एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अमेरिका ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इस क्षेत्र में अपनी भूमिका कम करने वाला नहीं है। हालांकि अब वॉशिंगटन चाहता है कि उसके सहयोगी देश भी अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी पहले से ज्यादा उठाएं। इसी कड़ी में अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भारत समेत कई एशियाई देशों की सैन्य तैयारियों की सराहना की और चीन को लेकर कड़ा संदेश दिया।
सिंगापुर में आयोजित प्रतिष्ठित सुरक्षा सम्मेलन शांगरी-ला डायलॉग में बोलते हुए हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन क्षेत्रीय देशों को भी अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना होगा।

भारत की सैन्य तैयारी की खुलकर सराहना
अपने संबोधन के दौरान अमेरिकी रक्षा मंत्री ने भारत का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बदलते सुरक्षा माहौल में भारत उन देशों में शामिल है जो लगातार अपनी सैन्य क्षमता और रक्षा तैयारियों को मजबूत कर रहे हैं।

भारत के अलावा उन्होंने वियतनाम की भी तारीफ की। वहीं फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों को भी क्षेत्रीय सुरक्षा में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सराहा।
हेगसेथ के अनुसार, किसी भी मजबूत साझेदारी की नींव साझा हितों और समान सुरक्षा लक्ष्यों पर टिकी होती है। उन्होंने कहा कि सहयोग तभी सफल होता है जब सभी देश अपनी जिम्मेदारी निभाएं और केवल अमेरिका पर निर्भर न रहें।
चीन को अमेरिका का सख्त संदेश
हालांकि अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा कि मौजूदा समय में अमेरिका और चीन के रिश्ते हाल के वर्षों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन उन्होंने चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर गंभीर चिंता भी जताई।
हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका ऐसा शक्ति संतुलन बनाए रखना चाहता है जिसमें कोई भी देश, चाहे वह चीन ही क्यों न हो, पूरे क्षेत्र पर अपना दबदबा न बना सके।
उनका कहना था कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के कई देशों में चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और उसकी गतिविधियों को लेकर चिंता बढ़ रही है। उन्होंने दावा किया कि चीन केवल अपने आसपास ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है, जिसे कई देश ध्यान से देख रहे हैं।
हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका शांति चाहता है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि क्षेत्र में सभी देशों की संप्रभुता और सुरक्षा का सम्मान किया जाए।
रक्षा बजट बढ़ाने पर जोर
अमेरिकी रक्षा मंत्री के भाषण का एक बड़ा हिस्सा रक्षा खर्च को लेकर था। उन्होंने कहा कि अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी देश अपनी जीडीपी का बड़ा हिस्सा रक्षा क्षेत्र पर खर्च करें।
उनके अनुसार, जो देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने और रक्षा निवेश में गंभीरता दिखाएंगे, उन्हें अमेरिका की ओर से कई अतिरिक्त लाभ मिल सकते हैं।
इनमें आधुनिक हथियारों की तेज आपूर्ति, रक्षा उद्योग में सहयोग और खुफिया जानकारी साझा करने जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं।
हेगसेथ ने संकेत दिया कि अमेरिका उन देशों को प्राथमिकता देगा जो अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा निवेश करेंगे और सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था में सक्रिय योगदान देंगे।
सहयोगियों के लिए भी चेतावनी
अमेरिकी रक्षा मंत्री ने केवल विरोधी देशों को ही नहीं, बल्कि सहयोगी देशों को भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जो देश अपनी रक्षा जिम्मेदारियों को गंभीरता से नहीं लेंगे, उनके साथ अमेरिका के संबंधों की प्रकृति में बदलाव आ सकता है।
यह बयान उस नीति से मेल खाता है जिसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से दोहराते रहे हैं। ट्रम्प का मानना रहा है कि कई सहयोगी देश अमेरिकी सुरक्षा छतरी का लाभ तो लेते हैं, लेकिन अपनी ओर से पर्याप्त योगदान नहीं देते।
हेगसेथ ने स्पष्ट किया कि भविष्य में अमेरिका ऐसे देशों से अधिक भागीदारी और निवेश की उम्मीद करेगा।
यूरोप पर भी साधा निशाना
अपने भाषण में हेगसेथ ने यूरोपीय देशों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कुछ यूरोपीय देशों ने लंबे समय तक अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता दिखाई है।
उनका मानना है कि प्रत्येक क्षेत्र को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए खुद भी पर्याप्त प्रयास करने चाहिए।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका अपने साझेदारों से दूरी नहीं बना रहा है, बल्कि वह एक अधिक संतुलित और जिम्मेदार सुरक्षा ढांचा तैयार करना चाहता है।
“अमेरिका फर्स्ट” का मतलब अकेला अमेरिका नहीं
भाषण के अंत में हेगसेथ ने कहा कि “अमेरिका फर्स्ट” नीति का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका दुनिया से अलग हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि मजबूत गठबंधन तभी बनते हैं जब सभी सदस्य देश अपनी क्षमता के अनुसार योगदान दें। किसी भी साझेदारी की सफलता केवल एक देश की ताकत पर नहीं, बल्कि सभी भागीदारों की संयुक्त क्षमता पर निर्भर करती है।
एशिया में बदल रहा है सुरक्षा समीकरण
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के ताजा बयान से साफ संकेत मिलता है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना रहेगा।
भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान, फिलीपींस और अन्य देशों की बढ़ती सैन्य तैयारियां इस क्षेत्र में नए शक्ति संतुलन को जन्म दे रही हैं। वहीं चीन की बढ़ती सैन्य ताकत के कारण अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बीच रणनीतिक सहयोग लगातार मजबूत होता दिखाई दे रहा है।
ऐसे समय में भारत का नाम अमेरिका द्वारा प्रमुख सुरक्षा साझेदारों में शामिल किया जाना यह दर्शाता है कि वैश्विक रणनीतिक समीकरणों में नई दिल्ली की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

