सोना-चांदी खरीदना हुआ और भी महंगा: सरकार ने इम्पोर्ट ड्यूटी 6% से बढ़ाकर की 15%, जानें आप पर क्या होगा असर

भारत में सोना सिर्फ एक धातु नहीं माना जाता। यह शादी-ब्याह, परंपरा, बचत, निवेश और परिवार की सुरक्षा से जुड़ा हुआ हिस्सा है। गांव से लेकर शहर तक, हर घर में सोने को आर्थिक मजबूती का प्रतीक माना जाता है। लेकिन अब केंद्र सरकार ने सोने और चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर बड़ा आर्थिक संदेश दिया है। सरकार ने गोल्ड और सिल्वर पर आयात शुल्क 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की है कि वे कुछ समय तक सोने की खरीद टालें और गैर-जरूरी विदेशी खर्च कम करें।

सरकार का यह कदम ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भारत के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। सरकार का कहना है कि फिलहाल देश को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने की जरूरत है और गैर-जरूरी आयात कम करना जरूरी हो गया है। लेकिन दूसरी तरफ ज्वेलरी इंडस्ट्री का मानना है कि सोने की खरीद रोकना समाधान नहीं है, क्योंकि इससे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है।

 

सरकार ने अचानक इंपोर्ट ड्यूटी क्यों बढ़ाई?

वित्त मंत्रालय की तरफ से जारी नोटिफिकेशन में सोने और चांदी पर सोशल वेलफेयर सरचार्ज (SWS) और एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस (AIDC) बढ़ाया गया है। इसके बाद गोल्ड और सिल्वर पर प्रभावी कस्टम ड्यूटी 15% हो गई। प्लेटिनम पर भी शुल्क 6.4% से बढ़ाकर 15.4% कर दिया गया है।

सरकार का मानना है कि इस समय भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल जरूरी चीजों के आयात के लिए करना चाहिए। इनमें कच्चा तेल, उर्वरक, रक्षा उपकरण, इंडस्ट्रियल मशीनरी और जरूरी तकनीक शामिल हैं। क्योंकि वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है।

दरअसल भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। तेल महंगा होने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है। ऐसे में अगर सोने जैसे गैर-जरूरी आयात भी लगातार बढ़ते रहें, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और बढ़ सकता है।

 

पीएम मोदी ने लोगों से क्या अपील की?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से अपील की थी कि वे विदेशी मुद्रा बचाने के लिए कुछ समय तक सोना खरीदने से बचें। उन्होंने पेट्रोल-डीजल की बचत करने, ज्यादा सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने और गैर-जरूरी विदेश यात्राएं टालने की भी सलाह दी।

पीएम मोदी ने कहा कि भारत को मुश्किल वैश्विक परिस्थितियों के बीच अपनी आर्थिक मजबूती बनाए रखनी होगी। इसलिए हर नागरिक को जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। उनका कहना था कि अगर लोग कुछ समय तक सोने की खरीद कम करते हैं, तो इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटेगा।

 

आखिर सोना भारत के लिए इतनी बड़ी चिंता क्यों है?

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड कंज्यूमर है। चीन के बाद सबसे ज्यादा सोना भारत में खरीदा जाता है। लेकिन भारत में सोने का उत्पादन बहुत कम होता है। इसलिए घरेलू मांग पूरी करने के लिए भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है।

2025-26 में भारत का गोल्ड इंपोर्ट 24% बढ़कर रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया। दिलचस्प बात यह है कि सोने की मात्रा में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमतें तेजी से बढ़ने के कारण आयात बिल काफी बढ़ गया।

FY25 में सोने की कीमत करीब 76,617 डॉलर प्रति किलो थी, जो FY26 में बढ़कर लगभग 99,825 डॉलर प्रति किलो तक पहुंच गई। इसका मतलब यह हुआ कि भारत को समान मात्रा का सोना खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़े।

भारत के कुल आयात बिल में कच्चे तेल के बाद सोना दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि सरकार इसे विदेशी मुद्रा पर बोझ मान रही है।

government increased import duty from 6% to 15%

रुपए पर दबाव क्यों बढ़ रहा है?

पश्चिम एशिया संकट और तेल कीमतों में उछाल का असर भारतीय रुपए पर भी दिखाई दे रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। जब भारत ज्यादा आयात करता है, तो उसे ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आयात लगातार बढ़ते रहे, तो चालू खाता घाटा यानी Current Account Deficit (CAD) बढ़ सकता है। इससे महंगाई और मुद्रा विनिमय दर दोनों पर असर पड़ता है।

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी गिरावट देखी गई है। RBI के आंकड़ों के अनुसार फरवरी में भारत का फॉरेक्स रिजर्व लगभग 728 अरब डॉलर था, जो घटकर करीब 690 अरब डॉलर रह गया।

 

सरकार की नजर सिर्फ सोने पर नहीं, पूरे आर्थिक संतुलन पर

सरकार का कहना है कि यह फैसला सिर्फ गोल्ड इंपोर्ट रोकने के लिए नहीं बल्कि पूरे आर्थिक संतुलन को संभालने के लिए लिया गया है। तेल महंगा हो रहा है, वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित है और समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है, वहां तनाव बढ़ने से भारत की चिंता और बढ़ गई है। भारत अपनी जरूरत का करीब 87% कच्चा तेल आयात करता है। इनमें से लगभग 46% शिपमेंट इसी समुद्री मार्ग से आते हैं।

अगर तेल की कीमतें और बढ़ती हैं, तो भारत का आयात बिल और ज्यादा बढ़ जाएगा। ऐसे में सरकार चाहती है कि गैर-जरूरी आयात कम किए जाएं ताकि जरूरी क्षेत्रों के लिए डॉलर बचाया जा सके।

 

सोने की कीमतों पर क्या असर पड़ा?

इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने के बाद घरेलू बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में तेजी देखी गई। MCX पर गोल्ड लगभग 1.63 लाख रुपए तक पहुंच गया, जबकि सिल्वर करीब 2.96 लाख रुपए तक पहुंच गई।

दिल्ली बाजार में सोने के दाम करीब 1,500 रुपए प्रति 10 ग्राम बढ़ गए। वहीं चांदी में भी भारी उछाल देखा गया।

क्योंकि भारत ज्यादातर सोना विदेशों से खरीदता है, इसलिए आयात शुल्क बढ़ने का सीधा असर ग्राहकों पर पड़ता है। ज्वेलर्स अतिरिक्त लागत ग्राहकों से वसूलते हैं, जिससे गहने और महंगे हो जाते हैं।

 

ज्वेलरी इंडस्ट्री क्यों नाराज है?

ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (AIJGF) ने सरकार की चिंता को सही बताया, लेकिन कहा कि सोने की खरीद को हतोत्साहित करना सही समाधान नहीं है।

फेडरेशन का कहना है कि अगर लोग अचानक सोना खरीदना कम कर देंगे, तो इसका असर छोटे ज्वेलर्स, कारीगरों, कलाकारों और लाखों कामगारों पर पड़ेगा। भारत में करोड़ों लोग जेम्स और ज्वेलरी सेक्टर से जुड़े हुए हैं।

इंडस्ट्री का कहना है कि भारत में सोना सिर्फ लग्जरी प्रोडक्ट नहीं है। यह लोगों की बचत और आर्थिक सुरक्षा का हिस्सा है। गांवों में कई परिवार जरूरत पड़ने पर सोना गिरवी रखकर पैसे जुटाते हैं। शादी-ब्याह में भी सोने का खास महत्व होता है।

फेडरेशन ने सरकार को सुझाव दिया कि लोगों को सोना खरीदने से रोकने के बजाय देश के अंदर मौजूद निष्क्रिय सोने को बाजार में लाने पर काम किया जाए।

 

गोल्ड रीसाइक्लिंग पर क्यों जोर दिया जा रहा?

ज्वेलरी इंडस्ट्री का मानना है कि भारत के घरों, लॉकरों और मंदिरों में भारी मात्रा में सोना पड़ा हुआ है, जो आर्थिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले रहा।

इसीलिए इंडस्ट्री ने गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को मजबूत बनाने की बात कही है। इस योजना के तहत लोग अपना सोना बैंकों में जमा कर सकते हैं और उस पर ब्याज कमा सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत आयात कम करना चाहता है, तो पुराने सोने की रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना होगा। इससे नया सोना विदेशों से कम खरीदना पड़ेगा।

आजकल कई लोग पुराने गहनों को नए डिजाइन में बदलवा रहे हैं। टूटी चेन, पुराने हार या इस्तेमाल न होने वाले गहनों को पिघलाकर नया ज्वेलरी बनवाना अब आम होता जा रहा है।

 

अगर लोग सच में सोना खरीदना कम कर दें तो क्या होगा?

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर भारत में सोने की मांग कुछ समय के लिए घटती है, तो देश का आयात बिल कम हो सकता है। इससे चालू खाता घाटा घटेगा और रुपए पर दबाव भी कम होगा।

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार अगर भारत केवल 10% कम सोना खरीदे, तो अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है।

हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है। अगर खरीदारी बहुत ज्यादा घट गई, तो ज्वेलरी उद्योग में काम करने वाले लाखों लोगों की आय प्रभावित हो सकती है। छोटे ज्वेलर्स और कारीगरों के लिए यह बड़ा झटका साबित हो सकता है।

 

क्या यह फैसला लंबे समय तक रहेगा?

फिलहाल सरकार ने यह कदम वैश्विक हालात को देखते हुए उठाया है। इससे पहले भी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सोने पर आयात शुल्क बढ़ाया गया था।

अब सवाल यह है कि क्या भारत धीरे-धीरे सोने पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है? या फिर यह सिर्फ अस्थायी आर्थिक रणनीति है?

क्योंकि भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं, भावनाओं और परंपराओं से भी जुड़ा है। ऐसे में सरकार की अपील और लोगों की आदतों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।