India Solar Superpower: भारत अब केवल दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल देश नहीं रहा, बल्कि तेजी से उभरती स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने नई दिल्ली में भारत को आधिकारिक रूप से “सोलर सुपरपावर” बताते हुए कहा कि देश की सौर ऊर्जा क्षमता, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी रूप से कुशल युवा कार्यबल उसे वैश्विक Clean Energy Race में विशेष बढ़त देते हैं।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन यानी UNFCCC के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने 21 जुलाई 2026 को दिल्ली में कहा कि 2014 के बाद भारत की स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 50 गुना से ज्यादा बढ़ चुकी है। उन्होंने इसे केवल जलवायु उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था, रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य के औद्योगिक विकास के लिए बड़ी ताकत बताया।
भारत की आधिकारिक सौर क्षमता मार्च 2026 तक 150.26 गीगावाट पहुंच चुकी थी। इसमें करीब 110.43 गीगावाट बड़े ग्रिड से जुड़े सोलर प्रोजेक्ट, 25.73 गीगावाट रूफटॉप सोलर और 14.10 गीगावाट PM-KUSUM तथा ऑफ-ग्रिड परियोजनाओं से जुड़ी क्षमता शामिल थी। अकेले वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने रिकॉर्ड 44.61 गीगावाट नई सौर क्षमता जोड़ी, जो उससे पिछले वर्ष जोड़ी गई क्षमता से लगभग दोगुनी थी।

UN ने कहा- रिकॉर्ड बन चुका है, लेकिन असली कहानी अभी शुरू हुई
भारत की स्वच्छ ऊर्जा प्रगति को समझाने के लिए साइमन स्टील ने क्रिकेट का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि भारत की Clean Energy Growth सचिन तेंदुलकर और युवा खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी के संयुक्त प्रदर्शन जैसी है। यानी एक ओर शानदार रिकॉर्ड बन चुका है, वहीं दूसरी ओर भविष्य की पूरी संभावना अभी सामने आनी बाकी है।
उनका संदेश था कि भारत ने अब तक बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन यदि देश Renewable Energy, बैटरी स्टोरेज, स्मार्ट ग्रिड, इलेक्ट्रिक वाहन और Green Manufacturing में निवेश जारी रखता है तो वह अगले औद्योगिक बदलाव का नेतृत्व कर सकता है।
स्टील ने भारत की युवा आबादी, इंजीनियरों, IT विशेषज्ञों और तकनीकी पेशेवरों को देश की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी ताकत बताया। उनके अनुसार सोलर पैनल और विंड टर्बाइन जरूरी हैं, लेकिन उन्हें बनाने, चलाने, डिजिटल ग्रिड से जोड़ने और नई तकनीक विकसित करने वाला मानव संसाधन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
3 गीगावाट से 150 गीगावाट तक पहुंचा भारत
वर्ष 2014 में भारत की स्थापित सौर क्षमता करीब 3 गीगावाट थी। जनवरी 2026 तक यह बढ़कर लगभग 140 गीगावाट और मार्च 2026 तक 150.26 गीगावाट पहुंच गई। इस तरह लगभग 12 वर्षों में क्षमता 50 गुना से ज्यादा बढ़ी है।

यह बढ़ोतरी बड़े सोलर पार्कों तक सीमित नहीं रही। गांवों में सोलर पंप, घरों पर रूफटॉप पैनल, रेलवे और सरकारी इमारतों में सौर ऊर्जा तथा औद्योगिक कंपनियों के कैप्टिव सोलर प्लांट भी इस विस्तार का हिस्सा बने हैं।
पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना (PMSG) ने घरेलू रूफटॉप सोलर को बढ़ावा दिया, जबकि PM-KUSUM के माध्यम से किसानों के लिए सोलर पंप और कृषि फीडरों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का काम हुआ। दिसंबर 2025 तक करीब 24 लाख घर PM Surya Ghar योजना से जुड़ चुके थे और लगभग 7 गीगावाट रूफटॉप क्षमता स्थापित हो चुकी थी।
पांच साल पहले पूरा हुआ गैर-जीवाश्म ऊर्जा का लक्ष्य
भारत ने अपने जलवायु लक्ष्यों के तहत वर्ष 2030 तक कुल स्थापित बिजली क्षमता का करीब 50% हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य रखा था। इसमें सौर, पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं।
भारत ने यह लक्ष्य 2030 से लगभग पांच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया। वर्ष 2025 के दौरान देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 50% के पार पहुंच गई। इसे भारत के Updated Nationally Determined Contribution यानी NDC की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में माना गया।
यहां यह समझना जरूरी है कि Installed Capacity और वास्तविक बिजली उत्पादन अलग आंकड़े हैं। सौर और पवन संयंत्रों की स्थापित क्षमता कुल क्षमता का बड़ा हिस्सा हो सकती है, लेकिन रात, मौसम और ग्रिड की मांग के कारण वास्तविक बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी अब भी काफी अधिक रहती है।
इसलिए भारत के Energy Transition का अगला चरण केवल नए सोलर प्लांट लगाने तक सीमित नहीं रहेगा। बैटरी स्टोरेज, पम्प्ड हाइड्रो, मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और बिजली की मांग को स्मार्ट तरीके से नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी होगा।
सोलर पैनल बनाने की क्षमता में भी बड़ा उछाल
भारत ने पिछले दशक में केवल सौर बिजली उत्पादन नहीं बढ़ाया, बल्कि Solar Manufacturing को भी रणनीतिक उद्योग के रूप में विकसित किया है।

वर्ष 2014 में देश की सोलर मॉड्यूल बनाने की क्षमता करीब 2.3 गीगावाट थी। अगस्त 2025 तक Approved List of Models and Manufacturers के अंतर्गत यह क्षमता 100 गीगावाट पार कर गई थी। दिसंबर 2025 तक घरेलू ALMM मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता लगभग 144 गीगावाट सालाना हो गई।
साइमन स्टील ने IRENA के नए आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यापक Solar Manufacturing Capacity वर्ष 2014 की तुलना में करीब 75 गुना बढ़ी है। अलग-अलग रिपोर्टों में उत्पादन क्षमता की गणना मॉड्यूल, सेल, वेफर और पूरी सप्लाई चेन के आधार पर अलग हो सकती है, इसलिए इस 75 गुना आंकड़े को UN जलवायु प्रमुख द्वारा दिए गए IRENA संदर्भ के रूप में देखना चाहिए।
सरकार ने High-Efficiency Solar PV Modules के लिए Production Linked Incentive योजना में कुल ₹24,000 करोड़ का प्रावधान किया है। इसका उद्देश्य देश में बड़े स्तर पर मॉड्यूल, सेल और आगे चलकर पूरी सोलर सप्लाई चेन का घरेलू निर्माण बढ़ाना है।
सस्ती सौर बिजली ने भारत को दी वैश्विक बढ़त
UN जलवायु प्रमुख ने IRENA के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बिजली उत्पादन लागत के आधार पर भारत दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी सौर बाजारों में शामिल है। बड़े स्तर की परियोजनाओं, कम निर्माण लागत, प्रतिस्पर्धी नीलामी और बेहतर सौर संसाधनों के कारण भारत में सोलर बिजली की कीमत कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से कम रही है।
भारत में सोलर टैरिफ पिछले एक दशक में तेजी से नीचे आए हैं। इससे बिजली वितरण कंपनियों, उद्योगों और उपभोक्ताओं के लिए Renewable Energy पहले के मुकाबले अधिक आर्थिक विकल्प बन गई है।
हालांकि केवल कम नीलामी कीमत को अंतिम बिजली लागत नहीं माना जा सकता। सौर ऊर्जा को चौबीस घंटे उपलब्ध कराने के लिए बैटरी, ट्रांसमिशन और ग्रिड बैलेंसिंग की लागत भी जोड़नी पड़ती है। इसलिए भविष्य की प्रतिस्पर्धा सबसे सस्ता सोलर पैनल लगाने से आगे बढ़कर सबसे भरोसेमंद और कम लागत वाली Clean Power Supply देने की होगी।
Renewable Energy से बचा अरबों डॉलर का ईंधन आयात
साइमन स्टील ने कहा कि सौर और दूसरी Renewable Energy के कारण भारत ने पिछले वर्ष जीवाश्म ईंधन की खरीद पर करीब 18 अरब डॉलर की बचत की। उन्होंने इसे भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में बड़ी उपलब्धि बताया।
IRENA की 2024 लागत रिपोर्ट में भारत के लिए करीब 14.9 अरब डॉलर की जीवाश्म ईंधन लागत बचत का अनुमान दिया गया था। UN भाषण में इस्तेमाल 18 अरब डॉलर का आंकड़ा बाद के वर्ष या नए IRENA डेटा से संबंधित बताया गया है। इसलिए दोनों आंकड़े अलग रिपोर्टिंग अवधियों से जुड़े हो सकते हैं।

भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। वैश्विक युद्ध, समुद्री रास्तों में बाधा या तेल उत्पादक देशों के फैसलों से अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने पर भारत का आयात बिल, पेट्रोल-डीजल, परिवहन और उर्वरक की लागत प्रभावित होती है।
स्टील ने कहा कि हर नया सोलर पैनल भारत को विदेशी तेल और गैस बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव से कुछ हद तक बचाता है। उनके अनुसार Clean Energy केवल जलवायु नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता का विषय भी है।
युवा इंजीनियर बन सकते हैं भारत की सबसे बड़ी सोलर ताकत
भारत के पास बड़ी संख्या में इंजीनियर, सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल, डेटा विशेषज्ञ और तकनीकी कर्मचारी हैं। साइमन स्टील ने इसी Skilled Workforce को भारत का सबसे बड़ा Competitive Advantage बताया।
सौर उद्योग को केवल फैक्ट्री में पैनल जोड़ने वाले कर्मचारियों की जरूरत नहीं होती। इसमें सेमीकंडक्टर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, इन्वर्टर, बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, AI आधारित Grid Management, Cybersecurity और बिजली की मांग का पूर्वानुमान लगाने वाले विशेषज्ञ भी चाहिए।
भारत पहले से IT Services और Digital Infrastructure का बड़ा वैश्विक केंद्र है। यदि यही क्षमता Smart Grid और Clean Energy Software से जुड़ती है तो भारतीय कंपनियां केवल घरेलू बाजार ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों को भी तकनीक और सेवाएं निर्यात कर सकती हैं।
Green Steel, Green Hydrogen, Electric Vehicles, Battery Manufacturing और सोलर उपकरणों का निर्माण रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकता है। स्टील के अनुसार यही क्षेत्र भारत को Clean Technology Manufacturing Hub बनाने में मदद कर सकते हैं।
EV बाजार में भारतीय कंपनियों ने संभाली कमान
साइमन स्टील ने भारत के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार का उल्लेख करते हुए Tata Motors, Mahindra & Mahindra और JSW MG Motor India जैसी कंपनियों को घरेलू Clean Mobility Growth के प्रमुख उदाहरणों में शामिल किया।
इलेक्ट्रिक वाहन ऊर्जा संक्रमण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, क्योंकि इनसे पेट्रोल और डीजल की मांग कम हो सकती है। हालांकि EV का वास्तविक जलवायु लाभ इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसकी बैटरी चार्ज करने वाली बिजली किस स्रोत से बनी है।
जैसे-जैसे बिजली ग्रिड में सौर, पवन और दूसरी गैर-जीवाश्म ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ती है, वैसे-वैसे इलेक्ट्रिक वाहन का कुल उत्सर्जन भी कम होता है।
राज्यों की EV नीतियां, चार्जिंग स्टेशन, बैटरी स्वैपिंग और सार्वजनिक परिवहन का विद्युतीकरण इस बदलाव को तेज कर सकते हैं। दिल्ली सहित कई राज्यों ने इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय प्रोत्साहन और चार्जिंग ढांचे पर काम किया है।
दुनिया में Clean Energy पर हुआ 2 ट्रिलियन डॉलर का निवेश
साइमन स्टील ने कहा कि दुनिया में Clean Energy, Grid और Green Infrastructure एक नई औद्योगिक क्रांति का आधार बन रहे हैं। वर्ष 2025 के दौरान वैश्विक स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा में करीब 2 ट्रिलियन डॉलर का निवेश हुआ।
भारत के लिए इसका अर्थ केवल विदेशी निवेश आकर्षित करना नहीं है। देश घरेलू उत्पादन, रिसर्च, डिजाइन, इंजीनियरिंग और निर्यात के माध्यम से इस ग्लोबल मार्केट का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकता है।
सोलर मॉड्यूल, बैटरी, इलेक्ट्रोलाइजर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्ट मीटर जैसे क्षेत्रों में मांग तेजी से बढ़ने की संभावना है। इन क्षेत्रों में मजबूत घरेलू सप्लाई चेन बनने पर भारत आयात पर निर्भरता कम करने के साथ निर्यात भी बढ़ा सकता है।
भारत ने मार्च 2026 तक 150 गीगावाट से ज्यादा सोलर क्षमता स्थापित कर दी है, लेकिन 2030 तक कुल 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य पाने के लिए आने वाले वर्षों में भी रिकॉर्ड गति से परियोजनाएं जोड़नी होंगी।
कोयले पर निर्भरता बनी भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती
सौर ऊर्जा में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के बावजूद भारत की बिजली व्यवस्था अब भी कोयले पर काफी निर्भर है। कोयला आधारित बिजली संयंत्र ग्रिड को लगातार उपलब्ध होने वाली बेसलोड और मांग के समय बिजली प्रदान करते हैं।
सौर ऊर्जा केवल दिन के समय बनती है और बादल या मौसम से प्रभावित हो सकती है। पवन ऊर्जा भी हवा की गति पर निर्भर करती है। इसलिए इनके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए Energy Storage और लचीले Grid Infrastructure की जरूरत होती है।
UN जलवायु प्रमुख ने भारत से कोयले पर निर्भरता तेजी से कम करने और Clean Energy Transition को आगे बढ़ाने की अपील की। उन्होंने चेतावनी दी कि लगातार कोयला, तेल और गैस जलाने से दुनिया खतरनाक Climate Tipping Points की ओर बढ़ रही है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह तेजी से बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करते हुए उत्सर्जन भी कम करे। देश को औद्योगिक विकास, रोजगार और सस्ती बिजली की जरूरत है, इसलिए Energy Transition को चरणबद्ध और न्यायसंगत बनाना जरूरी होगा।
हीटवेव और अनियमित मानसून से अर्थव्यवस्था पर खतरा
साइमन स्टील ने कहा कि एशिया में भीषण गर्मी लोगों की जान, काम और आय को प्रभावित कर रही है। अनियमित मानसून तथा El Niño जैसी जलवायु घटनाएं कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों के लिए जोखिम पैदा करती हैं।
भारत की बड़ी आबादी कृषि, निर्माण और खुले वातावरण में होने वाले काम पर निर्भर है। ज्यादा तापमान में मजदूरों की उत्पादकता घट सकती है और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ सकता है।
बारिश का समय बदलने, लंबे सूखे और अचानक अत्यधिक वर्षा से किसानों की फसल प्रभावित होती है। उत्पादन कम होने पर खाद्य महंगाई बढ़ सकती है, जिसका सबसे ज्यादा असर कम आय वाले परिवारों पर पड़ता है।
इसी कारण UN का तर्क है कि Climate Action केवल भविष्य के तापमान को नियंत्रित करने की नीति नहीं, बल्कि वर्तमान आर्थिक नुकसान और घरेलू खर्च को कम करने का तरीका भी है।
विकसित देशों से वित्तीय वादे पूरे करने की मांग
साइमन स्टील ने कहा कि भारत और दूसरे विकासशील देशों की ऊर्जा परिवर्तन यात्रा को तेज करने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त और तकनीकी सहयोग जरूरी है।
उन्होंने विकसित देशों को याद दिलाया कि उन्हें जलवायु वित्त से जुड़े अपने वादे पूरे करने होंगे। नए वैश्विक वित्त लक्ष्य के तहत विकासशील देशों के लिए वर्ष 2035 तक कम से कम 300 अरब डॉलर सालाना जुटाने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके साथ सार्वजनिक और निजी स्रोतों को मिलाकर विकासशील देशों के लिए कुल जलवायु वित्त को 2035 तक 1.3 ट्रिलियन डॉलर सालाना तक पहुंचाने की व्यापक दिशा तय की गई है। यह राशि Clean Energy के साथ बाढ़, सूखा, समुद्री स्तर बढ़ने और दूसरी जलवायु आपदाओं से बचाव पर खर्च की जानी है।
स्टील ने Adaptation Finance को तीन गुना करने की जरूरत पर भी जोर दिया। Adaptation का अर्थ उन उपायों से है, जिनसे देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए खुद को तैयार करते हैं, जैसे बाढ़ सुरक्षा, सूखा-रोधी कृषि, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचा।
UN Carbon Market से खुल सकता है नई कमाई का रास्ता
संयुक्त राष्ट्र के तहत तैयार किया गया नया वैश्विक Carbon Market विकासशील देशों के लिए अतिरिक्त वित्त का स्रोत बन सकता है।

इस व्यवस्था के तहत उत्सर्जन कम करने वाली सत्यापित परियोजनाएं Carbon Credits तैयार कर सकती हैं। दूसरे देश या कंपनियां अपने उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इन क्रेडिट्स को खरीद सकते हैं।
भारत में सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कचरे से ऊर्जा, जंगल संरक्षण और औद्योगिक दक्षता से जुड़े प्रोजेक्ट कार्बन बाजार से लाभ उठा सकते हैं।
हालांकि Carbon Market की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उत्सर्जन में कमी वास्तविक, अतिरिक्त और पारदर्शी हो। गलत गणना या एक ही कमी को दो बार गिनने से बाजार की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
International Solar Alliance ने भारत को दी वैश्विक पहचान
International Solar Alliance यानी ISA भारत और फ्रांस की संयुक्त पहल के रूप में 2015 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा संपन्न देशों के बीच तकनीकी सहयोग, निवेश और परियोजनाओं को बढ़ावा देना है।
ISA का मुख्यालय गुरुग्राम में है। यह भारत में मुख्यालय वाला प्रमुख अंतर-सरकारी संगठन है और विकासशील देशों में सोलर परियोजनाओं, क्षमता निर्माण तथा वित्तीय सहयोग पर काम करता है।
भारत के लिए ISA केवल जलवायु मंच नहीं है। इसके माध्यम से भारतीय कंपनियों, तकनीकी संस्थानों और विशेषज्ञों को अफ्रीका, एशिया, प्रशांत तथा दूसरे विकासशील क्षेत्रों में काम करने के अवसर मिल सकते हैं।
अन्तरराष्ट्रीय सौर गठबन्धन भारत की सोलर डिप्लोमेसी का प्रमुख आधार बन चुका है। इससे देश को वैश्विक जलवायु वार्ताओं में अपनी पहचान केवल बड़े उत्सर्जक के रूप में नहीं, बल्कि समाधान और तकनीकी सहयोग देने वाले देश के रूप में मजबूत करने में मदद मिली है।
भूपेंद्र यादव से जलवायु वित्त और तकनीक पर चर्चा
भारत यात्रा के दौरान साइमन स्टील ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से भी मुलाकात की। दोनों पक्षों के बीच Climate Adaptation, Technology Transfer, Climate Finance, Global Stocktake और Just Transition जैसे विषयों पर बातचीत हुई।

Just Transition का अर्थ ऐसी ऊर्जा परिवर्तन प्रक्रिया से है, जिसमें कोयला और जीवाश्म ईंधन पर निर्भर क्षेत्रों के श्रमिकों तथा समुदायों को पीछे न छोड़ा जाए।
भारत में कोयला खनन, थर्मल पावर और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था लाखों लोगों को रोजगार देती है। इसलिए Clean Energy Transition के साथ नए कौशल, वैकल्पिक उद्योग और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था बनाना जरूरी होगा।
तकनीक हस्तांतरण भी भारत की प्रमुख मांग रही है। विकासशील देशों का कहना है कि महंगी पेटेंट तकनीक और ऊंची वित्त लागत के कारण उनके लिए जलवायु लक्ष्य पूरा करना कठिन हो जाता है।
भारत के सोलर सुपरपावर बनने के बाद अगला लक्ष्य
भारत को सोलर सुपरपावर कहे जाने का अर्थ यह नहीं है कि देश का Energy Transition पूरा हो चुका है। यह अब तक बने सौर ढांचे, लागत में कमी और भविष्य की संभावना की अंतरराष्ट्रीय पहचान है।
अगले चरण में भारत को सोलर सेल और मॉड्यूल के लिए आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम करनी होगी। दिसंबर 2024 में घोषित नियमों के अनुसार जून 2026 से कुछ स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में सरकार द्वारा स्वीकृत घरेलू निर्माताओं के सोलर सेल इस्तेमाल करने की शर्त लागू करने की दिशा तय की गई थी। इसका उद्देश्य चीन से आयातित सेल पर निर्भरता कम करना है।
बैटरी स्टोरेज, ट्रांसमिशन लाइन, रेयर मिनरल, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर पैनल की Recycling व्यवस्था में भी बड़े निवेश की जरूरत होगी।
सौर ऊर्जा का विस्तार भूमि उपयोग से जुड़े विवाद भी पैदा कर सकता है। बड़े सोलर पार्कों के लिए जमीन लेते समय खेती, चरागाह, स्थानीय समुदायों और जैव विविधता पर असर का ध्यान रखना होगा।
FAQ
1. संयुक्त राष्ट्र के जलवायु प्रमुख ने भारत को सोलर सुपरपावर क्यों कहा?
साइमन स्टील ने भारत को सोलर सुपरपावर इसलिए कहा क्योंकि 2014 के बाद देश की स्थापित सौर क्षमता 50 गुना से ज्यादा बढ़ी है। भारत ने गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता का 50% लक्ष्य पांच वर्ष पहले हासिल किया और Solar Manufacturing तथा सस्ती सौर बिजली में भी बड़ी प्रगति की है।
2. भारत की सौर ऊर्जा क्षमता कितनी बढ़ी है?
वर्ष 2014 में भारत की स्थापित सौर क्षमता करीब 3 गीगावाट थी। मार्च 2026 तक यह बढ़कर 150.26 गीगावाट हो गई। इसमें बड़े सोलर प्लांट, रूफटॉप सोलर और PM-KUSUM सहित ऑफ-ग्रिड परियोजनाएं शामिल हैं।
3. भारत के सौर ऊर्जा क्षेत्र में कुशल कार्यबल की क्या भूमिका है?
भारत के इंजीनियर, IT प्रोफेशनल और तकनीकी विशेषज्ञ सोलर मैन्युफैक्चरिंग, बैटरी, स्मार्ट ग्रिड, AI आधारित बिजली प्रबंधन और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। UN ने इसी Skilled Workforce को भारत की बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धी ताकत बताया है।
4. भारत की नवीकरणीय ऊर्जा नीति क्या है?
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता का लक्ष्य रखा है। इसके लिए Solar Parks, PM Surya Ghar, PM-KUSUM, PLI Solar Module Scheme, Green Hydrogen Mission, Battery Storage और Renewable Energy Bidding जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
5. अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन क्या है?
International Solar Alliance भारत और फ्रांस की पहल से शुरू हुआ अंतर-सरकारी संगठन है। इसका मुख्यालय गुरुग्राम में है। यह सदस्य देशों के बीच सौर तकनीक, निवेश, प्रशिक्षण और परियोजनाओं को बढ़ावा देता है।

