भारत सरकार ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य तय समय से करीब पांच साल पहले हासिल कर लिया है। पहले यह लक्ष्य वर्ष 2030 तक पूरा किया जाना था, लेकिन देशभर में अब E20 मानक पेट्रोल उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके बाद सरकार का अगला कदम पेट्रोल में 25% एथेनॉल मिश्रण (E25) लागू करना माना जा रहा था। हालांकि अब सरकार इस दिशा में जल्दबाजी नहीं करना चाहती। E20 लागू होने के बाद सामने आई शिकायतों, ऑटोमोबाइल उद्योग की चिंताओं और उपभोक्ताओं की प्रतिक्रियाओं को देखते हुए सरकार ने संकेत दिए हैं कि E25 की ओर बढ़ने की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से होगी।

हाल के दिनों में पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने को लेकर देशभर में बहस तेज हुई है। कई वाहन मालिकों ने माइलेज कम होने और पुराने वाहनों के कुछ पुर्जों पर असर पड़ने जैसी शिकायतें की हैं। वहीं वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि E25 लागू करने से पहले पूरे वाहन तंत्र और ईंधन व्यवस्था को तैयार करना जरूरी है।
E20 से E25 तक का सफर
भारत सरकार कई वर्षों से एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम चला रही है। शुरुआत E10 यानी 10% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से हुई थी। इसके बाद सरकार ने E20 का लक्ष्य वर्ष 2030 तक हासिल करने की योजना बनाई थी, लेकिन इस लक्ष्य को केवल तीन वर्षों में पूरा कर लिया गया।
E20 लागू होने के बाद अब अगला चरण E25 माना जा रहा है, जिसमें पेट्रोल में 25% एथेनॉल और 75% पेट्रोल होगा। हालांकि सरकार ने अभी तक E25 लागू करने की कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की है।

सरकार की रणनीति में बदलाव
पिछले कुछ सप्ताह में सरकार के दो फैसलों ने E25 को लेकर चर्चा तेज कर दी। पहला, 22% से 30% तक एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में छूट का प्रावधान और दूसरा, भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा ऐसे ईंधन के लिए नए गुणवत्ता मानकों की अधिसूचना।
इन फैसलों के बाद माना जाने लगा कि सरकार जल्द ही E25 लागू करने की तैयारी कर रही है। लेकिन सरकारी सूत्रों के अनुसार हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठक में यह महसूस किया गया कि E20 के अनुभव से सीख लेते हुए E25 को जल्दबाजी में लागू नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार का मानना है कि इस बार पूरे इकोसिस्टम को तैयार होने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा, ताकि वाहन निर्माता, तेल कंपनियां और उपभोक्ता सभी नए बदलाव के लिए तैयार रहें।
E20 लागू होने के बाद क्यों बढ़ा विवाद?
E20 लागू होने के बाद देश के कई वाहन मालिकों ने शिकायत की कि उनकी गाड़ियों का माइलेज पहले की तुलना में कम हो गया है। विशेष रूप से पुराने वाहन मालिकों ने इंजन की कार्यक्षमता, ईंधन की खपत और कुछ पुर्जों पर असर पड़ने की आशंका जताई।

हालांकि सरकार का कहना है कि ARAI (Automotive Research Association of India) समेत कई संस्थानों द्वारा किए गए परीक्षणों में E20 से माइलेज पर केवल मामूली असर पाया गया है, लेकिन उपभोक्ताओं का अनुभव इससे अलग रहा। यही कारण है कि E25 को लेकर भी पहले से ही बहस शुरू हो गई है।
ऑटो कंपनियों की चिंता
वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि E20 से आगे बढ़कर E25 लागू करना केवल ईंधन बदलने का मामला नहीं है। इसके लिए इंजनों की नई कैलिब्रेशन, फ्यूल सिस्टम की मजबूती, जंग से सुरक्षा, नए मैटेरियल का इस्तेमाल और पूरी तरह नए परीक्षण करने होंगे।
इसके अलावा हर नए इंजन और वाहन को दोबारा होमोलोगेशन (Homologation) यानी नियामकीय प्रमाणन प्रक्रिया से भी गुजरना होगा। यह पूरी प्रक्रिया समय लेने वाली है। इसी कारण ऑटो उद्योग चाहता है कि सरकार E25 को धीरे-धीरे लागू करे।
सरकार ने E20 को लेकर क्या सफाई दी?
E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्ट्स में माइलेज कम होने, इंजन खराब होने, इंश्योरेंस क्लेम रद्द होने और ज्यादा पानी की खपत जैसे कई दावे किए गए थे। इन विवादों के बीच पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने विस्तृत स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि इनमें से कई दावे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं।
सरकार के अनुसार E20 पेट्रोल की वजह से 30% माइलेज कम होने का दावा सही नहीं है। मंत्रालय का कहना है कि यह आंकड़ा केवल एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता (कैलोरिफिक वैल्यू) की तुलना से जुड़ा है, जबकि वास्तविक माइलेज ड्राइविंग स्टाइल, वाहन की स्थिति, टायर प्रेशर और रखरखाव जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
इंजन खराब होने की आशंकाओं पर सरकार ने कहा कि E20 लागू करने से पहले ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), इंडियन ऑयल, सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और वाहन निर्माताओं के साथ व्यापक परीक्षण किए गए थे। इन परीक्षणों में E20 के कारण बड़े पैमाने पर इंजन खराब होने या धातु एवं प्लास्टिक के पुर्जों पर नुकसान के सबूत नहीं मिले। हालांकि पुराने वाहनों के कुछ रबर पार्ट्स अपेक्षाकृत जल्दी बदलने पड़ सकते हैं।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने से E20-अनुकूल (E20 Compatible) वाहनों की वारंटी या इंश्योरेंस पर कोई असर नहीं पड़ता। वाहन निर्माता कंपनियों और बीमा कंपनियों ने भी इस संबंध में स्पष्ट किया है कि केवल E20 ईंधन इस्तेमाल करने के आधार पर किसी दावे को खारिज नहीं किया जाएगा।
सरकार ने सोशल मीडिया पर वायरल उस दावे को भी गलत बताया जिसमें कहा गया था कि गन्ने का रस सीधे पेट्रोल में मिलाया जाता है। मंत्रालय के अनुसार एथेनॉल एक औद्योगिक प्रक्रिया के तहत किण्वन (Fermentation) और डिस्टिलेशन (Distillation) के बाद तैयार किया जाता है तथा गुणवत्ता मानकों को पूरा करने के बाद ही पेट्रोल में मिलाया जाता है।
पानी की खपत को लेकर भी सरकार ने कहा कि 1 लीटर एथेनॉल बनाने में 10 हजार लीटर पानी खर्च होने का दावा भ्रामक है। मंत्रालय के मुताबिक आधुनिक डिस्टिलरी संयंत्रों में प्रति लीटर एथेनॉल उत्पादन के लिए केवल लगभग 3 से 5 लीटर प्रोसेस्ड पानी की जरूरत होती है और अधिकांश संयंत्र Zero Liquid Discharge (ZLD) तकनीक पर काम करते हैं।
वाहन कंपनियों ने क्या कहा?
मारुति सुजुकी के वरिष्ठ अधिकारी राहुल भारती के अनुसार कंपनी ने वर्ष 2025-26 के दौरान 2.84 करोड़ वाहनों का सर्विस डेटा जांचा। इनमें से लगभग 1.5 करोड़ वाहन तीन साल से अधिक पुराने थे और E20 प्रमाणित नहीं थे। इसके बावजूद E20 के कारण बड़े पैमाने पर इंजन खराब होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। उनके अनुसार यदि कोई कार सामान्यतः 20 किमी प्रति लीटर का माइलेज देती है, तो E20 पर माइलेज में औसतन लगभग 0.6 किमी प्रति लीटर की ही कमी देखी गई।

टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के कंट्री हेड विक्रम गुलाटी ने कहा कि E20 लागू करने से पहले पुराने वाहनों पर भी व्यापक परीक्षण किए गए थे और एथेनॉल दुनिया के कई देशों में लंबे समय से सुरक्षित ईंधन के रूप में इस्तेमाल हो रहा है।
हीरो मोटोकॉर्प के मुख्य व्यवसाय अधिकारी अशुतोष वर्मा ने कहा कि कंपनी के सर्विस रिकॉर्ड में भी E20 के कारण वाहनों में अतिरिक्त खराबी का कोई पैटर्न सामने नहीं आया।
दुनिया के दूसरे देशों में क्या स्थिति है?
सरकार ने यह भी बताया कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल केवल भारत में ही नहीं, बल्कि कई बड़े देशों में वर्षों से इस्तेमाल हो रहा है।
अमेरिका में E10 मानक ईंधन है और E15 का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वहां बड़ी संख्या में Flex Fuel वाहन E85 तक के मिश्रण पर भी चल सकते हैं।
ब्राजील दुनिया में एथेनॉल उपयोग का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। वहां फिलहाल लगभग E27 मिश्रण सामान्य पेट्रोल है और इसे आगे बढ़ाकर करीब 35% तक ले जाने की तैयारी चल रही है। देश में बिकने वाली अधिकांश नई कारें Flex Fuel तकनीक वाली हैं।
इसके अलावा जापान, कनाडा, थाईलैंड और कई यूरोपीय देशों ने भी अपनी स्वच्छ ईंधन (Clean Fuel) नीति के तहत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को अपनाया है।
एथेनॉल ब्लेंडिंग के पीछे सरकार की सोच
सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग को केवल पर्यावरण संरक्षण की योजना नहीं मानती, बल्कि इसे ऊर्जा सुरक्षा और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है।
भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ने से कच्चे तेल के आयात में कमी आ सकती है। इसके अलावा एथेनॉल का कार्बन उत्सर्जन पेट्रोल की तुलना में कम होता है, जिससे प्रदूषण घटाने में भी मदद मिलती है।
सरकार का कहना है कि इससे गन्ना, मक्का और अन्य कृषि फसलों की मांग बढ़ेगी, जिससे किसानों को भी अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा।
E25 लागू करने से पहले सबसे बड़ी चुनौती
सरकार ने भले ही E25 की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी शुरू कर दी हो, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती मौजूदा वाहन इकोसिस्टम को इसके लिए तैयार करना है। E20 तक का सफर अपेक्षाकृत तेजी से पूरा हुआ, लेकिन E25 के मामले में सरकार और ऑटोमोबाइल उद्योग दोनों जल्दबाजी से बचना चाहते हैं।
वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि E25 लागू करने से पहले इंजनों की नई कैलिब्रेशन, फ्यूल सिस्टम की मजबूती, जंग से सुरक्षा, नई सामग्री (Material Compatibility) और पूरी वैधता जांच (Homologation) पूरी करनी होगी। यह प्रक्रिया समय लेने वाली है और इसे जल्दबाजी में पूरा नहीं किया जा सकता।
पुराने वाहनों पर सबसे ज्यादा असर
E20 लागू होने के बाद सबसे ज्यादा शिकायतें पुराने वाहनों के मालिकों से आई थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने इंजन E10 को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। इसलिए उनमें एथेनॉल की मात्रा बढ़ने पर प्रदर्शन में बदलाव देखने को मिल सकता है।
एथेनॉल का ऊष्मीय मान (Calorific Value) पेट्रोल से कम होता है। इसका मतलब है कि समान दूरी तय करने के लिए इंजन को अधिक ईंधन की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे माइलेज में कमी महसूस हो सकती है।
इसके अलावा एथेनॉल वातावरण से नमी आसानी से सोख लेता है। लंबे समय तक अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन का उपयोग करने पर पुराने वाहनों के कुछ धातु और रबर के पुर्जों पर असर पड़ने की आशंका जताई जाती है। इसी वजह से वाहन कंपनियां चाहती हैं कि E25 लागू करने से पहले सभी तकनीकी परीक्षण पूरे किए जाएं।
नए इंजनों पर कंपनियां कर रही हैं काम
ऑटोमोबाइल कंपनियां अब ऐसे इंजन विकसित कर रही हैं जो अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर बेहतर प्रदर्शन कर सकें। कई कंपनियां उच्च Compression Ratio वाले इंजन विकसित करने पर काम कर रही हैं, ताकि E25 जैसे ईंधन से भी बेहतर माइलेज और प्रदर्शन मिल सके।
हालांकि यह तकनीक भविष्य के वाहनों के लिए तैयार की जा रही है। वर्तमान में सड़कों पर चल रहे करोड़ों वाहनों को देखते हुए सरकार E25 को धीरे-धीरे लागू करने की रणनीति पर विचार कर रही है।
एथेनॉल ब्लेंडिंग के फायदे
एथेनॉल ब्लेंडिंग के कई महत्वपूर्ण लाभ भी हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे पेट्रोल में जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) की हिस्सेदारी कम होती है, जिससे कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता घट सकती है।
एथेनॉल में कार्बन की मात्रा पेट्रोल की तुलना में कम होती है। इसलिए अधिक एथेनॉल मिश्रण से कार्बन उत्सर्जन कम करने और पर्यावरण संरक्षण में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा एथेनॉल का ऑक्टेन नंबर (Octane Number) पेट्रोल से अधिक होता है। इससे नए और आधुनिक इंजनों में बेहतर दहन (Combustion) संभव होता है।
सरकार का मानना है कि एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी, जिससे किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
चुनौतियां भी कम नहीं
एथेनॉल ब्लेंडिंग के फायदे जितने महत्वपूर्ण हैं, चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। सबसे पहले पूरे वाहन उद्योग को नई तकनीक के अनुरूप तैयार करना होगा। इसके अलावा पूरे देश में ईंधन वितरण नेटवर्क, परीक्षण व्यवस्था और गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली को भी मजबूत करना होगा।
सरकार यह भी चाहती है कि उपभोक्ताओं के बीच फैली आशंकाओं का वैज्ञानिक आधार पर समाधान किया जाए। इसलिए E25 लागू करने से पहले व्यापक परीक्षण और सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जाएगी।
सरकार की आगे की रणनीति
सरकार ने स्पष्ट किया है कि E25 को लेकर अभी कोई आधिकारिक समयसीमा तय नहीं की गई है। फिलहाल प्राथमिकता E20 कार्यक्रम को पूरी तरह स्थिर करना और उससे जुड़े अनुभवों का मूल्यांकन करना है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार E25 का विस्तार चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा। पहले वाहन उद्योग, तेल कंपनियों और अन्य संबंधित क्षेत्रों को पर्याप्त समय दिया जाएगा। इसके बाद परीक्षणों और आवश्यक तैयारियों के आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा।
यानी सरकार इस बार E20 जैसी तेज रफ्तार के बजाय संतुलित और चरणबद्ध रणनीति अपनाना चाहती है।
निष्कर्ष
भारत की ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जैव ईंधन (Biofuel) कार्यक्रम का अगला महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है। हालांकि E20 लागू होने के बाद सामने आए अनुभवों ने सरकार को यह एहसास कराया है कि केवल लक्ष्य जल्दी हासिल करना पर्याप्त नहीं है। उपभोक्ताओं की संतुष्टि, वाहन उद्योग की तैयारी और तकनीकी परीक्षण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि फिलहाल सरकार E25 को लेकर जल्दबाजी करने के बजाय संतुलित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की तैयारी में है।
FAQs:
E25 ऐसा पेट्रोल है जिसमें 75% पेट्रोल और 25% एथेनॉल मिलाया जाता है। यह E20 के बाद एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का अगला चरण माना जा रहा है।
E20 लागू होने के बाद वाहन मालिकों की शिकायतें, ऑटो कंपनियों की तकनीकी चिंताएं और पूरे इकोसिस्टम को तैयार करने की जरूरत को देखते हुए सरकार E25 को चरणबद्ध तरीके से लागू करना चाहती है।
इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होती है, कार्बन उत्सर्जन घटता है, किसानों को लाभ मिल सकता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है।
E20 में 20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है, जबकि E25 में 25% एथेनॉल और 75% पेट्रोल होता है।
फिलहाल सरकार ने E25 की कीमतों को लेकर कोई अलग घोषणा नहीं की है। कीमतें भविष्य की नीतियों और बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी।
एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से गन्ना, मक्का और अन्य फसलों की मांग बढ़ सकती है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि की संभावना है।
यह केंद्र सरकार का जैव ईंधन कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना है।
सरकार ने अभी E25 लागू करने की कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की है। फिलहाल इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने पर विचार किया जा रहा है।
नहीं। विशेष रूप से पुराने वाहनों के लिए अतिरिक्त तकनीकी परीक्षण और वाहन कंपनियों द्वारा आवश्यक बदलाव किए जाने की जरूरत हो सकती है। इसलिए सरकार जल्दबाजी से बच रही है।

