आर्कटिक और अंटार्कटिक में दबदबा बढ़ाने वाला है भारत, क्या जल्द नियुक्त होगा देश का पहला ‘Polar Ambassador’? 

Polar Ambassador

India Need Polar Ambassador : भारत अपनी विदेश नीति में ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Regions) की अहमियत बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति ने केंद्र सरकार से ‘Polar Ambassador’ नियुक्त करने पर विचार करने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि ऐसा पद बनने से आर्कटिक (Arctic) और अंटार्कटिक (Antarctic) क्षेत्रों में भारत की रणनीतिक, वैज्ञानिक और कूटनीतिक मौजूदगी को नई दिशा मिलेगी।

कांग्रेस नेता शशि थरूर की अध्यक्षता वाली समिति ने गुरुवार को संसद में अपनी रिपोर्ट “India’s Role and Presence in the Arctic and Antarctic Regions” पेश की। रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया के कई देश पहले ही ध्रुवीय मामलों के लिए विशेष राजदूत नियुक्त कर चुके हैं, ऐसे में भारत को भी इस दिशा में कदम उठाना चाहिए।

Image: शशि थरूर

समिति के अनुसार, Polar Ambassador की नियुक्ति भारत की Polar Diplomacy को मजबूत करेगी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की भूमिका को प्रभावी तरीके से पेश करने में मदद करेगी।

 

ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत की बढ़ती भूमिका के बीच नई पहल

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्र अब केवल वैज्ञानिक शोध तक सीमित नहीं रह गए हैं। बदलते मौसम, समुद्री मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक रणनीति के कारण इन क्षेत्रों का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

भारत पहले से ही इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक अभियानों के जरिए सक्रिय है। हालांकि समिति का मानना है कि भारत की भूमिका को केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे कूटनीतिक स्तर पर भी मजबूत करने की जरूरत है।

रिपोर्ट में कहा गया कि कई देशों ने ध्रुवीय मामलों को संभालने के लिए अलग विभाग और विशेष प्रतिनिधि बनाए हैं। इनमें आर्कटिक परिषद (Arctic Council) के सदस्य देशों के अलावा जापान, चीन, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी शामिल हैं।

 

Polar Ambassador से भारत को मिलेगी कूटनीतिक बढ़त

समिति ने कहा कि Polar Ambassador का पद बनने से भारत अपनी नीतियों और हितों को वैश्विक स्तर पर बेहतर तरीके से रख पाएगा।

इस पद के जरिए भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों पर दूसरे देशों के साथ सहयोग बढ़ा सकेगा। इसमें जलवायु परिवर्तन, समुद्री मार्गों का इस्तेमाल, ऊर्जा सुरक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे विषय शामिल हैं।

समिति ने कहा कि ध्रुवीय क्षेत्रों को लेकर भारत की नीति को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाने के लिए एक समर्पित अधिकारी की जरूरत है, जो अलग-अलग देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ लगातार संवाद कर सके।

आर्कटिक और अंटार्कटिक क्यों बन रहे हैं दुनिया के लिए अहम?

संसदीय समिति के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र आमतौर पर 66 डिग्री उत्तरी अक्षांश (66° North Latitude) के ऊपर का इलाका माना जाता है, जबकि अंटार्कटिक क्षेत्र 60 डिग्री दक्षिणी अक्षांश (60° South Latitude) के नीचे स्थित है।

ये दोनों क्षेत्र पृथ्वी के पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत बर्फ की चादर (Ice Sheet) इन्हीं क्षेत्रों में मौजूद है और यहां पृथ्वी के लगभग 70 प्रतिशत मीठे पानी का भंडार है।

भौगोलिक रूप से दोनों क्षेत्रों में बड़ा अंतर है। आर्कटिक एक समुद्री क्षेत्र है, जिसके चारों तरफ जमीन मौजूद है। वहीं अंटार्कटिका एक विशाल महाद्वीप है, जिसके चारों तरफ समुद्र फैला हुआ है।

 

बर्फ पिघली तो भारत के तटीय इलाकों पर बढ़ेगा खतरा

समिति ने रिपोर्ट में भारत की समुद्री स्थिति को देखते हुए ध्रुवीय क्षेत्रों के महत्व को बताया है। भारत की समुद्री सीमा करीब 11 हजार किलोमीटर लंबी है और देश के पास कई द्वीप भी हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अगर अंटार्कटिका की पूरी बर्फ पिघल जाए तो समुद्र का स्तर करीब 60 मीटर तक बढ़ सकता है, जिसका असर दुनिया के कई तटीय देशों पर पड़ेगा।

भारत जैसे देश के लिए यह चुनौती और बड़ी है क्योंकि बढ़ता समुद्री जलस्तर तटीय शहरों, आर्थिक गतिविधियों और रणनीतिक क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है।

इसके अलावा आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में बर्फ के पिघलने का असर वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ सकता है, जिससे भारत के मानसून चक्र पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

 

विदेश मंत्रालय ने बताई भारत की नीति

विदेश मंत्रालय (MEA) ने समिति को बताया कि भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक दोनों क्षेत्रों में नियम आधारित व्यवस्था (Rules-Based Approach) का समर्थन करता है।

मंत्रालय के अनुसार, भारत खुद को इन क्षेत्रों में एक विज्ञान आधारित और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार देश के रूप में देखता है।

भारत की भागीदारी ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्गों के संचालन, सतत विकास और वैज्ञानिक सहयोग जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है।

MEA ने यह भी कहा कि गहरे समुद्र में खनन (Deep Sea Mining) और मछली पकड़ने से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत भारत अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए रचनात्मक भूमिका जारी रखेगा।

 

भारत के अंटार्कटिक मिशन ने बढ़ाई वैश्विक पहचान

भारत की ध्रुवीय मौजूदगी केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश कई दशकों से अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अनुसंधान भी कर रहा है।

संसदीय समिति ने बताया कि भारत के पास अंटार्कटिका में दो प्रमुख रिसर्च स्टेशन हैं – ‘मैत्री (Maitri)’ और ‘भारती (Bharati)’

भारत का पहला स्थायी अंटार्कटिक रिसर्च स्टेशन दक्षिण गंगोत्री था, जिसे बाद में बर्फ में दबने के कारण बंद कर दिया गया। इसके बाद मैत्री स्टेशन को स्थापित किया गया, जो आज भी भारत के प्रमुख वैज्ञानिक केंद्रों में शामिल है।

मैत्री स्टेशन को 1989 में शिरमाकर ओएसिस (Schirmacher Oasis) नामक बर्फ मुक्त क्षेत्र में बनाया गया था। यह इलाका स्थिर जमीन पर स्थित है, जिससे यहां लंबे समय तक वैज्ञानिक गतिविधियां संचालित की जा सकती हैं।

इसके बाद भारत ने एक आधुनिक रिसर्च स्टेशन ‘भारती’ बनाया, जिसे साल 2012 में प्रिंसेस एलिजाबेथ लैंड (Princess Elisabeth Land) क्षेत्र में स्थापित किया गया। यह स्टेशन मैत्री से करीब 2,500 किलोमीटर पूर्व स्थित है।

नया मैत्री स्टेशन बनाने की सिफारिश

संसदीय समिति ने भारत के अंटार्कटिक अभियान को और मजबूत करने के लिए एक नए मैत्री स्टेशन के जल्द निर्माण की सिफारिश की है।

समिति का कहना है कि नया स्टेशन भारत की लंबे समय तक वैज्ञानिक मौजूदगी को मजबूत करेगा और ध्रुवीय मामलों में देश की रणनीतिक स्थिति को और बेहतर बनाएगा।

रिपोर्ट में कहा गया कि अंटार्कटिका में लगातार मौजूदगी भारत को भविष्य में होने वाली अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं और फैसलों में अधिक प्रभावी भूमिका निभाने में मदद करेगी।

 

अंटार्कटिका पर भारत की मौजूदगी क्यों जरूरी है?

अंटार्कटिका दुनिया का एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जो किसी एक देश के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह अंटार्कटिक संधि प्रणाली (Antarctic Treaty System) के तहत संचालित होता है।

समिति ने बताया कि अंटार्कटिका का क्षेत्रफल भारत से करीब पांच गुना बड़ा है और कुछ स्थानों पर यहां बर्फ की मोटाई 4.5 किलोमीटर तक पहुंचती है।

वैज्ञानिकों के लिए यह क्षेत्र पृथ्वी के जलवायु इतिहास, समुद्री बदलाव और पर्यावरणीय परिवर्तनों को समझने का महत्वपूर्ण केंद्र है।

भारत की लगातार मौजूदगी से देश को जलवायु परिवर्तन, समुद्री स्तर में बदलाव और वैश्विक पर्यावरण नीति से जुड़े फैसलों में अपनी बात रखने का अवसर मिलता है।

 

Polar Ambassador की भूमिका क्या हो सकती है?

अगर सरकार Polar Ambassador नियुक्त करती है तो यह अधिकारी भारत की ध्रुवीय नीति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का काम कर सकता है।

इसकी जिम्मेदारी आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों से जुड़े देशों के साथ बातचीत बढ़ाना, वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करना और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर भारत का पक्ष रखना हो सकती है।

इसके अलावा समुद्री मार्गों, ऊर्जा संसाधनों और भविष्य की वैश्विक रणनीति से जुड़े मामलों में भी यह पद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

आर्कटिक क्षेत्र में नए समुद्री मार्गों के खुलने और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के लिए अपनी स्थिति मजबूत रखना जरूरी माना जा रहा है।

 

आर्कटिक में संसाधनों और समुद्री मार्गों की बढ़ती अहमियत

समिति ने बताया कि आर्कटिक क्षेत्र में मौजूद अधिकांश संसाधन अलग-अलग देशों की संप्रभु सीमाओं के अंदर आते हैं। इसलिए इसे पूरी तरह Global Commons (वैश्विक साझा क्षेत्र) घोषित करने के विचार का कई आर्कटिक देश विरोध करते हैं।

आर्कटिक क्षेत्र में तेल, गैस, खनिज और नए समुद्री व्यापार मार्गों की संभावनाओं के कारण दुनिया के बड़े देश इस क्षेत्र पर नजर बनाए हुए हैं।

भारत के लिए भी यह क्षेत्र ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और वैश्विक कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

 

भारत की ध्रुवीय नीति का अगला चरण

संसदीय समिति ने कहा कि भारत को ध्रुवीय क्षेत्रों को लेकर एक लंबी अवधि की रणनीति तैयार करने की जरूरत है।

रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में आर्कटिक और अंटार्कटिक से जुड़े मुद्दे केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इनमें अंतरराष्ट्रीय राजनीति, व्यापार, सुरक्षा और संसाधनों की भूमिका भी बढ़ेगी।

ऐसे में Polar Ambassador की नियुक्ति भारत को इन क्षेत्रों में अपनी आवाज मजबूत करने और वैश्विक फैसलों में प्रभावी भागीदारी निभाने में मदद कर सकती है।

 

FAQ

1. ध्रुवीय राजदूत (Polar Ambassador) की आवश्यकता क्यों बताई गई है?

Polar Ambassador की जरूरत इसलिए बताई गई है ताकि भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों से जुड़े मामलों में अपनी कूटनीतिक भूमिका को मजबूत कर सके और वैश्विक मंचों पर अपनी नीति प्रभावी तरीके से रख सके।

 

2. थरूर समिति ने सरकार को क्या सिफारिश की है?

शशि थरूर की अध्यक्षता वाली समिति ने सरकार से Polar Ambassador नियुक्त करने और ध्रुवीय मामलों के लिए समर्पित व्यवस्था बनाने पर विचार करने को कहा है।

 

3. भारत की आर्कटिक और अंटार्कटिक में क्या भूमिका है?

भारत वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए इन क्षेत्रों में सक्रिय है। भारत के अंटार्कटिका में मैत्री और भारती नाम के दो रिसर्च स्टेशन हैं।

 

4. Polar Ambassador की जिम्मेदारियां क्या होंगी?

Polar Ambassador ध्रुवीय देशों के साथ कूटनीतिक संबंध मजबूत करने, वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने और भारत की नीतियों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रखने का काम कर सकता है।

 

5. भारत के ध्रुवीय अनुसंधान केंद्र कौन-कौन से हैं?

भारत के प्रमुख अंटार्कटिक रिसर्च स्टेशन मैत्री और भारती हैं। मैत्री 1989 से और भारती 2012 से सक्रिय है।

 

6. आर्कटिक क्षेत्र भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

आर्कटिक क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, समुद्री मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक रणनीति के कारण भारत के लिए महत्वपूर्ण है। यहां होने वाले बदलाव भारत के मानसून और समुद्री तटों को भी प्रभावित कर सकते हैं।