारी भी बढ़ी है। वर्तमान में 18.8% परिवारों में घर या जमीन महिलाओं के नाम पर है। साल 2021 में यह आंकड़ा केवल 14% था।
ग्रामीण क्षेत्रों में 19.1% और शहरी इलाकों में 18.2% महिलाओं के पास संपत्ति का स्वामित्व है। इसे महिलाओं की आर्थिक मजबूती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इंटरनेट और मोबाइल फोन तक पहुंच बढ़ी
डिजिटल दुनिया में भी महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। सर्वेक्षण के अनुसार अब 64.3% महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं। पिछली रिपोर्ट के मुकाबले यह लगभग दोगुना वृद्धि है।
साथ ही 63.6% महिलाएं अपने मोबाइल फोन की मालिक हैं और उसे स्वयं संचालित करती हैं। डिजिटल सेवाओं के बढ़ते उपयोग से महिलाओं को शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने में मदद मिल रही है।
मध्य प्रदेश में इंटरनेट का उपयोग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 26.9% से बढ़कर 62% हो गया है। वहीं महिलाओं के सक्रिय बैंक खातों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच बेहतर हुई
रिपोर्ट बताती है कि अब देश के 60.2% परिवार किसी न किसी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा से जुड़े हुए हैं।
इसके अलावा बिजली और साफ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं की पहुंच भी पहले से बेहतर हुई है। वर्तमान में 98.3% घरों तक बिजली पहुंच चुकी है, जबकि 96.5% परिवारों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है।
ये आंकड़े ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जीवन स्तर में सुधार का संकेत देते हैं।
बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार, लेकिन पोषण अब भी चिंता
बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी तस्वीर मिश्रित दिखाई देती है। एक ओर कुपोषण से प्रभावित बच्चों में ठिगनेपन (स्टंटिंग) की समस्या कम हुई है। पहले यह दर 35.5% थी, जो अब घटकर 29.3% रह गई है। यानी बच्चों की लंबाई और शारीरिक विकास में सुधार दर्ज किया गया है।
लेकिन दूसरी ओर 6 महीने से 2 साल तक की उम्र के केवल 15.3% बच्चों को ही सही और संतुलित आहार मिल पा रहा है।
इसका मतलब है कि लगभग 85% बच्चे अभी भी अपनी आवश्यक पोषण जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। विशेषज्ञ इसे भविष्य के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती मानते हैं।
स्तनपान की दर में गिरावट
रिपोर्ट में एक और चिंता की बात सामने आई है। जन्म के बाद पहले छह महीनों तक केवल मां का दूध पिलाने की दर पहले 63.7% थी, जो अब घटकर 55.8% रह गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती छह महीनों तक स्तनपान बच्चे की प्रतिरक्षा क्षमता और शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी होता है। इसलिए इस गिरावट पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
सी-सेक्शन डिलीवरी का रिकॉर्ड स्तर
देश में निजी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी यानी ऑपरेशन से होने वाले प्रसव की संख्या लगातार बढ़ रही है।
रिपोर्ट के अनुसार निजी अस्पतालों में 54.1% प्रसव अब सी-सेक्शन के जरिए हो रहे हैं, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जहां जरूरत हो वहां सी-सेक्शन जरूरी है, लेकिन अनावश्यक ऑपरेशन से बचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
बिहार में वैवाहिक हिंसा सबसे अधिक
महिलाओं के खिलाफ वैवाहिक हिंसा के मामलों में राज्यों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला।
हिमाचल प्रदेश में केवल 4.3% महिलाओं ने वैवाहिक हिंसा की शिकायत की, जिससे यह देश का सबसे सुरक्षित राज्य माना गया।
वहीं बिहार में 36.1% महिलाओं ने पति या साथी द्वारा हिंसा का सामना करने की बात कही, जो देश में सबसे अधिक है।
WHO की रिपोर्ट ने भी जताई चिंता
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 30% महिलाएं अपने जीवन में कभी न कभी साथी द्वारा हिंसा का सामना कर चुकी हैं।
इसमें मानसिक, आर्थिक और यौन शोषण जैसी घटनाएं शामिल हैं। रिपोर्ट बताती है कि 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की हर पांच में से एक महिला इस समस्या से प्रभावित है।
बदलते भारत की नई तस्वीर
NFHS-6 रिपोर्ट भारत में हो रहे सामाजिक बदलावों की एक विस्तृत तस्वीर पेश करती है। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, डिजिटल पहुंच और संपत्ति में हिस्सेदारी बढ़ना सकारात्मक संकेत हैं। वहीं घरेलू हिंसा और बाल विवाह में कमी भी समाज में सुधार की ओर इशारा करती है।
लेकिन मोटापे की बढ़ती समस्या, बच्चों में पोषण की कमी, घटती स्तनपान दर और कुछ राज्यों में अब भी ऊंचे स्तर की वैवाहिक हिंसा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार और समाज दोनों को मिलकर काम करने की जरूरत है।
कुल मिलाकर यह रिपोर्ट बताती है कि भारत कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है, लेकिन बेहतर स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी काफी काम बाकी है।

