Karim Khan ICC : अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (International Criminal Court-ICC) ने अपने मुख्य अभियोजक करीम खान को पद से हटा दिया है। हेग स्थित इस अदालत के 125 सदस्य देशों ने भारी बहुमत से उनके खिलाफ मतदान करते हुए उन्हें पद से हटाने का फैसला लिया। ICC ने कहा कि करीम खान ने “गंभीर दुराचार (Serious Misconduct) और अपने कर्तव्यों का गंभीर उल्लंघन (Serious Breach of Duty)” किया है।
करीब दो साल पहले सामने आए यौन दुराचार के आरोपों के बाद यह मामला लगातार जांच के दायरे में था। दूसरी ओर, इसी दौरान अमेरिका भी ICC के खिलाफ लगातार आक्रामक रुख अपनाता रहा। ऐसे में करीम खान को हटाए जाने का फैसला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे ICC की साख, उसकी जवाबदेही और उस पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

यौन दुराचार के आरोपों से शुरू हुआ पूरा विवाद
56 वर्षीय ब्रिटिश बैरिस्टर करीम खान पर आरोप है कि उन्होंने ICC में काम करने वाली एक जूनियर महिला सहयोगी के साथ अनुचित यौन संबंध बनाए। आरोप लगाने वाली महिला का कहना है कि यह संबंध उसकी सहमति से नहीं था और बाद में उस पर शिकायत आगे नहीं बढ़ाने का भी दबाव बनाया गया।

Associated Press द्वारा देखे गए दस्तावेजों के अनुसार, आरोपों में यह भी कहा गया कि करीम खान ने अपने पद का प्रभाव इस्तेमाल करते हुए मामले को दबाने की कोशिश की।
हालांकि करीम खान ने शुरुआत से ही सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने किसी भी प्रकार का यौन दुराचार नहीं किया और आरोप निराधार हैं।
हाल ही में आरोप लगाने वाली महिला ने CNN को दिए एक साक्षात्कार में पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी बात दोहराई। दूसरी ओर, करीम खान के वकीलों ने रॉयटर्स से कहा कि उनके मुवक्किल का महिला सहयोगी के साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध नहीं था।
ICC ने आखिर क्यों हटाया?
करीम खान के खिलाफ लगे आरोपों की समीक्षा ICC की सर्वोच्च प्रशासनिक संस्था ‘असेंबली ऑफ स्टेट्स पार्टीज़ (Assembly of States Parties-ASP)’ ने की। इसी संस्था में ICC के सभी 125 सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व होता है।
हाल ही में अदालत की संचालन समिति (Executive Bureau) से जुड़े राजनयिकों ने सिफारिश की थी कि करीम खान ने अपने पद की गरिमा के अनुरूप आचरण नहीं किया और उन्हें पद से हटा दिया जाना चाहिए।
शुक्रवार को हुई बैठक में 125 सदस्य देशों में से 82 देशों ने उनके खिलाफ मतदान किया। इसके बाद ASP की अध्यक्ष पैवी काउकोरांता ने घोषणा की कि करीम खान “गंभीर दुराचार और अपने कर्तव्यों के गंभीर उल्लंघन” के दोषी पाए गए हैं, इसलिए उन्हें तत्काल प्रभाव से मुख्य अभियोजक के पद से हटाया जाता है।
इस फैसले के साथ ही नए मुख्य अभियोजक के चुनाव की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। हालांकि नए अभियोजक का चुनाव अगले वर्ष से पहले होने की संभावना कम है।
करीम खान ने फैसले को क्यों बताया अनुचित?
करीम खान ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से एक बार फिर इनकार किया है। उनके वकील तैयब अली ने कहा कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया और सदस्य देशों ने पूरा पक्ष सुने बिना मतदान कर दिया।
उनके अनुसार, स्वतंत्र न्यायाधीशों ने उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा की थी, लेकिन उनके निष्कर्षों को नजरअंदाज करते हुए यह फैसला लिया गया।
करीम खान की कानूनी टीम ने साफ कर दिया है कि वे इस फैसले को सभी उपलब्ध कानूनी माध्यमों से चुनौती देंगे।
मानवाधिकार संगठनों ने फैसले का स्वागत क्यों किया?
ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) ने ICC के फैसले का स्वागत किया है। संगठन की अंतरराष्ट्रीय न्याय निदेशक लिज़ एवेंसन ने कहा कि यदि ICC दुनिया भर में गंभीर अपराधों पर न्याय सुनिश्चित करने का दावा करता है, तो उसे अपने भीतर भी जवाबदेही के सबसे ऊंचे मानक अपनाने होंगे।
उन्होंने कहा कि अदालत में ऐसा कार्यस्थल होना चाहिए जहां यौन उत्पीड़न या किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार की शिकायत करने वालों को सुरक्षित और विश्वसनीय व्यवस्था मिल सके।
कई अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों ने भी माना कि यह फैसला अदालत की संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी था। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि केवल नेतृत्व बदलने से ICC की सभी चुनौतियां खत्म नहीं होंगी।
वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी की अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून विशेषज्ञ प्रोफेसर लीला सादात ने कहा कि अदालत ने एक विवादित अधिकारी को हटाकर यह संदेश दिया है कि वह जवाबदेही से पीछे नहीं हटेगी। वहीं यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर काइरा विगार्ड का मानना है कि अब ICC के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी स्वतंत्रता और विश्वसनीयता को बनाए रखना होगी।
अमेरिका ने फैसले का स्वागत क्यों किया?
करीम खान को हटाए जाने का फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका ICC के खिलाफ अपना अभियान और तेज कर चुका है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका ICC को अपनी संप्रभुता के लिए खतरा मानता है और उसके खिलाफ व्यापक कूटनीतिक अभियान चलाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वॉशिंगटन दूसरे देशों को ICC से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करेगा, अदालत के साथ काम करने वाले संगठनों पर प्रतिबंध लगाएगा और ICC अधिकारियों पर यात्रा प्रतिबंध भी लगाएगा।
करीम खान को हटाए जाने के बाद अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने फैसले का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही कहा कि केवल एक अधिकारी को हटाने से संस्था नहीं बदल जाती। उनके शब्दों में, “करीम खान इस अपूरणीय रूप से भ्रष्ट संस्था का केवल एक छोटा हिस्सा थे।”
अमेरिका ने स्पष्ट किया कि ICC को कमजोर करने की उसकी नीति आगे भी जारी रहेगी।
ICC और अमेरिका के बीच टकराव क्यों बढ़ा?
करीम खान के कार्यकाल के दौरान ICC ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व रक्षा मंत्री योआव गैलेंट के खिलाफ गाजा युद्ध से जुड़े मामलों में गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। इसके अलावा अदालत ने पहले अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों से जुड़े कथित युद्ध अपराधों की भी जांच की थी।
इन्हीं मामलों को लेकर अमेरिका लंबे समय से ICC का विरोध करता रहा है। अमेरिका ICC का सदस्य भी नहीं है और उसका कहना है कि अदालत को अमेरिकी अधिकारियों या सैनिकों पर अधिकार नहीं होना चाहिए।
इसी विवाद के बीच अमेरिका पहले ही करीम खान समेत कई ICC न्यायाधीशों और अभियोजकों पर प्रतिबंध लगा चुका है। अब करीम खान को हटाए जाने के बाद भी वॉशिंगटन ने साफ कर दिया है कि उसका ICC विरोधी अभियान जारी रहेगा।
अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) आखिर क्या है?
करीम खान को हटाए जाने के बाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (International Criminal Court-ICC) चर्चा में है। ICC दुनिया की पहली स्थायी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत है, जिसकी स्थापना नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और आक्रमण जैसे सबसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर मुकदमा चलाने के उद्देश्य से की गई थी।

इस अदालत का मुख्यालय नीदरलैंड्स के हेग (The Hague) में स्थित है। इसका संचालन रोम संविधि (Rome Statute) के तहत होता है, जिसे 17 जुलाई 1998 को अपनाया गया था और 1 जुलाई 2002 से यह प्रभावी हुआ। इसी दिन से ICC ने औपचारिक रूप से काम शुरू किया।
ICC राज्यों पर नहीं बल्कि व्यक्तियों पर मुकदमा चलाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी देश की न्यायिक व्यवस्था गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने में असमर्थ या अनिच्छुक हो, तो ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
किन अपराधों की सुनवाई करता है ICC?
रोम संविधि के अनुसार ICC केवल चार प्रकार के सबसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों की सुनवाई करता है। इनमें नरसंहार (Genocide), मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes Against Humanity), युद्ध अपराध (War Crimes) और आक्रमण का अपराध (Crime of Aggression) शामिल हैं।
नरसंहार में किसी जातीय, धार्मिक या राष्ट्रीय समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से समाप्त करने के उद्देश्य से किए गए अपराध आते हैं। मानवता के खिलाफ अपराधों में बड़े पैमाने पर नागरिकों के खिलाफ हत्या, यातना, बलात्कार, जबरन विस्थापन और अन्य अमानवीय कृत्य शामिल होते हैं। युद्ध अपराध सशस्त्र संघर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन से जुड़े होते हैं, जबकि आक्रमण का अपराध किसी देश द्वारा दूसरे देश के खिलाफ अवैध सैन्य बल के प्रयोग से संबंधित होता है।
ICC का अधिकार क्षेत्र कैसे तय होता है?
ICC केवल उन्हीं अपराधों की सुनवाई करता है जो 1 जुलाई 2002 के बाद किए गए हों। इसके अधिकार क्षेत्र का आधार रोम संविधि है।
आमतौर पर अदालत उन मामलों की जांच करती है जो किसी सदस्य देश के क्षेत्र में हुए हों या जिनमें आरोपी किसी सदस्य देश का नागरिक हो। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) किसी गैर-सदस्य देश से जुड़े मामले को भी ICC के पास भेज सकती है।
हालांकि ICC तभी हस्तक्षेप करता है, जब संबंधित देश स्वयं निष्पक्ष जांच या मुकदमा चलाने में असमर्थ हो या ऐसा करने की इच्छा न रखता हो। इसे Complementarity Principle कहा जाता है।
ICC के सदस्य कौन हैं और भारत इसका हिस्सा क्यों नहीं है?
वर्तमान में रोम संविधि की पुष्टि 125 देशों ने की है। इनमें ब्रिटेन और अधिकांश यूरोपीय देश शामिल हैं। 30 से अधिक देशों ने इस पर हस्ताक्षर तो किए हैं, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि (Ratification) नहीं की है।
अफगानिस्तान 2003 से ICC का सदस्य है। वहीं भारत, अमेरिका, चीन और इजरायल जैसे देश ICC के सदस्य नहीं हैं।
भारत का मानना है कि ICC की मौजूदा व्यवस्था में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो उसकी संप्रभुता से जुड़े सवाल खड़े करते हैं। नई दिल्ली विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को प्राप्त रेफरल शक्तियों और अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर लंबे समय से अपनी आपत्तियां दर्ज कराती रही है। यही कारण है कि भारत ने रोम संविधि पर हस्ताक्षर नहीं किए और वह ICC का सदस्य नहीं बना।
ICC का ढांचा कैसे काम करता है?
ICC के चार प्रमुख अंग हैं। इनमें प्रेसीडेंसी (Presidency), न्यायिक प्रभाग (Judicial Divisions), अभियोजक का कार्यालय (Office of the Prosecutor) और रजिस्ट्री (Registry) शामिल हैं।
इनके अलावा असेंबली ऑफ स्टेट्स पार्टीज़ (Assembly of States Parties-ASP) अदालत की सर्वोच्च प्रशासनिक संस्था है। इसमें सभी सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। यही संस्था अदालत के प्रशासन, बजट, नीतियों और शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति तथा आवश्यक होने पर उनके खिलाफ कार्रवाई जैसे फैसले लेती है।
करीम खान को हटाने का फैसला भी इसी संस्था ने मतदान के जरिए लिया।
क्या ICC के पास अपनी पुलिस है?
ICC के पास अपनी कोई पुलिस, सेना या प्रवर्तन एजेंसी नहीं है। अदालत गिरफ्तारी करने या अपने फैसलों को लागू कराने के लिए पूरी तरह सदस्य देशों के सहयोग पर निर्भर रहती है।
यदि ICC किसी आरोपी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करता है, तो उसे गिरफ्तार करना संबंधित सदस्य देश की जिम्मेदारी होती है। इसी तरह संपत्तियां जब्त करना, आरोपियों को अदालत तक पहुंचाना और सजा लागू करना भी सदस्य देशों के सहयोग से ही संभव होता है।
यही कारण है कि कई बार गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी लंबे समय तक गिरफ्तारी से बच जाते हैं।

ICC और ICJ में क्या अंतर है?
अक्सर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) को एक ही संस्था समझ लिया जाता है, जबकि दोनों की भूमिका पूरी तरह अलग है।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की स्थापना 1945 में हुई थी और यह संयुक्त राष्ट्र (UN) का सर्वोच्च न्यायिक अंग है। यह देशों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करता है और कानूनी प्रश्नों पर सलाहकारी राय देता है। इसके अधिकार क्षेत्र में केवल देश आते हैं, व्यक्ति नहीं।
दूसरी ओर, ICC की स्थापना 2002 में हुई थी और यह संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा नहीं है। इसका गठन रोम संविधि के तहत हुआ है। यह अदालत केवल व्यक्तियों पर मुकदमा चलाती है और नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध तथा आक्रमण जैसे मामलों की सुनवाई करती है।
ICJ के फैसलों को लागू कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, जबकि ICC अपने आदेशों के क्रियान्वयन के लिए सदस्य देशों के सहयोग पर निर्भर करता है। ICJ में अपील की व्यवस्था नहीं है, जबकि ICC में अपील का प्रावधान मौजूद है।

करीम खान को हटाने का ICC पर क्या असर पड़ेगा?
करीम खान को हटाना ICC के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक घटनाओं में से एक माना जा रहा है। इससे अदालत ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसके सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगने पर कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ICC की सबसे बड़ी चुनौती अब अपनी संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखना होगी। एक ओर उसे अपने भीतर जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी, वहीं दूसरी ओर अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों के बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच अपनी स्वतंत्रता भी कायम रखनी होगी।
अमेरिका पहले ही साफ कर चुका है कि करीम खान के हटने के बावजूद उसका ICC विरोधी अभियान जारी रहेगा। ऐसे में नए मुख्य अभियोजक के सामने केवल लंबित मामलों को आगे बढ़ाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि अदालत की निष्पक्षता और वैश्विक भरोसे को मजबूत करना भी बड़ी जिम्मेदारी होगी।
FAQ
- ICC ने करीम खान को क्यों हटाया?
ICC के सदस्य देशों ने उन्हें गंभीर दुराचार और कर्तव्य के गंभीर उल्लंघन का दोषी मानते हुए पद से हटा दिया। उनके खिलाफ एक महिला सहयोगी के साथ कथित यौन दुराचार के आरोप लगे थे, जिन्हें उन्होंने लगातार खारिज किया है। - ICC क्या है?
ICC दुनिया की पहली स्थायी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत है, जो नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ अपराध और आक्रमण जैसे गंभीर अपराधों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर मुकदमा चलाती है। - क्या भारत ICC का सदस्य है?
नहीं। भारत ने रोम संविधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत ने संप्रभुता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से जुड़े कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। - ICC और ICJ में क्या अंतर है?
ICJ देशों के बीच कानूनी विवादों की सुनवाई करता है, जबकि ICC गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के आरोपी व्यक्तियों पर मुकदमा चलाता है। - क्या ICC के पास अपनी पुलिस है?
नहीं। ICC के पास कोई पुलिस या प्रवर्तन एजेंसी नहीं है। वह अपने आदेशों को लागू कराने के लिए सदस्य देशों के सहयोग पर निर्भर करता है। - करीम खान के हटने के बाद आगे क्या होगा?
ICC अब नए मुख्य अभियोजक के चुनाव की प्रक्रिया शुरू करेगा। तब तक अदालत का काम उसके मौजूदा संस्थागत ढांचे के तहत जारी रहेगा।

