Armenian Genocide Recognition: इज़राइल के एक फैसले से क्यों नाराज हुआ अज़रबैजान, क्या बदलेंगे पश्चिम एशिया और कॉकस क्षेत्र के समीकरण?

Armenian Genocide Recognition

Armenian Genocide Recognition: इज़राइल सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से 1915 के आर्मेनियाई नरसंहार (Armenian Genocide) को मान्यता दे दी है। इस फैसले के बाद दक्षिण कॉकस (South Caucasus) और पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। जहां आर्मेनिया ने इस कदम का स्वागत किया, वहीं इज़राइल का करीबी साझेदार अज़रबैजान खुलकर इसके विरोध में उतर आया। अज़रबैजान ने इज़राइल के फैसले को “ऐतिहासिक तथ्यों का विकृतिकरण” बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब इज़राइल और तुर्किये (Turkey) के संबंध पहले से ही गाजा युद्ध को लेकर बेहद तनावपूर्ण हैं। लंबे समय तक इज़राइल ने तुर्किये के साथ रिश्तों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर आधिकारिक मान्यता देने से परहेज किया था, लेकिन अब पहली बार उसने अपनी नीति बदल दी है

इज़राइल ने क्या फैसला लिया?

29 जून 2026 को इज़राइल सरकार ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर 1915 के आर्मेनियाई नरसंहार को आधिकारिक मान्यता दे दी। इसके बाद विदेश मंत्री गिडियन सार ने कहा कि “सही काम करने में कभी देर नहीं होती।”

उन्होंने कहा कि लगभग 100 वर्ष पहले हुए इस नरसंहार में करीब 15 लाख आर्मेनियाई लोगों की मौत हुई और उनकी सांस्कृतिक विरासत को भी नष्ट कर दिया गया। इज़राइल अब उन 32 देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने आधिकारिक रूप से इस नरसंहार को मान्यता दी है।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने कभी इस मान्यता का विरोध नहीं किया और अब समय आ गया था कि ऐतिहासिक सच्चाई को स्वीकार किया जाए।

Armenian Genocide क्या था?

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1915 से 1917 के बीच तत्कालीन ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) में रहने वाले लाखों आर्मेनियाई लोगों को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया गया, जबरन निर्वासित किया गया और उनकी हत्या की गई।

आर्मेनिया का दावा है कि इस दौरान लगभग 15 लाख लोगों की जान गई और यह एक सुनियोजित नरसंहार था। इसी वजह से दुनिया के कई देशों ने इसे Genocide यानी नरसंहार के रूप में मान्यता दी है।

दूसरी ओर, तुर्किये इस आरोप को लगातार खारिज करता रहा है। उसका कहना है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लड़ाई, बीमारी और हिंसा में आर्मेनियाई और तुर्क – दोनों समुदायों के लोग मारे गए थे, लेकिन इसे योजनाबद्ध नरसंहार कहना ऐतिहासिक रूप से गलत है।

अज़रबैजान इस फैसले से नाराज क्यों है?

अज़रबैजान का सबसे करीबी रणनीतिक सहयोगी तुर्किये है और दोनों देशों के राजनीतिक, सैन्य, आर्थिक तथा सांस्कृतिक संबंध बेहद मजबूत हैं। अज़रबैजान भी तुर्किये की तरह 1915 की घटनाओं को नरसंहार मानने से इनकार करता है।

इसी कारण इज़राइल के फैसले पर अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। उसने कहा कि 1915 की घटनाओं को राजनीतिक निर्णय के जरिए नरसंहार बताना ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना है।

अज़रबैजान का कहना है कि इस तरह के फैसले क्षेत्र में मेल-मिलाप और शांति स्थापित करने के बजाय पुराने विवादों को और गहरा करेंगे। इसलिए उसने इज़राइल सरकार से इस निर्णय पर दोबारा विचार करने की अपील की है।

इज़राइल और अज़रबैजान के रिश्ते इतने अहम क्यों हैं?

दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर विरोध के बावजूद इज़राइल और अज़रबैजान के बीच पिछले कई वर्षों से बेहद मजबूत रणनीतिक साझेदारी रही है।

Image Credit: REUTERS/Caitlin Ochs

अज़रबैजान इज़राइल को बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आपूर्ति करता है, जबकि इज़राइल अज़रबैजान को आधुनिक हथियार और रक्षा तकनीक उपलब्ध कराने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। ऊर्जा, रक्षा और सुरक्षा सहयोग दोनों देशों के संबंधों की सबसे मजबूत कड़ी माने जाते हैं।

यही कारण है कि इज़राइल का यह फैसला दोनों देशों के रिश्तों में असहजता पैदा कर सकता है, हालांकि फिलहाल दोनों ने अपने व्यापक सहयोग पर कोई औपचारिक असर पड़ने की घोषणा नहीं की है।

 

इज़राइल ने अब तक यह फैसला क्यों नहीं लिया था?

इज़राइल की लगातार आने वाली सरकारों ने लंबे समय तक आर्मेनियाई नरसंहार को आधिकारिक मान्यता नहीं दी थी। इसकी सबसे बड़ी वजह तुर्किये के साथ उसके रणनीतिक संबंध थे।

लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते तेजी से बिगड़ गए। तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन लगातार इज़राइल की कार्रवाई की आलोचना करते रहे और गाजा में इज़राइल पर नरसंहार जैसे आरोप लगाए।

इज़राइल ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। इसी बीच अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने पहली बार सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह आर्मेनियाई नरसंहार को मान्यता देते हैं। अब 2026 में सरकार ने इसे औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।

 

Armenia और Azerbaijan के बीच विवाद क्या है?

अज़रबैजान और आर्मेनिया दशकों से नागोर्नो-काराबाख (Nagorno-Karabakh) क्षेत्र को लेकर संघर्ष में रहे हैं।

सोवियत संघ के विघटन के बाद दोनों देशों के बीच कई युद्ध हुए। 2023 में अज़रबैजान ने सैन्य कार्रवाई कर इस पूरे क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिसके बाद वहां रहने वाले अधिकांश आर्मेनियाई लोगों को पलायन करना पड़ा।

हाल के वर्षों में दोनों देशों ने शांति समझौते की दिशा में कुछ कदम जरूर बढ़ाए हैं, लेकिन आपसी अविश्वास अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में आर्मेनियाई नरसंहार जैसे ऐतिहासिक मुद्दे आज भी दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करते हैं।

 

क्या इस फैसले का क्षेत्रीय राजनीति पर असर पड़ेगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि इज़राइल के इस फैसले से तुर्किये और अज़रबैजान दोनों की नाराजगी बढ़ सकती है। हालांकि ऊर्जा और रक्षा सहयोग को देखते हुए इज़राइल और अज़रबैजान अपने रणनीतिक संबंध पूरी तरह खत्म करने की संभावना कम है।

दूसरी ओर, इस फैसले से आर्मेनिया को कूटनीतिक समर्थन मिलेगा और यह यूरोप तथा पश्चिमी देशों के उस रुख को भी मजबूत करेगा, जो पहले से ही आर्मेनियाई नरसंहार को मान्यता दे चुके हैं।

इसके अलावा यह निर्णय दक्षिण कॉकस क्षेत्र में चल रही शांति प्रक्रिया पर भी राजनीतिक असर डाल सकता है।

 

निष्कर्ष

Armenian Genocide Recognition केवल एक ऐतिहासिक मुद्दा नहीं बल्कि आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति, कूटनीति और क्षेत्रीय रणनीति से जुड़ा संवेदनशील विषय है। इज़राइल द्वारा पहली बार आधिकारिक मान्यता देने से आर्मेनिया को बड़ी कूटनीतिक जीत मिली है, लेकिन इसके साथ ही अज़रबैजान और तुर्किये की नाराजगी भी सामने आ गई है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह फैसला इज़राइल-अज़रबैजान संबंधों को प्रभावित करता है या दोनों देश अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हुए सहयोग जारी रखते हैं।

FAQs:

1915 से 1917 के बीच ऑटोमन साम्राज्य में बड़ी संख्या में आर्मेनियाई लोगों की हत्या, निर्वासन और उत्पीड़न को कई देश आर्मेनियाई नरसंहार मानते हैं।

इज़राइल सरकार ने इसे ऐतिहासिक सच्चाई और नैतिक जिम्मेदारी बताते हुए पहली बार आधिकारिक मान्यता दी है।

अज़रबैजान तुर्किये की तरह इस घटना को नरसंहार नहीं मानता और उसका कहना है कि इज़राइल का फैसला ऐतिहासिक तथ्यों का राजनीतिक रूप से गलत प्रस्तुतिकरण है।

दोनों देशों के बीच ऊर्जा, रक्षा और सुरक्षा सहयोग काफी मजबूत है। हालांकि इस फैसले से कूटनीतिक तनाव जरूर बढ़ सकता है।

दोनों देशों के बीच नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र को लेकर कई युद्ध हो चुके हैं। 2023 में अज़रबैजान ने इस क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया था और तब से दोनों देशों के बीच शांति समझौते की कोशिशें जारी हैं।