FCRA Bill 2026: FCRA बिल को लेकर संसद में गरमाई राजनीती, क्या विपक्ष की JPC की मांग के आगे झुकेगी सरकार?

FCRA Bill 2026

FCRA Bill 2026 को लेकर संसद में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। विपक्षी दल विधेयक को वापस लेने या इसे ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) के पास भेजने की मांग कर रहे हैं। वहीं सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों के प्रबंधन और FCRA व्यवस्था में मौजूद कानूनी खामियों को दूर करने के लिए हैं। यह विधेयक 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और फिलहाल संसद के विचाराधीन है।

कांग्रेस ने अपने सांसदों को 10, 11 और 12 अगस्त को संसद में मौजूद रहने के लिए व्हिप जारी किया है। पार्टी का कहना है कि वह बिल का विरोध करेगी। वहीं INDIA ब्लॉक 10 अगस्त को बैठक कर यह तय करेगा कि विधेयक का विरोध किस रणनीति के तहत किया जाए। कांग्रेस ने यह भी कहा है कि किसी भी विधेयक पर चर्चा से पहले गृह मंत्री अमित शाह को जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर सदन में बयान देना चाहिए।

FCRA Bill 2026

FCRA बिल पर विपक्ष की आपत्ति क्या है?

विपक्ष का सबसे बड़ा विरोध उस प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म होने पर विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों की जिम्मेदारी सरकार द्वारा नियुक्त Designated Authority को दी जाएगी।

DMK के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने 7 अगस्त को अमित शाह से मुलाकात कर इस मुद्दे पर ज्ञापन दिया। उनका आरोप है कि मौजूदा नियामक व्यवस्था को बिल के जरिए ऐसी व्यवस्था में बदला जा रहा है, जिसमें संस्था की विदेशी फंड से बनी संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण बढ़ जाएगा।

Image: DMK के राज्यसभा सांसद पी. विल्सन

विपक्ष के मुताबिक यदि किसी संस्था का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है, संस्था खुद इसे सरेंडर कर देती है या समय पर रिन्यू नहीं करा पाती, तो उसकी विदेशी फंड से बनी संपत्तियां Designated Authority के नियंत्रण में जा सकती हैं। अगर निर्धारित अवधि में रजिस्ट्रेशन बहाल नहीं हुआ, तो संपत्ति को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल या कुछ परिस्थितियों में बेचने की व्यवस्था प्रस्तावित है। बिक्री से मिली रकम Consolidated Fund of India में जाने का प्रावधान है।

विल्सन का कहना है कि इसका असर केवल NGOs तक सीमित नहीं रहेगा। विदेशी फंड से चलने वाले अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीज, ऐसे संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र और देखभाल गृहों में रहने वाले बुजुर्ग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।

इसी वजह से उन्होंने बिल को पूरी तरह वापस लेने या कम से कम विस्तृत जांच के लिए JPC को भेजने की मांग की है।

 

कांग्रेस और TMC ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा है कि पार्टी बिल का विरोध करेगी और विपक्ष के विरोध के बीच सरकार को इसे पारित नहीं करने दिया जाएगा। कांग्रेस का आरोप है कि बिल NGOs और अल्पसंख्यक संस्थाओं को निशाना बना सकता है।

Image: कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल

तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने भी बिल का विरोध किया है। उनका कहना है कि सरकार NGOs और संस्थाओं के लिए नियमों को कड़ा कर रही है, जबकि RSS के लिए अलग व्यवस्था क्यों होनी चाहिए, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।

विपक्ष ने मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा द्वारा 12 अगस्त को बिल पर चर्चा होने की घोषणा पर भी सवाल उठाया है। विपक्ष का कहना है कि सरकार के आधिकारिक बिजनेस शेड्यूल में उस समय तक FCRA बिल का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसे सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की कमी का संकेत बताया गया।

सरकार का तर्क- FCRA में मौजूद कानूनी खाली जगह भरना

सरकार का कहना है कि FCRA बिल किसी धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य उस स्थिति के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाना है, जब किसी संस्था का FCRA प्रमाणपत्र खत्म हो जाए।

PRS के मुताबिक बिल ऐसी संस्था के विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के लिए निगरानी, प्रबंधन और निपटान की व्यवस्था बनाता है, जिसका FCRA प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या समाप्त हो गया हो।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि संपत्ति का नियंत्रण तुरंत स्थायी रूप से सरकार के पास नहीं चला जाएगा। PIB के अनुसार पहले संपत्ति provisional vesting के तहत Designated Authority के पास जाएगी। यदि संस्था निर्धारित समय में अपना FCRA रजिस्ट्रेशन बहाल करा लेती है, तो विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियां और बची हुई रकम वापस की जा सकती है। स्थायी हस्तांतरण की स्थिति तभी आएगी जब निर्धारित अवधि में रजिस्ट्रेशन बहाल न हो।

धार्मिक स्थलों को लेकर भी सरकार ने कहा है कि Designated Authority को उनकी धार्मिक प्रकृति बनाए रखनी होगी। यानी किसी पूजा स्थल को दूसरी प्रकृति में बदलने या उसका धार्मिक चरित्र खत्म करने की अनुमति नहीं होगी।

 

FCRA कानून आखिर है क्या?

Foreign Contribution (Regulation) Act यानी FCRA वह कानून है, जिसके जरिए भारत में विदेशी चंदे और विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों की निगरानी की जाती है।

FCRA की मौजूदा व्यवस्था का आधार 2010 का कानून है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाले तरीके से न हो। 2026 का संशोधन इसी कानून में बदलाव प्रस्तावित करता है।

इस कानून का इतिहास इससे भी पुराना है। पहली बार FCRA 1976 में लागू किया गया था। इसके बाद 2010 में नया FCRA कानून आया और 2020 में इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

2020 के बदलावों में विदेशी फंड से होने वाले प्रशासनिक खर्च की अधिकतम सीमा 50% से घटाकर 20% करना, विदेशी योगदान को SBI की निर्धारित शाखा में खाते के जरिए प्राप्त करना और एक NGO द्वारा दूसरे NGO को विदेशी फंड ट्रांसफर करने पर रोक जैसे प्रावधान शामिल थे।

2026 में क्या बदलने वाला है?

2026 के प्रस्तावित संशोधन का सबसे अहम हिस्सा विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को लेकर है।

सरकार के मुताबिक FCRA की धारा 15 में 2010 से विदेशी योगदान से बनी संपत्तियों के vesting की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन इन संपत्तियों को अपने कब्जे में लेने, उनकी देखरेख करने और अंत में उनका निपटान करने की विस्तृत प्रक्रिया स्पष्ट नहीं थी। 2026 का बिल इसी प्रक्रिया को कानूनी रूप देने की कोशिश करता है।

इसके अलावा बिल FCRA उल्लंघन के लिए अधिकतम जेल की सजा को 5 साल से घटाकर 1 साल करने का प्रस्ताव भी रखता है। साथ ही prior permission के तहत मिले विदेशी फंड के इस्तेमाल से जुड़ी समयसीमा तय करने का प्रस्ताव है।

 

जून में लागू हो चुके नए FCRA नियमों से बिल अलग क्यों है?

यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। FCRA Rules, 2026 और FCRA Amendment Bill, 2026 एक ही चीज नहीं हैं।

संशोधित FCRA Rules 22 जून 2026 को अधिसूचित होकर लागू हो चुके हैं, जबकि FCRA Amendment Bill अभी संसद में लंबित है। PIB के मुताबिक दोनों मिलकर FCRA प्रशासन में सामने आए ऑपरेशनल और अनुपालन संबंधी मुद्दों को संबोधित करते हैं।

2026 के नियमों में संस्थाओं की गतिविधियों और विदेशी योगदान के इस्तेमाल को लेकर ज्यादा स्पष्ट जानकारी देने की व्यवस्था की गई है। वहीं बिल का मुख्य नया कानूनी ढांचा FCRA प्रमाणपत्र खत्म होने के बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है।

 

ईसाई संस्थाओं को किस बात की चिंता है?

बिल को लेकर ईसाई संगठनों और कुछ राज्यों में भी चिंता सामने आई है। उनका डर है कि FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म होने या रिन्यू नहीं होने की स्थिति में वर्षों से विदेशी फंड से बनाई गई जमीन, भवन, स्कूल, अस्पताल और दूसरी संपत्तियां उनके नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं।

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया यानी CBCI ने भी गृह मंत्री अमित शाह के सामने अपनी चिंताएं रखी थीं। संगठन ने आशंका जताई कि प्रशासनिक या दस्तावेजी गलतियों जैसी वजहों से किसी संस्था का लाइसेंस प्रभावित होने पर बहुत कठोर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

हालांकि गृह मंत्री अमित शाह ने ईसाई संगठनों को आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन धर्म-निरपेक्ष यानी religion-neutral है। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा से मुलाकात के बाद यह भी कहा गया कि बिल का पिछली घटनाओं पर यानी retrospective प्रभाव नहीं होगा।

 

अमेरिकी सांसद ने बिल को ईसाइयों पर हमला बताया

विवाद संसद से बाहर भी पहुंच गया है। अमेरिकी सांसद रिले एम. मूर ने 4 अगस्त को सोशल मीडिया पोस्ट में FCRA बिल को भारत में ईसाइयों के खिलाफ सीधा हमला बताया था। उन्होंने दावा किया कि प्रस्तावित बदलाव सरकार को चर्च और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर ज्यादा नियंत्रण दे सकते हैं और चेतावनी दी कि इससे भारत-अमेरिका संबंध प्रभावित हो सकते हैं।

भारत ने इस टिप्पणी को खारिज कर दिया है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि FCRA संशोधन भारत का आंतरिक मामला है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में विदेशी फंड और विदेशी योगदान को नियंत्रित करने के लिए अपने कानून और नियम मौजूद हैं।

 

क्या सरकार के पास बिल पास कराने के लिए पर्याप्त संख्या है?

FCRA Amendment Bill एक सामान्य विधेयक है, इसलिए इसे पारित करने के लिए संविधान में निर्धारित सामान्य विधायी प्रक्रिया के तहत साधारण बहुमत की जरूरत होगी। हालांकि वास्तविक वोटिंग के समय सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या महत्वपूर्ण होगी।

यहां एक जरूरी सावधानी है: आपके दिए आंकड़ों में NDA की लोकसभा और राज्यसभा संख्या बताई गई है, लेकिन इन्हें मौजूदा आधिकारिक संसदीय स्थिति से दोबारा मिलाए बिना निश्चित संख्या के रूप में इस्तेमाल करना ठीक नहीं होगा। इसलिए इस हिस्से में मुख्य बात यह है कि सरकार के पास दोनों सदनों में बिल पारित कराने की पर्याप्त राजनीतिक ताकत होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन विपक्ष के विरोध और संभावित व्यवधान से प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

 

अब संसद में आगे क्या होगा?

FCRA बिल फिलहाल संसद में विचाराधीन है। विपक्ष इसे वापस लेने या JPC के पास भेजने की मांग कर रहा है, जबकि सरकार इसे कानूनी और प्रशासनिक खामियां दूर करने वाला संशोधन बता रही है।

10 अगस्त से संसद में इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना है। कांग्रेस ने अपने सांसदों को 10 से 12 अगस्त तक सदन में मौजूद रहने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर, विपक्ष की मांग है कि पहले जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर गृह मंत्री अमित शाह सदन में बयान दें।

यानी आने वाले दिनों में FCRA Bill 2026 पर बहस सिर्फ विदेशी फंडिंग के नियमों तक सीमित नहीं रहने वाली। इसके केंद्र में NGOs की स्वतंत्रता, विदेशी चंदे की निगरानी, धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं की संपत्तियां, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की नियामक शक्तियों के बीच संतुलन का सवाल भी रहेगा।

 

FAQ

1.  FCRA बिल 2026 क्या है?
यह Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010 में संशोधन का प्रस्ताव है। इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान उन संस्थाओं के विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है, जिनका FCRA प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या समाप्त हो जाता है।

 

2. विपक्ष FCRA बिल को वापस लेने की मांग क्यों कर रहा है?
विपक्ष को चिंता है कि Designated Authority को विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर व्यापक नियंत्रण मिलने से NGOs, धार्मिक संस्थाओं, स्कूलों और अस्पतालों पर सरकारी दखल बढ़ सकता है। इसलिए वह बिल वापस लेने या JPC को भेजने की मांग कर रहा है।

 

3. JPC क्या होती है?
JPC यानी Joint Parliamentary Committee संसद की संयुक्त समिति होती है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य शामिल होते हैं। किसी बिल को JPC के पास भेजने का उद्देश्य उसके प्रावधानों की विस्तृत जांच और संबंधित पक्षों से राय लेकर संसद को रिपोर्ट देना होता है।

 

4. FCRA कानून का मुख्य उद्देश्य क्या है?
FCRA का उद्देश्य भारत में आने वाले विदेशी योगदान को नियंत्रित करना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा के खिलाफ न हो।

 

5. बिल पास होने पर NGO की पूरी संपत्ति सरकार के पास चली जाएगी?
नहीं। प्रस्तावित व्यवस्था विदेशी योगदान से बनी संपत्तियों पर लागू होती है और पहले provisional vesting की व्यवस्था है। अगर संस्था निर्धारित अवधि में अपना FCRA रजिस्ट्रेशन बहाल करा लेती है, तो संबंधित संपत्तियां और बची विदेशी फंड राशि वापस की जा सकती है। स्थायी vesting की स्थिति में भी संपत्तियों का इस्तेमाल सार्वजनिक उद्देश्य के लिए करने का प्रावधान है।

 

6. क्या FCRA बिल केवल ईसाई संस्थाओं पर लागू होगा?
नहीं। सरकार का कहना है कि कानून धर्म-निरपेक्ष है और FCRA के तहत आने वाली सभी पात्र संस्थाओं पर समान रूप से लागू होगा। ईसाई संगठनों ने इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है, लेकिन बिल किसी एक धर्म के लिए अलग प्रावधान नहीं बनाता।