भारतीय सेना के आधुनिकीकरण को लेकर संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee – PAC) ने गंभीर चिंता जताई है। Obsolete Guns को लेकर जारी अपनी रिपोर्ट में समिति ने कहा कि नई तोपों की खरीद में लगभग 20 वर्षों की देरी के कारण भारतीय सेना लंबे समय तक पुराने हथियारों पर निर्भर रही। समिति के अनुसार इससे सेना की मारक क्षमता (Firepower) और ऑपरेशनल तैयारियों (Operational Preparedness) पर नकारात्मक असर पड़ा।
संसद की समिति ने क्या कहा?
लोकसभा की 18वीं लोकसभा (2026-27) की 49वीं रिपोर्ट में PAC ने रक्षा मंत्रालय (MoD) की रक्षा खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। समिति के अनुसार, नई आर्टिलरी गन सिस्टम की खरीद और सेना में शामिल करने में दो दशक लग गए। इस देरी के कारण सेना के तोपखाने में बड़ी कमी (Capability Gap) पैदा हुई और आधुनिक हथियार समय पर उपलब्ध नहीं हो सके। PAC ने सिफारिश की है कि रक्षा मंत्रालय समय-समय पर सेना की क्षमताओं की समीक्षा करे और बदलती सुरक्षा चुनौतियों के अनुसार जरूरी सैन्य उपकरणों की खरीद समय पर सुनिश्चित करे।

आखिर क्यों नहीं मिल सकीं नई तोपें?
भारतीय सेना ने वर्ष 1986 में 155 मिमी/39 कैलिबर बोफोर्स तोपें तकनीकी हस्तांतरण (Transfer of Technology) समझौते के तहत खरीदी थीं। हालांकि 1989 में मूल निर्माता (OEM) पर प्रतिबंध लगने के बाद नई और अधिक क्षमता वाली तोपों की खरीद की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन 1990 के दशक में जारी वैश्विक निविदाएं (Global Tenders) सफल नहीं हो सकीं।
रिपोर्ट के अनुसार इसके पीछे कई कारण रहे–
- परिचालन आवश्यकताओं (Operational Requirements) को अंतिम रूप देने में देरी।
- वैश्विक कंपनियों की सीमित भागीदारी।
- रक्षा खरीद प्रक्रिया में लंबा समय।
- निर्णय लेने में विलंब।
इन्हीं कारणों से सेना को वर्षों तक Obsolete Guns के साथ काम करना पड़ा।
धनुष तोप परियोजना में भी सामने आईं बड़ी खामियां
PAC ने स्वदेशी धनुष आर्टिलरी गन परियोजना पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि परियोजना कई बार तय समयसीमा से पीछे रही। इसके पीछे प्रमुख कारण थे–
- पर्याप्त उत्पादन अवसंरचना (Infrastructure) का अभाव।
- उत्पादन प्रक्रिया में लगातार बदलाव।
- बैलिस्टिक्स, गन इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस साइटिंग सिस्टम जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की कमी।
- तकनीकी दक्षता का अभाव।
समिति ने रक्षा मंत्रालय के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि देरी इसलिए हुई क्योंकि भारत में पहली बार इस तरह की तोप बनाई जा रही थी। PAC का कहना है कि इन चुनौतियों की पहचान परियोजना शुरू होने से पहले ही कर ली जानी चाहिए थी।
रिपोर्ट में क्या सुधार सुझाए गए हैं?
संसदीय समिति ने रक्षा खरीद और Defence Modernisation को तेज करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। समिति ने कहा कि भविष्य की रक्षा परियोजनाएं शुरू करने से पहले घरेलू उत्पादन क्षमता और आवश्यक अवसंरचना का व्यापक आकलन किया जाए ताकि समय और लागत दोनों की बचत हो सके।
इसके अलावा समिति ने सुझाव दिया कि–
- IIT और अन्य तकनीकी संस्थानों में रक्षा विनिर्माण (Defence Manufacturing) से जुड़े विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं।
- रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों (DPSUs) के कर्मचारियों के लिए नियमित तकनीकी प्रशिक्षण और अपस्किलिंग व्यवस्था बनाई जाए।
- परियोजनाओं की निगरानी के लिए अधिक प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए।
भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के लिए क्यों जरूरी है यह सुधार?
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए Indian Army Modernisation अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। आधुनिक युद्धों में लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगाने वाली तोपें, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और तेज़ प्रतिक्रिया क्षमता किसी भी सेना की ताकत का अहम हिस्सा हैं। यदि हथियारों की खरीद और स्वदेशी निर्माण में इसी तरह देरी होती रही, तो भविष्य में सेना की युद्ध क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए समयबद्ध रक्षा खरीद, आधुनिक तकनीक और मजबूत घरेलू रक्षा उत्पादन व्यवस्था बेहद जरूरी मानी जा रही है।
निष्कर्ष
Obsolete Guns पर संसद की लोक लेखा समिति की रिपोर्ट भारतीय रक्षा खरीद प्रणाली के सामने मौजूद चुनौतियों को उजागर करती है। रिपोर्ट बताती है कि नई तोपों की खरीद में 20 वर्षों की देरी ने भारतीय सेना के आधुनिकीकरण को प्रभावित किया और उसकी मारक क्षमता पर असर डाला। समिति ने रक्षा मंत्रालय से समयबद्ध खरीद प्रक्रिया, बेहतर परियोजना प्रबंधन और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को मजबूत करने की सिफारिश की है, ताकि भविष्य में भारतीय सेना आधुनिक हथियारों से लैस होकर बदलती सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।
FAQs:
लोक लेखा समिति (PAC) ने भारतीय सेना की पुरानी आर्टिलरी यानी Obsolete Guns पर चिंता जताई है और कहा है कि नई तोपों की खरीद में 20 वर्षों की देरी हुई।
रिपोर्ट के अनुसार रक्षा खरीद प्रक्रिया में देरी, वैश्विक निविदाओं की विफलता, तकनीकी चुनौतियों और परियोजनाओं के समय पर पूरा न होने के कारण सेना लंबे समय तक पुराने हथियारों पर निर्भर रही।
समिति ने कहा कि दो दशक की देरी के कारण सेना की मारक क्षमता में बड़ी कमी आई और उसकी ऑपरेशनल तैयारियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार परिचालन आवश्यकताओं को अंतिम रूप देने में देरी, उत्पादन अवसंरचना की कमी, तकनीकी विशेषज्ञों का अभाव और रक्षा खरीद प्रक्रिया की धीमी गति प्रमुख कारण रहे।
रिपोर्ट में किसी विशेष नई तोप प्रणाली का नाम नहीं दिया गया है, लेकिन आधुनिक आर्टिलरी सिस्टम, स्वदेशी रक्षा निर्माण और समयबद्ध सैन्य उपकरणों की खरीद पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार रक्षा मंत्रालय ने धनुष परियोजना में देरी को स्वदेशी उत्पादन की तकनीकी चुनौतियों से जोड़ा, लेकिन PAC ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना और बेहतर योजना एवं निगरानी की आवश्यकता बताई।

