अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित और कठिन छात्र प्रतियोगिताओं में गिनी जाने वाली Scripps National Spelling Bee 2026 में इस बार भी भारतीय मूल के छात्र ने बाजी मार ली है। कैलिफोर्निया में रहने वाले 14 वर्षीय श्रेय पारिख ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रतियोगिता का खिताब अपने नाम कर लिया। फाइनल मुकाबले में उन्होंने न्यू जर्सी के 12 वर्षीय ईशान गुप्ता को पीछे छोड़ते हुए जीत हासिल की।
इस जीत के साथ श्रेय पारिख को 50 हजार डॉलर की पुरस्कार राशि और प्रतिष्ठित Scripps Cup प्रदान किया गया। खास बात यह है कि लगातार पांचवें साल किसी भारतीय मूल के छात्र ने यह खिताब जीता है, जिससे इस प्रतियोगिता में भारतीय समुदाय का दबदबा और मजबूत हुआ है।
90 सेकंड में 32 शब्द सही बोलकर बनाया रिकॉर्ड
इस वर्ष प्रतियोगिता बेहद रोमांचक रही। कई राउंड तक मुकाबला बराबरी पर चलता रहा और नौवें राउंड के बाद भी निर्णायक विजेता सामने नहीं आ सका। इसके बाद नियमों के अनुसार “स्पेल-ऑफ” राउंड कराया गया।
स्पेल-ऑफ में प्रतिभागियों को 90 सेकंड के भीतर जितने संभव हों उतने शब्द सही स्पेल करने होते हैं। श्रेय ने इस राउंड में 35 में से 32 शब्दों की सही स्पेलिंग बताई और नया रिकॉर्ड बना दिया। वहीं ईशान गुप्ता 25 शब्द सही स्पेल कर सके।
इसी शानदार प्रदर्शन ने श्रेय को प्रतियोगिता का विजेता बना दिया।
नौ राउंड तक नहीं निकल पाया था नतीजा
फाइनल मुकाबले के दौरान दोनों प्रतिभागियों ने असाधारण प्रदर्शन किया। श्रेय ने “Philepitta” शब्द की सही स्पेलिंग बताई, जबकि ईशान ने “Ertebolle” शब्द को सही लिखा। इसके बाद भी बराबरी बनी रही और निर्णायक परिणाम के लिए स्पेल-ऑफ का सहारा लेना पड़ा।
स्पेल-ऑफ प्रणाली वर्ष 2021 में शुरू की गई थी ताकि लंबे समय तक बराबरी की स्थिति रहने पर विजेता तय किया जा सके। इस प्रक्रिया में दोनों प्रतियोगियों को एक जैसे शब्द दिए जाते हैं। जब एक प्रतिभागी मंच पर होता है तो दूसरा अलग कमरे में हेडफोन लगाकर बैठता है।
श्रेय के लिए यह था आखिरी मौका
कैलिफोर्निया के रैंचो कुकामोंगा शहर में रहने वाले श्रेय पारिख आठवीं कक्षा के छात्र हैं। स्पेलिंग बी के नियमों के अनुसार आठवीं कक्षा के बाद कोई छात्र इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकता।
इस कारण 2026 का संस्करण श्रेय के लिए आखिरी अवसर था और उन्होंने इसे यादगार बनाते हुए सीधे खिताब अपने नाम कर लिया।

लगभग 100 साल पुरानी है यह प्रतियोगिता
Scripps National Spelling Bee की शुरुआत वर्ष 1925 में अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में हुई थी। पहले संस्करण में केवल नौ बच्चों ने हिस्सा लिया था।
उस समय 11 वर्षीय फ्रैंक न्यूहाउजर पहले विजेता बने थे और उन्हें पुरस्कार के रूप में 500 डॉलर मूल्य के सोने के सिक्के मिले थे।
आज यह प्रतियोगिता अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित छात्र प्रतियोगिताओं में शामिल है और लाखों छात्र इसमें भाग लेने का सपना देखते हैं।
भारतीय मूल के बच्चों का लगातार दबदबा
पिछले कई वर्षों से इस प्रतियोगिता में भारतीय मूल के छात्रों का शानदार प्रदर्शन देखने को मिल रहा है।
हाल के वर्षों के विजेताओं पर नजर डालें तो –
- 2022 में हरिनी लोगन विजेता बनीं
- 2023 में देव शाह ने खिताब जीता
- 2024 में ब्रुहत सोमा चैंपियन बने
- 2025 में फैजान जाकी विजेता रहे
- 2026 में श्रेय पारिख ने ट्रॉफी अपने नाम की
इस तरह लगातार पांच वर्षों से भारतीय मूल के छात्र इस प्रतियोगिता में शीर्ष स्थान हासिल कर रहे हैं।
37 में से 31 बार भारतीय मूल के छात्रों ने जीता खिताब
आंकड़े बताते हैं कि पिछले 37 संस्करणों में से 31 बार भारतीय मूल के छात्र विजेता रहे हैं। यह उपलब्धि दिखाती है कि स्पेलिंग बी प्रतियोगिता में भारतीय-अमेरिकी छात्रों की तैयारी और मेहनत कितनी मजबूत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि परिवारों का सहयोग, भाषा सीखने पर विशेष ध्यान और लगातार अभ्यास इस सफलता के प्रमुख कारण हैं।
1985 में मिला था पहला भारतीय विजेता
इस प्रतियोगिता में भारतीय मूल के पहले विजेता बालू नटराजन थे, जिन्होंने 1985 में खिताब जीता था। इसके बाद 1988 में रागेश्री रामचंद्रन ने भी यह उपलब्धि हासिल की।
1999 में नूपुर लाला की जीत के बाद भारतीय मूल के छात्रों का दबदबा लगातार बढ़ता गया। पिछले दो दशकों में केवल कुछ ही ऐसे साल रहे हैं जब यह ट्रॉफी भारतीय मूल के छात्र के पास नहीं गई।
12 साल तक लगातार चला जीत का सिलसिला
2008 में समीर मिश्रा की जीत के बाद भारतीय-अमेरिकी छात्रों ने लगातार 12 वर्षों तक प्रतियोगिता पर कब्जा बनाए रखा।
यह सिलसिला 2021 में टूटा जब अमेरिका की पहली अफ्रीकी-अमेरिकी विजेता जैला अवांट-गार्डे ने खिताब जीता। हालांकि अगले ही साल 2022 में हरिनी लोगन की जीत के साथ भारतीय मूल के छात्रों का दबदबा फिर लौट आया।
क्यों खास मानी जाती है यह सफलता?
Scripps National Spelling Bee केवल शब्दों की स्पेलिंग याद रखने की प्रतियोगिता नहीं है। इसमें प्रतिभागियों को विभिन्न भाषाओं की उत्पत्ति, शब्दों के इतिहास और उनके सही उच्चारण की गहरी समझ भी रखनी पड़ती है।
इसी वजह से इसे अमेरिका की सबसे चुनौतीपूर्ण छात्र प्रतियोगिताओं में गिना जाता है।
श्रेय पारिख की यह जीत न केवल उनके परिवार के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि दुनिया भर में रहने वाले भारतीय मूल के छात्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। लगातार पांचवें साल भारतीय मूल के छात्र द्वारा खिताब जीतना इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा और अकादमिक प्रतियोगिताओं में भारतीय समुदाय का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

