Indonesia EVM: भारत अब इंडोनेशिया के लिए बनाएगा EVM, जानिए भारत-इंडोनेशिया के 20 समझौतों में क्या-क्या शामिल है और क्यों हैं ये अहम?

Indonesia EVM

PM Modi Indonesia Visit: भारत और इंडोनेशिया ने अपने संबंधों को नई रणनीतिक ऊंचाई देते हुए रक्षा, चुनावी तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत समेत 20 महत्वपूर्ण समझौतों पर सहमति बनाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 6 से 8 जुलाई की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान हुए ये समझौते दोनों देशों की Comprehensive Strategic Partnership को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माने जा रहे हैं। इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में इंडोनेशिया द्वारा भारत की स्वदेशी ‘अस्त्र’ एयर-टू-एयर मिसाइल खरीदने का फैसला, ब्रह्मोस मिसाइल सहयोग का विस्तार और इंडोनेशिया के लिए भारतीय तकनीक पर आधारित इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) विकसित करने का निर्णय शामिल है।

जकार्ता पहुंचने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंडोनेशियाई वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने एस्कॉर्ट किया। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने राष्ट्रपति भवन इस्ताना मर्देका में उनका औपचारिक स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के बाद कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। राष्ट्रपति प्रबोवो ने प्रधानमंत्री मोदी को इंडोनेशिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी प्रदान किया।

पीएम मोदी को मिला इंडोनेशिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बिंतांग रिपब्लिक इंडोनेशिया आदिपूर्णा’ (Bintang Republik Indonesia Adipurna) प्रदान किया। 

यह सम्मान इंडोनेशिया उन विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं को देता है, जिन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो। प्रधानमंत्री मोदी को यह सम्मान भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा, व्यापार, समुद्री सुरक्षा, संस्कृति और रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देने में उनके योगदान के लिए दिया गया।

भारत इंडोनेशिया के लिए विकसित करेगा विशेष EVM

इस यात्रा का सबसे चर्चित फैसला चुनावी तकनीक से जुड़ा रहा। भारत इंडोनेशिया की चुनावी आवश्यकताओं के अनुरूप विशेष Electronic Voting Machine (EVM) विकसित करने में तकनीकी सहयोग करेगा। यह भारत की चुनावी व्यवस्था और चुनाव आयोग की तकनीकी क्षमता पर इंडोनेशिया के भरोसे का बड़ा संकेत माना जा रहा है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में इस्तेमाल होने वाली वही EVM मशीनें सीधे इंडोनेशिया भेज दी जाएंगी। इंडोनेशिया की चुनाव प्रणाली, निर्वाचन कानून, प्रशासनिक ढांचा और मतदान प्रक्रिया भारत से अलग है। इसलिए वहां के लिए अलग डिजाइन और तकनीकी आवश्यकताओं वाली मशीनें विकसित की जाएंगी।

इस सहयोग के तहत केवल मशीन तैयार करने तक ही बात सीमित नहीं रहेगी। दोनों देशों के चुनाव आयोग चुनाव संचालन, चुनावी तकनीक, अधिकारियों के प्रशिक्षण, साइबर सुरक्षा, मतदान प्रक्रिया और चुनाव प्रबंधन से जुड़े अनुभव भी साझा करेंगे। इससे चुनावी संस्थागत सहयोग को भी मजबूती मिलेगी।

भारत पिछले कई दशकों से दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चुनाव सफलतापूर्वक EVM के माध्यम से कराता आया है। करोड़ों मतदाताओं के बीच इतने बड़े स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक मतदान का अनुभव बहुत कम देशों के पास है। यही वजह है कि इंडोनेशिया ने चुनावी तकनीक के क्षेत्र में भारत के साथ सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है।

भारत की 'अस्त्र' मिसाइल खरीदेगा इंडोनेशिया

रक्षा क्षेत्र में इस यात्रा का सबसे बड़ा फैसला भारत की स्वदेशी ‘अस्त्र’ एयर-टू-एयर मिसाइल का निर्यात माना जा रहा है। इंडोनेशिया ने इस मिसाइल को खरीदने का निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय मिसाइल प्रणालियों की क्षमता और प्रदर्शन देखने के बाद इंडोनेशिया ने इसमें विशेष रुचि दिखाई।

‘अस्त्र’ भारत में विकसित Beyond Visual Range (BVR) Air-to-Air Missile है। इसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है। यह मिसाइल दुश्मन के लड़ाकू विमान को उसकी दृश्य सीमा से काफी पहले निशाना बनाने में सक्षम है। इसकी मारक क्षमता 100 किलोमीटर से अधिक है और इसे आधुनिक भारतीय लड़ाकू विमानों जैसे सुखोई-30MKI तथा LCA तेजस के साथ एकीकृत किया जा चुका है।

इस मिसाइल में अत्याधुनिक एक्टिव रडार सीकर, इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटर मेजर (ECCM) क्षमता और हाई-स्पीड इंटरसेप्शन तकनीक मौजूद है। इससे भारतीय वायुसेना की हवाई युद्ध क्षमता पहले ही मजबूत हुई है और अब इसके निर्यात से भारत वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा।

अस्त्र मिसाइल का निर्यात केवल एक रक्षा सौदा नहीं है बल्कि यह भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ रक्षा नीति की बड़ी सफलता भी माना जा रहा है।

 

ब्रह्मोस सहयोग को मिलेगा नया विस्तार

इंडोनेशिया पहले से भारत की सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल प्रणाली में रुचि दिखा चुका है। अब दोनों देशों ने इस सहयोग को और आगे बढ़ाने पर सहमति बनाई है। भारत इंडोनेशिया को अतिरिक्त ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियां उपलब्ध कराएगा, जिससे उसकी समुद्री रक्षा क्षमता और मजबूत होगी।

ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज परिचालन सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। इसकी गति लगभग मैक-2.8 से मैक-3 तक होती है और यह समुद्र, जमीन तथा जहाजों से लॉन्च की जा सकती है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा के बीच ब्रह्मोस सहयोग का विस्तार केवल हथियारों की बिक्री नहीं, बल्कि दोनों देशों की समुद्री सुरक्षा साझेदारी को भी मजबूत करता है। इससे मलक्का जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में निगरानी तथा सुरक्षा क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।

फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया भी भारत के रक्षा निर्यात का महत्वपूर्ण साझेदार बनता जा रहा है। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को वैश्विक बाजार में नई पहचान मिलेगी।

महत्वपूर्ण खनिजों पर मजबूत होगी साझेदारी

दोनों देशों ने Critical Minerals यानी महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन मजबूत करने पर भी सहमति जताई है। इसके तहत भारत इंडोनेशिया में स्टील, निकेल और रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के निर्माण में निवेश करेगा।

आज पूरी दुनिया इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स की ओर तेजी से बढ़ रही है। इन सभी उद्योगों के लिए निकेल, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मिनरल्स बेहद जरूरी हैं।

इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े निकेल उत्पादक देशों में शामिल है। भारत अभी इन खनिजों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। ऐसे में दोनों देशों के बीच यह सहयोग भारत को भविष्य की तकनीकी और औद्योगिक जरूरतों के लिए अधिक सुरक्षित सप्लाई चेन उपलब्ध करा सकता है।

इसके अलावा दोनों देश स्टेनलेस स्टील निर्माण, खनन तकनीक, औद्योगिक निवेश और डाउनस्ट्रीम इंडस्ट्री विकसित करने पर भी साथ काम करेंगे। इससे दोनों देशों के उद्योगों और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ावा मिलेगा।

 

सबांग पोर्ट परियोजना को मिलेगी नई गति

भारत और इंडोनेशिया ने इंडोनेशिया के रणनीतिक सबांग पोर्ट के संयुक्त विकास पर भी सहमति जताई है। यह बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के बेहद करीब स्थित है और भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना से लगभग 160 किलोमीटर (करीब 100 मील) की दूरी पर है।

मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। वैश्विक समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। चीन के ऊर्जा आयात का भी बड़ा भाग इसी मार्ग पर निर्भर करता है।

ऐसे में सबांग पोर्ट का विकास भारत के लिए केवल व्यापारिक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की समुद्री मौजूदगी मजबूत होगी और समुद्री सुरक्षा सहयोग को नई दिशा मिलेगी।

 

रक्षा से लेकर डिजिटल अर्थव्यवस्था तक 20 समझौतों का दायरा

इस यात्रा के दौरान हुए समझौते केवल रक्षा या चुनावी तकनीक तक सीमित नहीं रहे। दोनों देशों ने कृषि, स्वास्थ्य, चिकित्सा उपकरण, आपदा प्रबंधन, अंतरिक्ष अनुसंधान, दूरसंचार, 5G, क्वांटम तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान, स्टार्टअप, डिजिटल कॉमर्स, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग जैसे कई क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ाने पर सहमति बनाई।

भारत और इंडोनेशिया कृषि अनुसंधान, बेहतर बीज, खाद्य सुरक्षा और आधुनिक खेती की तकनीकों पर साथ काम करेंगे। स्वास्थ्य क्षेत्र में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण, दवाओं और मेडिकल उपकरणों के नियामकीय सहयोग को भी बढ़ाया जाएगा।

डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भारत के Open Network for Digital Commerce (ONDC) मॉडल और इंडोनेशिया के डिजिटल व्यापार ढांचे के बीच सहयोग बढ़ाया जाएगा। वहीं इंडोनेशिया में IIM बेंगलुरु का कैंपस स्थापित करने की दिशा में भी पहल होगी।

इसी के साथ दोनों देशों ने अंतरिक्ष अनुसंधान, समुद्री सुरक्षा, वैज्ञानिक शोध, नवाचार, दूरसंचार, आपदा प्रबंधन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी नई गति देने का निर्णय लिया है।

भारत और इंडोनेशिया का रिश्ता इतना खास क्यों माना जाता है?

भारत और इंडोनेशिया का रिश्ता केवल आज के रणनीतिक हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें करीब दो हजार साल पुराने सांस्कृतिक और समुद्री संपर्कों तक जाती हैं। पहली सदी के आसपास भारतीय व्यापारी मसालों के व्यापार के लिए समुद्री मार्ग से इंडोनेशिया पहुंचे। उनके साथ संस्कृत भाषा, हिंदू और बौद्ध परंपराएं, भारतीय कला, स्थापत्य और शासन व्यवस्था के कई तत्व भी वहां पहुंचे। समय के साथ इनका प्रभाव इंडोनेशिया की संस्कृति, भाषा, मंदिरों, साहित्य और सामाजिक जीवन में दिखाई देने लगा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने कभी इंडोनेशिया पर शासन नहीं किया। वहां के स्थानीय राजाओं ने स्वेच्छा से भारतीय संस्कृति और परंपराओं को अपनाया। यही कारण है कि आज भी दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद इंडोनेशिया में रामायण, महाभारत और संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

7वीं से 13वीं शताब्दी के बीच श्रीविजय साम्राज्य ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। इस दौरान भारत के नालंदा विश्वविद्यालय और इंडोनेशिया के विद्वानों के बीच भी गहरे संबंध रहे। बाद में 13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच मजापहित साम्राज्य ने हिंदू परंपराओं, संस्कृत साहित्य और भारतीय स्थापत्य को और अधिक बढ़ावा दिया।

 

प्रम्बानन मंदिर दोनों देशों की साझा विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान प्रम्बानन मंदिर भी विशेष चर्चा में रहा। जावा द्वीप पर स्थित प्रम्बानन इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है। इसका निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी में माताराम साम्राज्य के दौरान हुआ था। यह मंदिर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित है तथा हिंदू त्रिमूर्ति की अवधारणा पर आधारित है।

मंदिर परिसर में मूल रूप से लगभग 240 मंदिर बनाए गए थे। इनमें सबसे ऊंचा शिव मंदिर करीब 47 मीटर ऊंचा है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी दीवारों पर रामायण की पूरी कथा पत्थरों पर अत्यंत सुंदर नक्काशी के रूप में उकेरी गई है। आज भी यहां नियमित रूप से रामायण बैले का मंचन होता है, जिसे देखने दुनिया भर से पर्यटक पहुंचते हैं।

1991 में यूनेस्को ने प्रम्बानन मंदिर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। 2006 में योग्याकार्ता में आए भूकंप से मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था, जिसके बाद इंडोनेशिया सरकार और यूनेस्को ने मिलकर इसका संरक्षण और पुनर्स्थापन कराया। अब भारत भी इसके संरक्षण में सहयोग करेगा, जिससे दोनों देशों के हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंध और मजबूत होंगे।

 

इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति की झलक आज भी दिखाई देती है

इंडोनेशिया में भारतीय संस्कृति का प्रभाव केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। वहां की नौसेना का आधिकारिक आदर्श वाक्य ‘जलेष्वेव जयामहे’ संस्कृत भाषा से लिया गया है। इंडोनेशिया का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘भिन्नेका तुंग्गल इका’ भी प्राचीन जावानी साहित्य पर आधारित है, जिसमें संस्कृत के अनेक शब्द मिलते हैं।

इंडोनेशिया की राष्ट्रीय एयरलाइन का नाम गरुड़ इंडोनेशिया है, जो भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के नाम पर रखा गया है। कुछ वर्षों तक इंडोनेशिया के 20 हजार रुपिया के नोट पर भगवान गणेश की तस्वीर भी छप चुकी है। वहां भगवान गणेश को ज्ञान और शिक्षा का प्रतीक माना जाता है।

जकार्ता में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के रथ की लगभग 85 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा भी स्थापित है, जिसे शहर के प्रमुख प्रतीकों में गिना जाता है।

भारत और इंडोनेशिया के राजनीतिक संबंध भी काफी पुराने हैं। वर्ष 1950 में भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह में इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो मुख्य अतिथि बने थे। किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष को यह सम्मान पहली बार मिला था।

 

भारत के लिए इंडोनेशिया क्यों है रणनीतिक रूप से अहम?

इंडोनेशिया केवल सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि भारत की विदेश नीति, समुद्री सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण देश है।

सबसे बड़ा कारण इसका भौगोलिक स्थान है। इंडोनेशिया का सबांग बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब स्थित है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है, जहां से वैश्विक समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। चीन के ऊर्जा आयात का अधिकांश भाग भी इसी मार्ग से होकर जाता है।

भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का ग्रेट निकोबार द्वीप और इंडोनेशिया का सबांग क्षेत्र एक-दूसरे से लगभग 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ता समुद्री सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करता है।

चीन लगातार हिंद महासागर क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह और म्यांमार के कई बंदरगाहों में उसकी मौजूदगी पहले से बढ़ चुकी है। ऐसे में इंडोनेशिया के साथ मजबूत रक्षा और समुद्री सहयोग भारत के लिए रणनीतिक संतुलन बनाने में मददगार साबित हो सकता है।

 

महत्वपूर्ण खनिज भारत के भविष्य के लिए क्यों जरूरी हैं?

भारत और इंडोनेशिया के बीच महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर हुआ समझौता आने वाले वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में गिना जा सकता है।

दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों की ओर बढ़ रही है। इन सभी उद्योगों के लिए निकेल, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मिनरल्स बेहद जरूरी हैं।

इंडोनेशिया दुनिया के सबसे बड़े निकेल उत्पादकों में शामिल है। भारत अभी इन खनिजों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ता सहयोग भारत को भविष्य की बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए अधिक सुरक्षित और स्थिर सप्लाई चेन उपलब्ध करा सकता है।

 

इन समझौतों का भारत और इंडोनेशिया को क्या फायदा होगा?

इन 20 समझौतों से दोनों देशों को कई स्तरों पर लाभ मिलने की उम्मीद है। भारत के लिए यह रक्षा निर्यात बढ़ाने, महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करने, डिजिटल तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में नए अवसर पैदा करने का माध्यम बन सकता है।

इंडोनेशिया को भारतीय रक्षा तकनीक, चुनावी प्रबंधन, कृषि अनुसंधान, स्वास्थ्य सेवाओं, डिजिटल कॉमर्स, अंतरिक्ष सहयोग और उच्च शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत के अनुभव का लाभ मिलेगा। साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और औद्योगिक सहयोग भी तेजी से बढ़ने की संभावना है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह साझेदारी केवल व्यापार या रक्षा सौदों तक सीमित नहीं है। इसमें लोकतांत्रिक संस्थाओं, आधुनिक तकनीक, समुद्री सुरक्षा, सांस्कृतिक विरासत, शिक्षा और भविष्य की तकनीकों को भी समान महत्व दिया गया है। यही कारण है कि भारत और इंडोनेशिया के बीच हुए ये 20 समझौते आने वाले वर्षों में दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने वाले माने जा रहे हैं।

FAQ:

1. भारत इंडोनेशिया के लिए EVM विकसित करने में कैसे मदद करेगा?
भारत इंडोनेशिया की चुनाव प्रणाली के अनुरूप विशेष इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन विकसित करने में तकनीकी सहयोग देगा। इसके साथ चुनाव प्रबंधन और प्रशिक्षण में भी सहयोग बढ़ाया जाएगा।

 

2. इंडोनेशिया के लिए अलग EVM की आवश्यकता क्यों है?
इंडोनेशिया की चुनावी व्यवस्था, कानून और प्रशासनिक ढांचा भारत से अलग है। इसलिए वहां की जरूरतों के अनुसार अलग प्रणाली विकसित की जाएगी।

 

3. भारत के EVM मॉडल की क्या विशेषताएं हैं?
भारतीय EVM स्टैंडअलोन मशीनें होती हैं, जिन्हें इंटरनेट से नहीं जोड़ा जाता। इनके साथ VVPAT प्रणाली भी इस्तेमाल की जाती है, जिससे मतदाता अपने वोट की पुष्टि कर सकता है।

 

4. इस सहयोग से दोनों देशों को क्या लाभ होगा?
इससे चुनावी तकनीक, लोकतांत्रिक संस्थाओं, डिजिटल सहयोग और तकनीकी साझेदारी मजबूत होगी। साथ ही दोनों देशों के बीच संस्थागत संबंध भी और मजबूत होंगे।

 

5. क्या भारत पहले भी अन्य देशों को चुनावी तकनीक उपलब्ध करा चुका है?
भारत कई देशों के चुनाव आयोगों के साथ प्रशिक्षण और चुनाव प्रबंधन का अनुभव साझा करता रहा है। इंडोनेशिया के साथ यह सहयोग चुनावी तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

 

6. EVM कैसे काम करती है?
EVM में बैलेट यूनिट और कंट्रोल यूनिट होती है। मतदाता उम्मीदवार के सामने बटन दबाकर वोट देता है और VVPAT प्रणाली उसके वोट का दृश्य सत्यापन उपलब्ध कराती है।

 

7. भारत और इंडोनेशिया के बीच यह सहयोग किस क्षेत्र में महत्वपूर्ण है?
यह सहयोग चुनावी तकनीक, डिजिटल गवर्नेंस, लोकतांत्रिक संस्थाओं और तकनीकी साझेदारी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

8. क्या यह समझौता दोनों देशों के चुनाव आयोगों के बीच है?
हाँ। यह चुनावी सहयोग, तकनीकी सहायता, अनुभव साझा करने और चुनाव प्रबंधन से जुड़े संस्थागत सहयोग का हिस्सा है।

 

9. भारतीय EVM कितनी सुरक्षित मानी जाती हैं?
भारतीय EVM इंटरनेट या किसी बाहरी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होतीं। इन्हें बहु-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था और VVPAT प्रणाली के साथ इस्तेमाल किया जाता है, जिससे मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ती है।