Jaishankar Iran Araghchi Talks: पश्चिम एशिया से लेकर काला सागर तक… भारत की दो टूक, क्या जयशंकर की इस कूटनीति से सुरक्षित लौटेंगे हमारे नाविक?

Jaishankar Iran Araghchi Talks

Jaishankar Iran Araghchi Talks : पश्चिम एशिया (West Asia) में तेजी से बिगड़ते हालात के बीच भारत ने एक बार फिर कूटनीतिक स्तर पर सक्रियता दिखाई है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) ने शुक्रवार को ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची (Seyed Abbas Araghchi) से टेलीफोन पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र में जारी सैन्य संघर्ष पर भारत की गहरी चिंता जताई और साफ कहा कि किसी भी परिस्थिति में व्यावसायिक जहाजों (Commercial Shipping) और समुद्री नाविकों (Seafarers) को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। भारत ने दोहराया कि वह किसी भी पक्ष द्वारा जहाजों पर किए जाने वाले हमलों की निंदा करता है और मौजूदा संकट का समाधान केवल बातचीत और कूटनीति से ही संभव है।

यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। दूसरी ओर, समुद्री मार्गों पर बढ़ते हमलों से भारतीय नाविकों की सुरक्षा और भारत के ऊर्जा आयात पर भी खतरा बढ़ गया है।

भारत ने ईरान से क्या कहा?

जयशंकर ने बातचीत के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अराघची से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर विस्तार से चर्चा की।

समुद्री सुरक्षा को लेकर भारत इतना चिंतित क्यों है?

भारत का पश्चिम एशिया से गहरा आर्थिक और रणनीतिक संबंध है। देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा होता है। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के अधिकांश जहाज फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ (Strait of Hormuz) से होकर भारत पहुंचते हैं।

यही कारण है कि यदि इस समुद्री मार्ग पर हमले बढ़ते हैं तो उसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आयात-निर्यात और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है।

इसके अलावा हजारों भारतीय नाविक दुनिया भर के व्यापारिक जहाजों पर कार्यरत हैं। हाल के महीनों में कई जहाज ड्रोन और मिसाइल हमलों की चपेट में आए हैं। ऐसे में भारत के लिए यह केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि मानवीय मुद्दा भी बन गया है।

 

अमेरिका-ईरान तनाव कैसे बढ़ा?

जयशंकर और अराघची की बातचीत ऐसे समय हुई जब अमेरिका ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की।

अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार ईरान ने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला करने की कोशिश की थी। अमेरिकी वायु रक्षा प्रणाली ने इन मिसाइलों को बीच में ही रोक दिया।

इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी प्रतिक्रिया देने का फैसला किया और अमेरिका ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े कई ठिकानों पर जवाबी हवाई हमले किए।

CENTCOM ने हमलों की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की, लेकिन ईरान की सरकारी मीडिया के अनुसार होरमुज़गान और खुज़ेस्तान प्रांतों में कई विस्फोट हुए। फारस की खाड़ी के कुछ द्वीपों और तेल प्रतिष्ठानों के आसपास भी हमलों की खबरें सामने आईं।

 

समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए अमेरिका ने क्या कदम उठाए?

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने समुद्री सुरक्षा को लेकर भी अहम जानकारी दी।

CENTCOM के मुताबिक 30 जुलाई तक अमेरिकी सेना ने 24 व्यापारिक जहाजों का मार्ग बदला, 2 जहाजों को रोका और 2 जहाजों पर चढ़कर जांच (Boarding Operation) की, ताकि समुद्री यातायात सुरक्षित रखा जा सके।

अमेरिका का कहना है कि पूरे क्षेत्र में उसकी नौसैनिक और निगरानी गतिविधियां लगातार जारी हैं, जिससे किसी भी संभावित हमले को रोका जा सके।

 

मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत ने क्यों बढ़ाई कूटनीतिक सक्रियता?

जयशंकर की यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका ने हाल ही में ईरान के खिलाफ बड़े हवाई हमले किए हैं। ये हमले उस घटना के बाद हुए, जब ईरान ने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार अधिकांश मिसाइलों को एयर डिफेंस सिस्टम ने रोक दिया, जिसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बताया कि उसने क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ा दी है। 30 जुलाई तक उसकी सेना ने 24 वाणिज्यिक जहाजों का मार्ग बदला, दो जहाजों को निष्क्रिय किया और दो जहाजों पर चढ़कर सुरक्षा संबंधी जांच की। इसका उद्देश्य व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना बताया गया।

ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक अमेरिकी हमलों के दौरान होरमुजगान (Hormozgan) और खुज़ेस्तान (Khuzestan) सहित दक्षिणी प्रांतों में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। फारस की खाड़ी के कुछ द्वीपों और तेल प्रतिष्ठानों के आसपास भी हमले होने की खबरें सामने आईं।

 

भारत ने यूक्रेन से भी जहाजों पर हमले रोकने की मांग की थी

ईरान के विदेश मंत्री से बातचीत से ठीक एक दिन पहले जयशंकर ने यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा (Andrii Sybiha) से भी इसी मुद्दे पर चर्चा की थी। उन्होंने साफ कहा था कि किसी भी पक्ष द्वारा व्यापारिक जहाजों और नाविकों पर हमला पूरी तरह अस्वीकार्य है और भारत इसकी स्पष्ट शब्दों में निंदा करता है।

यह बातचीत उस घटना के बाद हुई थी, जिसमें व्यापारी जहाज MV Omorfi पर कथित यूक्रेनी ड्रोन हमले में एक भारतीय नाविक की मौत हो गई थी। विदेश मंत्रालय के अनुसार रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान अब तक पांच भारतीय नाविकों की मौत हो चुकी है, जबकि दो अब भी लापता हैं।

भारत ने यूक्रेन के साथ बातचीत में भी दोहराया कि रूस-यूक्रेन युद्ध का समाधान केवल बातचीत और कूटनीति के जरिए ही संभव है।

 

मिडिल ईस्ट संघर्ष में अब तक कितने भारतीय प्रभावित हुए?

सरकार ने हाल ही में संसद में जानकारी दी कि फरवरी 2026 से शुरू हुए पश्चिम एशिया संकट के दौरान अब तक 16 भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है। इनमें 10 भारतीय नाविक भी शामिल हैं।

विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह के अनुसार एक भारतीय की मौत सऊदी अरब, दो की कुवैत, आठ की ओमान, एक की इराक और चार की संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में हुई। इसके अलावा 75 भारतीय घायल हुए हैं। इनमें सबसे अधिक 32 लोग UAE, 24 ओमान, 13 कुवैत, चार कतर तथा एक-एक सऊदी अरब और इजरायल में घायल हुए।

सरकार ने यह भी बताया कि कतर के रास लाफान गैस संयंत्र (Ras Laffan Gas Facility) में एक अलग दुर्घटना में 12 भारतीय नागरिकों की जान गई थी। यह घटना क्षेत्रीय संघर्ष से जुड़ी नहीं थी।

 

ईरान से अब तक कितने भारतीयों को निकाला गया?

विदेश मंत्रालय ने संसद को बताया कि संघर्ष शुरू होने के बाद भारतीय दूतावास ने 2,557 भारतीय नागरिकों को ईरान से सुरक्षित बाहर निकालने में मदद की। इन लोगों को पहले आर्मेनिया और अजरबैजान भेजा गया, जहां से उनकी भारत वापसी कराई गई।

सरकार के अनुमान के अनुसार फिलहाल भी लगभग 7,000 भारतीय नागरिक ईरान में मौजूद हैं। इनमें मेडिकल छात्र, धार्मिक शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र, कामगार, नाविक और मछुआरे शामिल हैं।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि ईरान से लौटे भारतीय मेडिकल छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई है और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। साथ ही भारतीय नागरिकों को फिलहाल ईरान की गैर-जरूरी यात्रा टालने की सलाह भी दी गई है।

 

भारत के लिए समुद्री सुरक्षा इतनी अहम क्यों है?

भारत के कुल विदेशी व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री मार्गों से होता है। फारस की खाड़ी और होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भी इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर है।

यही कारण है कि व्यापारिक जहाजों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं में शामिल है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत लगातार सभी पक्षों से संयम बरतने, जहाजों पर हमले रोकने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहा है।

 

FAQs

  1. एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री से क्या चर्चा की?
    उन्होंने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, व्यापारिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा तथा संवाद के जरिए समाधान पर चर्चा की।
  2. भारत ने जहाजों और नाविकों पर हमलों की निंदा क्यों की?
    क्योंकि इन हमलों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार, भारतीय नाविकों की सुरक्षा और वैश्विक समुद्री परिवहन प्रभावित हो रहा है।
  3. इस बातचीत में किन मुद्दों पर जोर दिया गया?
    पश्चिम एशिया की स्थिति, समुद्री सुरक्षा, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया गया।
  4. भारत के लिए समुद्री सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
    भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार समुद्री मार्गों से होता है और ऊर्जा आपूर्ति भी बड़े पैमाने पर इसी क्षेत्र से जुड़ी है।
  5. भारत-ईरान संबंधों पर इस बातचीत का क्या प्रभाव पड़ेगा?
    यह बातचीत दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने और संकट के दौरान सहयोग मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
  6. क्या स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ का मुद्दा भी चर्चा में शामिल था?
    प्रत्यक्ष रूप से इसका उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षित आवाजाही पर भारत की चिंता उसी व्यापक संदर्भ से जुड़ी हुई है।