Bengal Midday Meal Egg Row: ISKCON के सात्विक भोजन के साथ छात्रों को मिलेगा अंडा, आखिर बंगाल सरकार ने क्यों लिया यह फैसला – जानिए क्या है मिड डे मील अंडा विवाद ?

Bengal Midday Meal Egg Row

Bengal Midday Meal Egg Row: पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील से अंडा हटाए जाने की आशंका पर शुरू हुआ विवाद अब नए फैसले के साथ शांत होता दिख रहा है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि कोलकाता के सरकारी स्कूलों में ISKCON द्वारा तैयार सात्विक और प्रोटीनयुक्त भोजन के साथ बच्चों को अंडे भी दिए जाएंगे। अंडों की खरीद और वितरण स्वयं सहायता समूहों के जरिए अलग से किया जाएगा। यह व्यवस्था 1 अगस्त से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू होगी। सरकार का कहना है कि इससे बच्चों को पर्याप्त प्रोटीन मिलेगा, जबकि ISKCON अपनी शाकाहारी भोजन व्यवस्था के अनुसार मुख्य भोजन तैयार करेगा।

यह विवाद केवल अंडे तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में बच्चों का पोषण, स्थानीय खानपान संस्कृति, धार्मिक मान्यताएं, स्वयं सहायता समूहों की आजीविका और सरकारी स्कूलों की भोजन व्यवस्था जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल थे।

दुनिया की सबसे बड़ी स्कूल भोजन योजना का हिस्सा है PM POSHAN

जिस योजना को लेकर विवाद हुआ, वह प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN) योजना है। पहले इसे मिड-डे मील योजना (Mid-Day Meal Scheme) के नाम से जाना जाता था। इसकी शुरुआत 15 अगस्त 1995 को बच्चों में कुपोषण कम करने, स्कूलों में नामांकन बढ़ाने और नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई थी।

आज यह दुनिया का सबसे बड़ा स्कूल भोजन कार्यक्रम माना जाता है। इसके तहत देशभर के 11 करोड़ से अधिक बच्चों को 11 लाख से ज्यादा सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में प्रतिदिन गर्म पका हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है। योजना का उद्देश्य पूरे दिन का भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि स्कूल के दौरान बच्चों को अतिरिक्त कैलोरी और प्रोटीन उपलब्ध कराना है ताकि उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य दोनों बेहतर हो सकें।

कोलकाता में ISKCON को जिम्मेदारी देने से शुरू हुआ विवाद

पश्चिम बंगाल सरकार ने 22 जून 2026 को पेश किए गए राज्य बजट में घोषणा की कि कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में मिड-डे मील तैयार करने और वितरित करने के लिए ISKCON को शामिल किया जाएगा। शुरुआत में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने का फैसला किया गया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार कोलकाता में लगभग 1,800 स्कूल ऐसे हैं जहां PM POSHAN योजना के तहत बच्चों को दोपहर का भोजन दिया जाता है। सरकार ने इस परियोजना के साथ प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के भोजन की सामग्री लागत ₹6.78 से बढ़ाकर ₹10 प्रति छात्र कर दी। उच्च प्राथमिक स्तर पर यह राशि लगभग ₹10.17 थी, जिसे लगभग उसी स्तर पर बनाए रखा गया।

राज्य सरकार का तर्क था कि ISKCON की आधुनिक केंद्रीकृत रसोई (Centralized Kitchen) से भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, समय पर आपूर्ति और निगरानी पहले से बेहतर होगी।

 

ISKCON क्या है और स्कूल भोजन से इसका क्या संबंध है

ISKCON (International Society for Krishna Consciousness) की स्थापना वर्ष 1966 में ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने न्यूयॉर्क में की थी। इसे हिंदी में अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ और आम बोलचाल में हरे कृष्ण आंदोलन भी कहा जाता है।

यह गौड़ीय वैष्णव परंपरा से जुड़ी धार्मिक और आध्यात्मिक संस्था है, जो भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति, भगवद्गीता के संदेश और हरे कृष्ण महामंत्र के प्रचार के लिए जानी जाती है। लेकिन धार्मिक गतिविधियों के अलावा ISKCON लंबे समय से सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी सक्रिय है।

संस्था कई राज्यों और अनेक शहरों में बड़े पैमाने पर स्कूल भोजन कार्यक्रम संचालित करती है। आधुनिक केंद्रीकृत रसोई के माध्यम से लाखों बच्चों तक भोजन पहुंचाने का अनुभव होने के कारण पश्चिम बंगाल सरकार ने भी इसे पायलट प्रोजेक्ट के लिए चुना।

एक बयान से बदल गया पूरे विवाद का स्वरूप

सरकार की घोषणा के दो दिन बाद 24 जून 2026 को ISKCON के कोलकाता प्रवक्ता राधारमण दास ने कहा कि संस्था द्वारा तैयार किए जाने वाले भोजन में अंडा शामिल नहीं होगा। उनकी जगह बच्चों को पनीर, सोयाबीन, राजमा, दाल और अन्य शाकाहारी प्रोटीन स्रोत दिए जाएंगे।

ISKCON ने दावा किया कि उसका मेन्यू पोषण विशेषज्ञों की सलाह से तैयार किया जाएगा और उसमें ऐसा संतुलन रखा जाएगा जिससे बच्चों को अंडे के बराबर या उससे अधिक पोषण मिल सके।

यहीं से पूरे विवाद की शुरुआत हुई। उस समय पश्चिम बंगाल के अधिकांश सरकारी स्कूलों में सामान्य रूप से सप्ताह में एक दिन उबला अंडा दिया जाता था। इसलिए यह धारणा तेजी से फैल गई कि ISKCON के आने के बाद बच्चों के भोजन से अंडा स्थायी रूप से हटा दिया जाएगा।

 

विवाद केवल अंडे तक सीमित नहीं रहा

कुछ ही दिनों में यह मुद्दा केवल मेन्यू का नहीं बल्कि बच्चों के पोषण और स्थानीय खानपान संस्कृति का विषय बन गया। विरोध करने वालों का पहला तर्क था कि अंडा कम लागत में उपलब्ध होने वाला उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन स्रोत है, जिसमें आवश्यक अमीनो एसिड, विटामिन B12, विटामिन D, आयरन, आयोडीन और कोलीन जैसे कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व मिलते हैं।

पोषण विशेषज्ञों का कहना था कि शाकाहारी भोजन से भी पर्याप्त पोषण दिया जा सकता है, लेकिन इसके लिए सही मात्रा, उचित खाद्य संयोजन, अच्छी गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। केवल कागज पर प्रोटीन की मात्रा बढ़ा देने से बच्चों को समान पोषण मिलना तय नहीं माना जा सकता।

दूसरा बड़ा मुद्दा पश्चिम बंगाल की खानपान संस्कृति से जुड़ा था। राज्य में अंडा, मछली और अन्य पशु-आधारित खाद्य पदार्थ सामान्य भोजन का हिस्सा हैं। ऐसे में विपक्ष ने आरोप लगाया कि किसी धार्मिक संस्था की शाकाहारी भोजन पद्धति को सरकारी स्कूलों के सभी बच्चों पर लागू करना स्थानीय खानपान पर प्रभाव डाल सकता है।

हालांकि पहले से भी जो बच्चे अंडा नहीं खाते थे, उनके लिए वैकल्पिक भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था मौजूद थी। इसलिए विवाद का मुख्य सवाल यह था कि क्या सभी बच्चों के लिए उपलब्ध अंडे को हटाया जाएगा।

 

स्वयं सहायता समूहों की आजीविका भी बनी चिंता

विवाद का एक बड़ा पहलू हजारों स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups) की महिलाओं से भी जुड़ा था। लंबे समय से ये महिलाएं सरकारी स्कूलों में भोजन पकाने और परोसने का काम करती रही हैं।

आलोचकों का कहना था कि यदि पूरी व्यवस्था किसी एक केंद्रीकृत संस्था को सौंप दी गई तो हजारों महिलाओं की आजीविका प्रभावित हो सकती है। यही चिंता बाद में अदालत में दायर जनहित याचिका का भी प्रमुख आधार बनी।

 

तृणमूल कांग्रेस ने सरकार पर साधा निशाना

घोषणा के बाद तृणमूल कांग्रेस ने सरकार पर पश्चिम बंगाल में शाकाहार थोपने का आरोप लगाया। पार्टी के वरिष्ठ नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहा कि बच्चों को पोषण से वंचित नहीं किया जाना चाहिए और राज्य की खानपान परंपरा का सम्मान होना चाहिए।

तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने भी सोयाबीन और राजमा को अंडे का विकल्प बताए जाने पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि केवल पोषण संबंधी आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि बच्चे उस भोजन को पसंद करें और नियमित रूप से खाएं। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि यह मॉडल इतना बेहतर है तो क्या इसे अन्य सरकारी संस्थानों में भी लागू किया जाएगा।

 

सरकार और ISKCON ने फैसले का बचाव किया

विवाद बढ़ने के बाद राज्य सरकार ने कहा कि ISKCON को बड़े स्तर पर स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण भोजन पहुंचाने का अनुभव है। सरकार का तर्क था कि केंद्रीकृत रसोई व्यवस्था से भोजन की गुणवत्ता और निगरानी दोनों बेहतर होंगी।

स्कूल शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने भी कहा कि शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्व केवल अंडे से ही नहीं मिलते, बल्कि संतुलित शाकाहारी भोजन से भी बच्चों की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।

दूसरी ओर ISKCON ने दोहराया कि उसका उद्देश्य किसी पर खानपान थोपना नहीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से तैयार शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराना है। संस्था ने कहा कि उसके मेन्यू में सोयाबीन, पनीर, दाल, राजमा और डेयरी उत्पादों जैसे कई प्रोटीन स्रोत शामिल किए जाएंगे और देश के अनेक राज्यों में वह पहले से सफलतापूर्वक स्कूल भोजन कार्यक्रम संचालित कर रही है।

 

ओडिशा मॉडल से निकलने लगी समाधान की राह

अंडे को लेकर बढ़ते विरोध और राजनीतिक विवाद के बीच पश्चिम बंगाल सरकार ने समाधान तलाशना शुरू किया। 29 जून 2026 को खबर सामने आई कि राज्य का स्कूल शिक्षा विभाग ओडिशा मॉडल पर विचार कर रहा है।

इस मॉडल में ISKCON या उससे जुड़ी संस्था अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूरी तरह शाकाहारी भोजन तैयार करती है, जबकि अंडे की खरीद और वितरण की जिम्मेदारी अलग व्यवस्था के तहत स्थानीय स्तर पर की जाती है। इसके लिए स्कूलों या स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups) को अतिरिक्त धन उपलब्ध कराया जाता है।

सरकार का मानना था कि इस व्यवस्था से दोनों पक्षों की चिंताओं का समाधान हो सकता है। ISKCON अपनी शाकाहारी भोजन नीति पर कायम रह सकेगा और दूसरी ओर बच्चों को मिलने वाला अंडा भी बंद नहीं होगा।

कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा मामला

विवाद बढ़ने के बाद इस योजना को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई। 8 जुलाई 2026 को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी की खंडपीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार से योजना पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि यदि ISKCON को स्कूल भोजन की जिम्मेदारी दी जाती है तो बच्चों को अंडे से वंचित किया जा सकता है। साथ ही हजारों स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं की आजीविका भी प्रभावित होगी, क्योंकि वे वर्षों से स्कूलों में भोजन तैयार करने और परोसने का काम करती रही हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से योजना से संबंधित आधिकारिक अधिसूचना, प्रस्ताव और सरकार की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ISKCON की ओर से केवल एक प्रस्ताव प्राप्त हुआ है और उस समय तक कोई अंतिम समझौता या औपचारिक अनुबंध नहीं हुआ था। सरकार ने यह भी कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई है क्योंकि अंतिम निर्णय अभी लिया ही नहीं गया था। इसके बाद अदालत ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

 

मुख्यमंत्री ने फिर दोहराई ISKCON योजना

हाईकोर्ट की कार्यवाही के कुछ दिन बाद 16 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने दोबारा घोषणा की कि 1 अगस्त से कोलकाता में पायलट प्रोजेक्ट के तहत ISKCON स्कूलों में Mid-Day Meal की आपूर्ति शुरू करेगा।

उन्होंने कहा कि योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को स्वच्छ, सुरक्षित और बेहतर गुणवत्ता वाला भोजन उपलब्ध कराना है। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा तो भविष्य में इसे पहले नदिया जिले और फिर राज्य के अन्य हिस्सों तक भी बढ़ाया जा सकता है।

हालांकि उस समय भी सरकार की ओर से यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया था कि बच्चों को पहले की तरह अंडा मिलेगा या नहीं। इसी कारण विवाद पूरी तरह शांत नहीं हुआ।

 

अंतिम स्पष्टीकरण के साथ सरकार ने खत्म की बड़ी आशंका

लगातार विवाद के बीच 29 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री ने नबन्ना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सरकार की अंतिम और स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक की।

उन्होंने कहा कि ISKCON केवल मुख्य भोजन तैयार करेगा, जबकि बच्चों को मिलने वाले उबले अंडे अलग व्यवस्था के तहत पहले की तरह उपलब्ध कराए जाएंगे।

सरकार ने घोषणा की कि अंडों की खरीद और वितरण का काम स्वयं सहायता समूहों (Self Help Groups) के माध्यम से कराया जाएगा। मुख्यमंत्री के अनुसार छात्रों को सप्ताह में एक या दो दिन उबला अंडा मिलता रहेगा।

इस घोषणा के साथ सरकार ने साफ कर दिया कि ISKCON के शाकाहारी भोजन और अंडे की आपूर्ति दोनों व्यवस्थाएं समानांतर रूप से चलेंगी। इससे एक ओर बच्चों का पोषण बना रहेगा और दूसरी ओर स्वयं सहायता समूहों की भूमिका भी समाप्त नहीं होगी।

 

1 अगस्त से कोलकाता में पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत

सरकार ने बताया कि नई व्यवस्था 1 अगस्त 2026 से कोलकाता के बड़े हिस्से के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू की जाएगी।

इस मॉडल में ISKCON केंद्रीकृत रसोई से मुख्य भोजन तैयार करेगा, जबकि स्वयं सहायता समूह भोजन के साथ अंडों की आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे। सरकार का कहना है कि भविष्य में इस मॉडल के परिणामों का मूल्यांकन करने के बाद ही इसे अन्य जिलों में लागू करने पर निर्णय लिया जाएगा।

 

PM POSHAN के नियमों में अंडे को लेकर क्या व्यवस्था है

राष्ट्रीय स्तर पर लागू PM POSHAN योजना सभी राज्यों के लिए अंडा अनिवार्य नहीं बनाती। योजना के अनुसार प्राथमिक कक्षाओं के प्रत्येक बच्चे को दोपहर के भोजन से कम से कम 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन, जबकि उच्च प्राथमिक स्तर पर 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत कक्षा आठ तक पात्र बच्चों के लिए गर्म पका भोजन एक कानूनी अधिकार है।

केंद्र सरकार राज्यों को यह स्वतंत्रता देती है कि वे स्थानीय खानपान, पोषण आवश्यकताओं और बजट के आधार पर अपना साप्ताहिक मेन्यू तैयार करें। इसलिए कुछ राज्यों में अंडा दिया जाता है, कुछ राज्यों में दूध या फल, जबकि कई राज्यों में स्थानीय खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी जाती है।

हालांकि केंद्रीय दिशानिर्देशों में एक महत्वपूर्ण प्रावधान भी है। यदि किसी राज्य के निर्धारित मेन्यू में अंडा, दूध या फल शामिल है और भोजन तैयार करने वाला NGO या संस्था धार्मिक अथवा अन्य कारणों से उसे उपलब्ध नहीं करा सकती, तो राज्य सरकार को उस सामग्री की अलग से व्यवस्था करनी होगी।

इसी कारण पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ISKCON के भोजन के साथ स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से अलग से अंडे उपलब्ध कराने का फैसला PM POSHAN के मौजूदा दिशानिर्देशों के अनुरूप माना जा रहा है।

 

पोषण की बहस में अंडा और सोयाबीन आमने-सामने

विवाद के दौरान सबसे अधिक चर्चा इस बात पर हुई कि क्या सोयाबीन और दूसरे शाकाहारी खाद्य पदार्थ अंडे की जगह ले सकते हैं।

पोषण विशेषज्ञों के अनुसार केवल 100 ग्राम में कितना प्रोटीन है, इसके आधार पर दोनों की तुलना करना वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं माना जा सकता। किसी भी स्कूल भोजन कार्यक्रम में वास्तविक मात्रा, पकाने का तरीका, लागत, बच्चों की पसंद, पाचन क्षमता, प्रोटीन की गुणवत्ता और दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।

अंडा कम लागत में उपलब्ध उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन स्रोत माना जाता है। इसमें सभी आवश्यक अमीनो एसिड के साथ विटामिन B12, विटामिन D, आयरन, आयोडीन और कोलीन जैसे कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। इसकी एक और विशेषता यह है कि प्रत्येक बच्चे को समान मात्रा आसानी से उपलब्ध कराई जा सकती है।

दूसरी ओर विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि भोजन में सोयाबीन, दालें, राजमा, अनाज और डेयरी उत्पादों का सही संयोजन रखा जाए तो शाकाहारी भोजन से भी पर्याप्त प्रोटीन और ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है।

इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि से वास्तविक सवाल यह नहीं है कि शाकाहारी भोजन पौष्टिक हो सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि तय बजट में प्रतिदिन बच्चों तक सही मात्रा, पर्याप्त विविधता और अच्छी गुणवत्ता वाला भोजन नियमित रूप से पहुंचाया जा सकता है या नहीं।

केवल Mid-Day Meal से बच्चों का पूरा पोषण नहीं होता

PM POSHAN बच्चों को स्कूल के समय पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने वाली महत्वपूर्ण योजना है, लेकिन इसे बच्चे के पूरे दिन के पोषण का विकल्प नहीं माना जा सकता। प्राथमिक कक्षाओं के भोजन के लिए कम से कम 450 कैलोरी और 12 ग्राम प्रोटीन, जबकि उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन का मानक तय है। इसका अर्थ है कि योजना बच्चे की दैनिक जरूरतों का एक हिस्सा पूरा करती है। बाकी पोषण सुबह और शाम घर में मिलने वाले भोजन से आना जरूरी है।

यही कारण है कि Bengal Midday Meal Egg Row को केवल एक अंडे या एक संस्था की भोजन नीति तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। बड़ा सवाल यह है कि गरीब और कमजोर परिवारों के बच्चों को स्कूल तथा घर दोनों जगह पर्याप्त कैलोरी, प्रोटीन, आयरन, विटामिन और दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्व मिल रहे हैं या नहीं।

 

31 अध्ययनों की समीक्षा में मिले मिश्रित परिणाम

जुलाई 2024 में BMJ Open में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा में भारत के Mid-Day Meal कार्यक्रम से जुड़े 31 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि योजना से स्कूल में उपस्थिति, नामांकन और शैक्षणिक उपलब्धियों में सुधार के संकेत मिले। कुछ अध्ययनों में बच्चों के वजन, लंबाई और दूसरे पोषण संकेतकों में भी लाभ दिखाई दिया, लेकिन सभी अध्ययनों के परिणाम एक जैसे नहीं थे।

समीक्षा का निष्कर्ष था कि स्कूल भोजन कार्यक्रम कुछ पोषण परिणामों और पढ़ाई से जुड़े प्रदर्शन को बेहतर बनाने में प्रभावी रहा है, लेकिन इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि हर बच्चे की संपूर्ण पोषण स्थिति अपने-आप सुधर जाती है। भोजन की गुणवत्ता, स्थानीय मेन्यू, परिवार की आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सेवाएं और घर में मिलने वाला भोजन भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

 

गरीब परिवारों के बच्चों में चुनौती ज्यादा गंभीर

वर्ष 2024 में प्रकाशित एक राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन में लंबे समय तक Mid-Day Meal पाने वाले बच्चों में कम BMI और कम वजन का जोखिम घटने के संकेत मिले थे। इसके बावजूद आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में कुपोषण पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

इससे यह समझ आता है कि स्कूल में एक बार पौष्टिक भोजन मिलने से बच्चे को लाभ जरूर होता है, लेकिन यदि घर में नियमित और संतुलित भोजन उपलब्ध नहीं है तो उसकी पूरी पोषण जरूरत पूरी नहीं हो सकती। सामाजिक असमानता, भोजन की उपलब्धता, बीमारी, स्वच्छ पानी और माता-पिता की आय जैसे कारक भी बच्चे की सेहत पर सीधा असर डालते हैं।

 

एक जैसा मेन्यू बच्चों की जरूरत पूरी नहीं कर पाता

NCERT के Journal of Indian Education में प्रकाशित चंडीगढ़ के करीब 500 स्कूली बच्चों पर किए गए अध्ययन में बड़ी संख्या में बच्चों का BMI सामान्य स्तर से कम पाया गया था। अध्ययन में बार-बार एक जैसा भोजन देने के बजाय मेन्यू में गुणवत्ता और विविधता बढ़ाने की जरूरत बताई गई।

इसका सीधा संबंध पश्चिम बंगाल में चल रही बहस से भी है। केवल यह तय करना पर्याप्त नहीं है कि भोजन शाकाहारी होगा या उसमें अंडा शामिल होगा। भोजन में दाल, अनाज, सब्जियां, फल, दूध, अंडा या उनके उपयुक्त विकल्पों का संतुलन, नियमितता और बच्चों की पसंद भी महत्वपूर्ण है।

यदि किसी मेन्यू में पोषण कागज पर पर्याप्त दिखता है, लेकिन बच्चे स्वाद पसंद न आने के कारण उसे पूरा नहीं खाते, तो वास्तविक पोषण लाभ कम हो सकता है।

 

स्कूली उम्र में एनीमिया अब भी बड़ी समस्या

स्वास्थ्य मंत्रालय, UNICEF और Population Council के Comprehensive National Nutrition Survey 2016–18 से जुड़े आंकड़ों में 5 से 9 वर्ष के लगभग 23 प्रतिशत बच्चों में एनीमिया पाया गया था।

यह आंकड़ा केवल Mid-Day Meal लेने वाले बच्चों का नहीं है, इसलिए इसे सीधे योजना की विफलता नहीं कहा जा सकता। हालांकि इससे यह जरूर पता चलता है कि स्कूल जाने वाली उम्र के बच्चों में आयरन और दूसरे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी गंभीर चुनौती बनी हुई है।

इसी वजह से विशेषज्ञ भोजन में केवल कैलोरी और कुल प्रोटीन देखने के बजाय आयरन, विटामिन B12, विटामिन D, कैल्शियम, आयोडीन और दूसरे पोषक तत्वों पर भी ध्यान देने की सलाह देते हैं।

तमिलनाडु में चिकन बिरयानी का प्रस्ताव बना नई बहस

पश्चिम बंगाल में अंडे को लेकर विवाद के बीच तमिलनाडु सरकार स्कूलों की भोजन योजना में सप्ताह में एक दिन चिकन बिरयानी शामिल करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।

राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री ए. राजमोहन ने यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सामने रखा है। 30 जुलाई 2026 तक प्रस्ताव की समीक्षा जारी थी और इसे सरकार की मंजूरी नहीं मिली थी। इसलिए फिलहाल चिकन बिरयानी देना लागू नीति नहीं, बल्कि विचाराधीन प्रस्ताव है।

मंत्री का कहना है कि इस बदलाव से बच्चों को प्रोटीनयुक्त भोजन मिल सकता है और स्कूल का भोजन अधिक स्वादिष्ट तथा आकर्षक बनाया जा सकता है। उन्होंने यह प्रस्ताव तमिलनाडु के स्कूल पोषण कार्यक्रम में अलग-अलग सरकारों द्वारा समय-समय पर किए गए बदलावों की अगली कड़ी के रूप में रखा।

 

कामराज से एमजीआर तक लगातार बदला स्कूल भोजन

तमिलनाडु में Mid-Day Meal की शुरुआत को लेकर अक्सर मुख्यमंत्री के. कामराज का नाम लिया जाता है, लेकिन राज्य में स्कूल भोजन कार्यक्रम की जड़ें इससे भी पुरानी हैं। आधिकारिक ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार मद्रास कॉरपोरेशन क्षेत्र में वर्ष 1925 के आसपास स्कूली बच्चों के लिए भोजन कार्यक्रम शुरू किया गया था।

कामराज के शासन में 1950 और 1960 के दशक के दौरान इसे बड़े पैमाने पर सरकारी प्राथमिक विद्यालयों तक पहुंचाया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन यानी एमजीआर ने 1 जुलाई 1982 से इसे व्यापक पौष्टिक भोजन कार्यक्रम के रूप में आगे बढ़ाया।

बाद की सरकारों ने मेन्यू में अंडे और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल किए। राज्य की मौजूदा व्यवस्था में कई कक्षाओं के बच्चों को स्कूल के कार्य दिवसों में नियमित रूप से अंडा दिया जाता है और अंडा नहीं खाने वाले बच्चों के लिए केला जैसे विकल्प उपलब्ध कराए जाते हैं।

इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण चिकन बिरयानी के प्रस्ताव को केवल एक नए व्यंजन की घोषणा नहीं, बल्कि स्कूल भोजन को बच्चों के लिए अधिक पौष्टिक और आकर्षक बनाने की बहस के रूप में देखा जा रहा है।

 

स्कूलों के नाश्ते का मेन्यू भी बदलेगा

तमिलनाडु सरकार सरकारी स्कूलों में चल रही नाश्ता योजना के मेन्यू में भी बदलाव करने पर विचार कर रही है। शिक्षा मंत्री के अनुसार वर्तमान में प्रति बच्चे करीब ₹15 खर्च किए जाते हैं।

सरकार गेहूं या रवा उपमा जैसे बार-बार दिए जाने वाले व्यंजनों की जगह अधिक पौष्टिक और बच्चों को पसंद आने वाले विकल्प शामिल करना चाहती है। चिकन बिरयानी के प्रस्ताव के साथ ही नाश्ते के मेन्यू में सुधार की बात भी रखी गई है।

तमिलनाडु की स्कूल नाश्ता योजना सितंबर 2022 में प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों के लिए शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य बच्चों को खाली पेट स्कूल आने से रोकना, उनकी कक्षा में एकाग्रता बढ़ाना और सरकारी स्कूलों में उपस्थिति सुधारना था।

 

कर्नाटक में अंडे की कीमत ने बिगाड़ा बजट

पश्चिम बंगाल में अंडा धार्मिक और नीतिगत बहस का विषय बना, जबकि कर्नाटक में इसकी बढ़ती कीमत ने Mid-Day Meal की व्यावहारिक कठिनाइयों को सामने ला दिया।

कर्नाटक सरकार एक अंडे के लिए कुल ₹6 उपलब्ध कराती है। इसमें करीब ₹5 अंडे की खरीद और शेष राशि उसे उबालने, छीलने तथा स्कूल तक पहुंचाने जैसे खर्चों के लिए होती है। लेकिन राज्य के कई हिस्सों में एक अंडे की बाजार कीमत ₹8 से ₹9 तक पहुंचने के कारण स्कूल तय बजट में खरीद नहीं कर पा रहे हैं।

कर्नाटक के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में करीब 47 लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं और इनमें लगभग दो-तिहाई बच्चों को पोषण कार्यक्रम के तहत सप्ताह में छह अंडे मिलने की व्यवस्था बताई गई है। बढ़ी हुई कीमत ने इतनी बड़ी आपूर्ति को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

 

कहीं केला, कहीं बारी-बारी से मिल रहा अंडा

बजट की कमी के कारण कई स्कूल बच्चों से अंडे के बजाय केला चुनने को कह रहे हैं। कुछ स्कूलों ने छात्रों को अलग-अलग समूहों में बांटकर एक दिन छोड़कर अंडा देना शुरू किया है।

मैसूरु के कुछ स्कूलों में अंडे का वितरण अस्थायी रूप से रोकने की रिपोर्ट भी सामने आई। हालांकि शिक्षा विभाग ने अंडा लेने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट की बात से इनकार किया है।

कई स्कूलों में शिक्षक, स्कूल विकास एवं निगरानी समितियां और पूर्व छात्र संगठन बाजार मूल्य तथा सरकारी आवंटन के बीच का अंतर अपनी ओर से भर रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में यह अतिरिक्त बोझ करीब ₹2 प्रति अंडा तक पहुंच गया है।

मैसूरु के एक प्रधानाध्यापक द्वारा करीब ₹15,000 निजी धन से खर्च करने की बात भी सामने आई। इससे पता चलता है कि अच्छी योजना बनाने के साथ बदलती बाजार कीमतों के अनुसार बजट को समय पर अपडेट करना भी जरूरी है।

 

प्रति अंडा ₹8 देने का प्रस्ताव वित्त विभाग के पास

कर्नाटक के Mid-Day Meal निदेशक के अनुसार सरकार ने प्रति अंडा आवंटन को ₹6 से बढ़ाकर ₹8 करने का प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजा है।

30 जुलाई 2026 तक इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी नहीं मिली थी। अधिकारियों के अनुसार समीक्षा के बाद इस पर निर्णय लिया जाना था।

कर्नाटक का मामला बताता है कि केवल मेन्यू में अंडा लिख देना पर्याप्त नहीं है। उसके लिए खरीद, परिवहन, भंडारण, उबालने की व्यवस्था और बाजार मूल्य के अनुसार पर्याप्त बजट भी जरूरी होता है।

 

बंगाल का विवाद तीन बड़े सवाल छोड़ गया

Bengal Midday Meal Egg Row से पहला सवाल बच्चों के पोषण का सामने आया। सरकारी योजना में ऐसा भोजन होना चाहिए जो तय कैलोरी और प्रोटीन के साथ सूक्ष्म पोषक तत्व भी दे सके।

दूसरा सवाल स्थानीय भोजन संस्कृति और व्यक्तिगत पसंद का है। किसी धार्मिक संस्था को भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी दिए जाने पर यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि संस्था की आहार नीति सभी बच्चों के उपलब्ध विकल्पों को सीमित न करे।

तीसरा सवाल स्कूल भोजन से जुड़ी स्थानीय अर्थव्यवस्था का है। स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं, रसोइयों और स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं की आजीविका को नजरअंदाज करके केंद्रीकृत मॉडल लागू करना सामाजिक विरोध पैदा कर सकता है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने ISKCON से शाकाहारी मुख्य भोजन बनवाने और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से अलग से अंडा उपलब्ध कराने की घोषणा करके इन तीनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। अब इस मॉडल की सफलता भोजन की गुणवत्ता, नियमित सप्लाई, बच्चों की स्वीकार्यता और पारदर्शी निगरानी पर निर्भर करेगी।

 

FAQs

1. पश्चिम बंगाल में अंडे को लेकर विवाद क्या है?

विवाद तब शुरू हुआ जब ISKCON ने कहा कि उसके द्वारा तैयार किए जाने वाले Mid-Day Meal में अंडा शामिल नहीं होगा और उसकी जगह शाकाहारी प्रोटीन दिया जाएगा। विपक्ष और पोषण विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि इससे बच्चों को पहले से मिलने वाला अंडा बंद हो सकता है। बाद में सरकार ने स्पष्ट किया कि अंडे स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से अलग से दिए जाएंगे।

 

2. ISKCON मील योजना क्या है?

इस योजना के तहत ISKCON की केंद्रीकृत रसोई में सरकारी स्कूलों के लिए शाकाहारी और प्रोटीनयुक्त मुख्य भोजन तैयार किया जाएगा। इसका उद्देश्य भोजन की स्वच्छता, गुणवत्ता और समय पर सप्लाई में सुधार करना है।

 

3. क्या छात्रों को अब भोजन के साथ अंडे भी मिलेंगे?

सरकार की घोषणा के अनुसार बच्चों को सप्ताह में एक या दो दिन उबला अंडा दिया जाएगा। ISKCON मुख्य शाकाहारी भोजन तैयार करेगा, जबकि अंडों की खरीद और वितरण स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से अलग से किया जाएगा।

 

4. राज्य सरकार ने यह फैसला क्यों लिया?

सरकार का कहना है कि ISKCON की केंद्रीकृत रसोई व्यवस्था से बड़े स्तर पर स्वच्छ, नियमित और बेहतर गुणवत्ता वाला भोजन पहुंचाया जा सकेगा। अंडे की अलग व्यवस्था करके बच्चों के पोषण और स्वयं सहायता समूहों की भूमिका दोनों को बनाए रखने की कोशिश की गई है।

 

5. मिड-डे मील योजना का उद्देश्य क्या है?

PM POSHAN का उद्देश्य बच्चों में स्कूल के समय भूख कम करना, अतिरिक्त कैलोरी और प्रोटीन उपलब्ध कराना, कुपोषण घटाना तथा सरकारी स्कूलों में नामांकन, उपस्थिति और पढ़ाई से जुड़े परिणाम बेहतर करना है।

 

6. क्या सभी सरकारी स्कूलों में यह व्यवस्था लागू होगी?

शुरुआत में इसे कोलकाता के सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने की घोषणा की गई है। इसके परिणामों की समीक्षा के बाद ही इसे नदिया या पश्चिम बंगाल के दूसरे जिलों तक बढ़ाने पर फैसला किया जाएगा।