India Europe Israel Alliance: भारत, UAE और यूरोप को एक साथ लाने की तैयारी – आखिर इज़राइल क्यों बनाना चाहता है नया सुरक्षा गठबंधन?

India Europe Israel Alliance

India Europe Israel Alliance: इज़राइल ने पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा माहौल के बीच एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे (Regional Security Architecture) का प्रस्ताव रखा है। इज़राइल के रक्षा मंत्रालय के महानिदेशक (Director General) अमीर बाराम ने कहा है कि अब समय आ गया है कि भारत से लेकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ग्रीस, साइप्रस, यूरोप और अमेरिका तक एक व्यापक रणनीतिक गठबंधन तैयार किया जाए। उनका मानना है कि ईरान की बढ़ती सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय अस्थिरता ने कई देशों के साझा हितों को एक मंच पर ला दिया है। इसलिए इज़राइल को अपनी सैन्य तैयारी के साथ-साथ नए सुरक्षा साझेदारों का दायरा भी बढ़ाना चाहिए।

यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में हालिया युद्धों और ईरान से जुड़े तनावों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। इज़राइल का मानना है कि केवल सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी भी उतनी ही जरूरी है।

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भारत से यूरोप तक गठबंधन की बात क्यों हो रही है?

तेल अवीव स्थित राइखमैन यूनिवर्सिटी में आयोजित हर्ज़लिया कॉन्फ्रेंस (Herzliya Conference) में अमीर बाराम ने कहा कि हालिया संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान की सैन्य क्षमताओं की कीमत पूरे क्षेत्र को चुकानी पड़ रही है। इसी कारण भारत, यूएई, ग्रीस, साइप्रस और अन्य देशों के बीच साझा सुरक्षा हित विकसित हुए हैं।

उन्होंने कहा कि इज़राइल को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ ऐसा क्षेत्रीय गठबंधन तैयार करना चाहिए जो भारत से शुरू होकर यूएई, ग्रीस और साइप्रस के रास्ते यूरोप तक फैले। उनका मानना है कि यह केवल सैन्य सहयोग नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी का भी नया मॉडल हो सकता है।

IMEC कॉरिडोर से कैसे जुड़ता है यह प्रस्ताव?

बाराम का प्रस्ताव उस India-Middle East-Europe Economic Corridor (IMEC) से भी मेल खाता है, जिसकी घोषणा 2023 में नई दिल्ली में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन के दौरान की गई थी।

IMEC का उद्देश्य भारत, खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापार, परिवहन, ऊर्जा और डिजिटल कनेक्टिविटी को मजबूत बनाना है। इज़राइल का मानना है कि यदि इसी आर्थिक गलियारे के साथ सुरक्षा सहयोग भी जुड़ जाए तो पूरे क्षेत्र में स्थिरता और रणनीतिक संतुलन मजबूत हो सकता है।

 

ईरान को लेकर इज़राइल की सबसे बड़ी चिंता क्या है?

अमीर बाराम ने दावा किया कि दुनिया में जिन नए समझौतों पर चर्चा चल रही है, उनसे ईरान को अरबों डॉलर की आर्थिक राहत मिल सकती है। उनके अनुसार यदि ऐसा होता है तो ईरान अपनी सैन्य क्षमता को पहले से कहीं अधिक तेजी से मजबूत कर सकता है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच हालिया समझौते (MoU) के तहत ईरान की जमी हुई संपत्तियों को जारी करने और पुनर्निर्माण के लिए बड़े आर्थिक पैकेज की चर्चा हो रही है। इज़राइल को आशंका है कि इस धन का उपयोग भविष्य में सैन्य ताकत बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।

इसी वजह से उन्होंने इज़राइल से समय रहते अपनी सैन्य तैयारियां और क्षेत्रीय साझेदारी दोनों मजबूत करने की अपील की।

 

अमेरिका और इज़राइल के रिश्तों को लेकर क्या कहा गया?

बाराम ने कहा कि अमेरिका और इज़राइल दोनों ईरान को चुनौती मानते हैं, लेकिन दोनों की प्राथमिकताएं अलग हैं। उनके अनुसार इज़राइल के लिए ईरान अस्तित्व का सवाल (Existential Threat) है, जबकि अमेरिका के लिए यह एक क्षेत्रीय चुनौती है। अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीतिक प्राथमिकता चीन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र बना हुआ है।

उन्होंने कहा, “हम तेहरान के बारे में सोचते हैं, जबकि अमेरिका ताइवान के बारे में सोचता है।”

बाराम का मानना है कि अमेरिका की “America First” नीति को देखते हुए भविष्य का अमेरिका-इज़राइल सुरक्षा समझौता केवल साझा मूल्यों पर नहीं बल्कि दोनों देशों के व्यावहारिक और रणनीतिक हितों पर आधारित होना चाहिए।

 

नया सुरक्षा गठबंधन कैसे काम कर सकता है?

बाराम के अनुसार इज़राइल के पास अत्याधुनिक रक्षा तकनीक, युद्ध का व्यावहारिक अनुभव और रक्षा नवाचार (Defence Innovation) है। वहीं खाड़ी देशों के पास आर्थिक संसाधन और निवेश क्षमता है।

यदि दोनों की ताकत एक साथ आती है तो भारत, यूएई, इज़राइल, ग्रीस, साइप्रस और अमेरिका के बीच एक ऐसा सुरक्षा और आर्थिक नेटवर्क बनाया जा सकता है जो पूरे क्षेत्र की स्थिरता को मजबूत करेगा।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव अमेरिका के साथ इज़राइल की साझेदारी का विकल्प नहीं है, बल्कि उसका विस्तार है जिससे इज़राइल की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी।

 

भारत की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है?

पिछले कुछ वर्षों में भारत और इज़राइल के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। दोनों देश रक्षा उपकरणों, मिसाइल प्रणालियों, ड्रोन, साइबर सुरक्षा, कृषि तकनीक और उच्च प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं।

इज़राइल का मानना है कि भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की प्रमुख शक्ति है और पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप तक बनने वाले किसी भी बड़े रणनीतिक नेटवर्क में उसकी भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण होगी।

इसके अलावा भारत पहले से ही अमेरिका, यूएई और इज़राइल के साथ I2U2 समूह का सदस्य है, जबकि IMEC जैसी परियोजना भी भारत को इस पूरे क्षेत्रीय ढांचे का अहम हिस्सा बनाती है।

 

क्या इस गठबंधन के सामने चुनौतियां भी हैं?

हालांकि इस प्रस्ताव के सामने कई राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौतियां भी मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब्राहम समझौते (Abraham Accords), I2U2, नेगेव फोरम और IMEC जैसी पहलों का मूल उद्देश्य आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता और शांति रहा है, न कि सैन्य गठबंधन बनाना।

भारत, यूएई और अधिकांश खाड़ी देश किसी भी क्षेत्रीय सैन्य संघर्ष का हिस्सा बनने से बचना चाहते हैं। वहीं सऊदी अरब भी इज़राइल के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने से पहले फिलिस्तीन मुद्दे पर प्रगति चाहता है।

ग्रीस और साइप्रस रक्षा सहयोग के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सकारात्मक हो सकते हैं, लेकिन उन्हें भी नाटो (NATO) और यूरोपीय संघ (EU) की नीतियों का ध्यान रखना होगा।

इसी कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह प्रस्ताव केवल सुरक्षा सहयोग तक सीमित रहता है तो इसकी संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं, लेकिन यदि इसे पूर्ण सैन्य गठबंधन का रूप देने की कोशिश हुई तो कई देशों के लिए इसमें शामिल होना कठिन हो सकता है।

निष्कर्ष

इज़राइल का नया प्रस्ताव केवल एक सैन्य रणनीति नहीं बल्कि पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप और भारत तक फैले व्यापक रणनीतिक सहयोग की सोच को दर्शाता है। इसका उद्देश्य ईरान की बढ़ती सैन्य शक्ति के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और रक्षा साझेदारी को मजबूत करना है।

हालांकि इस विचार के सफल होने के लिए केवल साझा सुरक्षा चिंताएं पर्याप्त नहीं होंगी। इसमें शामिल देशों की अलग-अलग विदेश नीतियां, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और आर्थिक हित भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह प्रस्ताव केवल रणनीतिक चर्चा तक सीमित रहता है या वास्तव में किसी नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे का आधार बनता है।

FAQs:

इज़राइल का मानना है कि ईरान की बढ़ती सैन्य क्षमता के कारण भारत, यूएई, ग्रीस, साइप्रस, यूरोप और अमेरिका के बीच साझा सुरक्षा हित विकसित हुए हैं। इसी कारण उसने व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन का प्रस्ताव रखा है।

इज़राइल का कहना है कि यदि ईरान को बड़े आर्थिक संसाधन मिले तो वह अपनी सैन्य क्षमता और तेज़ी से बढ़ा सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

इसका उद्देश्य रक्षा सहयोग, रणनीतिक साझेदारी, क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना है।

भारत और इज़राइल मिसाइल, ड्रोन, साइबर सुरक्षा, रक्षा तकनीक और सैन्य उपकरणों सहित कई क्षेत्रों में लंबे समय से करीबी रक्षा सहयोग कर रहे हैं।

यदि यह पहल आगे बढ़ती है तो पश्चिम एशिया में नए रणनीतिक और आर्थिक सहयोग का ढांचा विकसित हो सकता है। हालांकि इसकी सफलता क्षेत्रीय राजनीति, अरब देशों के रुख और प्रमुख शक्तियों की विदेश नीति पर निर्भर करेगी।