NASA Wants ISRO on the Moon: नासा ने इसरो को मून बेस प्रोग्राम में शामिल होने का न्योता दिया, जानिए अमेरिका को क्यों चाहिए भारत का साथ?

NASA Wants ISRO on the Moon

नासा ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो (ISRO) को अपने मून बेस प्रोग्राम में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। इससे भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग का एक नया रास्ता खुल सकता है। साथ ही, चांद पर लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी स्थापित करने की कोशिशों में भारत की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यह निमंत्रण 5 और 6 अगस्त 2026 को बेंगलुरु स्थित इसरो मुख्यालय में हुई भारत-अमेरिका सिविल स्पेस जॉइंट वर्किंग ग्रुप की 9वीं बैठक के दौरान दिया गया। बैठक में चांद की खोज, मानव अंतरिक्ष मिशन, वैज्ञानिक रिसर्च, व्यावसायिक अंतरिक्ष गतिविधियों और आर्टेमिस अकॉर्ड्स के तहत वैज्ञानिक डेटा साझा करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।

NASA Wants ISRO on the Moon

अब सवाल यह है कि आखिर मून बेस प्रोग्राम क्या है, इसमें भारत क्या योगदान दे सकता है और चीन के बढ़ते चंद्र मिशनों के बीच भारत-अमेरिका की यह साझेदारी इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जा रही है?

मून बेस प्रोग्राम (Moon Base Programme) क्या है?

अमेरिका का मून बेस प्रोग्राम चांद पर इंसानों की लंबे समय तक मौजूदगी स्थापित करने की योजना है। यह अपोलो मिशनों से काफी अलग है।

अपोलो मिशनों का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों को चांद तक पहुंचाना और उन्हें सुरक्षित वापस पृथ्वी पर लाना था। इसके विपरीत, मून बेस प्रोग्राम का लक्ष्य ऐसी क्षमता विकसित करना है, जिससे इंसान बार-बार चांद पर जा सकें और आगे चलकर वहां लंबे समय तक रहकर काम कर सकें।

मून बेस को चांद के साउथ पोल के आसपास विकसित करने की योजना है। यहां अंतरिक्ष यात्री रहेंगे, वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे और चांद के वातावरण तथा संसाधनों का अध्ययन करेंगे।

इसके लिए नासा और उसके साझेदार कई मानवयुक्त और बिना इंसान वाले मिशन के जरिए धीरे-धीरे जरूरी ढांचा तैयार करेंगे।

इसका मकसद केवल चांद पर वैज्ञानिक खोज करना नहीं है। यहां विकसित होने वाली तकनीक और हासिल किया गया अनुभव भविष्य में डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन यानी अंतरिक्ष के और दूर के हिस्सों की खोज में भी काम आएगा। इसमें आगे चलकर मंगल ग्रह पर मानव मिशन की तैयारी भी शामिल है।

 

चांद पर एक साथ नहीं बनेगा मून बेस

नासा मून बेस को एक ही मिशन में तैयार नहीं करेगा। इसे कई चरणों में धीरे-धीरे विकसित किया जाएगा।

शुरुआत में रोबोटिक मिशन चांद की सतह और वहां के वातावरण का अध्ययन करेंगे। नई तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा और यह समझने की कोशिश होगी कि भविष्य में इंसानों के लिए किस तरह का ढांचा तैयार करना सबसे सुरक्षित रहेगा।

इसके बाद बिजली, संचार, सामान पहुंचाने और चांद की सतह पर आने-जाने जैसी जरूरी सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

हर चरण में हासिल अनुभव का इस्तेमाल अगले चरण में किया जाएगा। इस तरह मून बेस धीरे-धीरे एक ऐसे लचीले और विस्तार योग्य चंद्र ठिकाने में बदलने की योजना है, जहां इंसान लंबे समय तक रह और काम सकें।

 

पहला चरण: 2026 से 2029 तक

पहले चरण का मुख्य उद्देश्य चांद तक भरोसेमंद तरीके से पहुंचना और वहां के वातावरण को बेहतर तरीके से समझना है।

इस दौरान रोबोटिक मिशन खास तौर पर चांद के साउथ पोल की खोज करेंगे। नई तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा और भविष्य में मून बेस के लिए उपयुक्त जगहों की पहचान की जाएगी।

इससे नासा को चांद पर लैंडिंग और वहां उपकरणों को संचालित करने का ज्यादा अनुभव मिलेगा। साथ ही अंतरिक्ष यात्रियों के पहुंचने से पहले संभावित जोखिमों को कम किया जा सकेगा।

 

दूसरा चरण: 2029 से 2032 तक

दूसरे चरण में शुरुआती ढांचा तैयार करने पर जोर होगा।

इसमें बिजली व्यवस्था, सामान पहुंचाने की सुविधा, लॉजिस्टिक्स और संचार व्यवस्था जैसी चीजें शामिल होंगी।

इन सुविधाओं के तैयार होने के बाद चांद पर ज्यादा जटिल मिशन करना संभव होगा। नासा अलग-अलग स्थानों पर सुविधाएं तैयार करके ऐसा नेटवर्क बनाना चाहता है, जो भविष्य में मून बेस के विस्तार का आधार बन सके।

 

तीसरा चरण: 2032 के बाद

तीसरे चरण में चांद पर लंबे समय तक इंसानों के रहने और काम करने के लिए जरूरी स्थायी चंद्र ठिकाना विकसित करने की दिशा में काम होगा।

इसमें रहने के स्थान, बिजली व्यवस्था, संचार, परिवहन और दूसरी जरूरी सुविधाओं को एक साथ जोड़ा जाएगा।

इसके बाद चांद पर लंबे समय तक वैज्ञानिक रिसर्च, तकनीकी परीक्षण और नए मिशन किए जा सकेंगे।

नासा का मानना है कि चांद पर विकसित होने वाली ये क्षमताएं भविष्य में इंसानों को सौरमंडल के और दूर के हिस्सों तक भेजने की तैयारी में मदद करेंगी।

 

नासा अकेले नहीं बनाएगा मून बेस

मून बेस प्रोग्राम में नासा अकेले काम नहीं कर रहा है। इसमें निजी कंपनियों, वैज्ञानिक संस्थानों और दूसरे देशों की भी भागीदारी होगी।

नासा चांद पर इस्तेमाल होने वाले लूनर लैंडर, रोवर और दूसरी तकनीक विकसित करने के लिए निजी कंपनियों के साथ काम कर रहा है।

जून 2026 में नासा ने 2028 के अंत के लिए चार और चंद्र मिशनों की घोषणा की थी। इनमें एस्ट्रोबोटिक, फायरफ्लाई एयरोस्पेस और इंट्यूटिव मशीन्स जैसी कंपनियां शामिल हैं।

यानी मून बेस को सिर्फ एक अंतरिक्ष मिशन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे तैयार होने वाले पूरे लूनर इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में देखा जा रहा है।

 

चांद के साउथ पोल पर ही क्यों है नासा की नजर?

चांद का साउथ पोल मून बेस की पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस क्षेत्र में कुछ ऐसे गड्ढे हैं, जहां सूरज की रोशनी लगभग कभी नहीं पहुंचती। इन बेहद ठंडे इलाकों में अरबों वर्षों से पानी बर्फ के रूप में मौजूद होने की संभावना जताई जाती रही है।

वहीं, इसके आसपास के कुछ ऊंचे हिस्सों पर लंबे समय तक सूर्य की रोशनी पहुंच सकती है।

यानी एक ही इलाके में संभावित पानी और सौर ऊर्जा दोनों उपलब्ध हो सकते हैं। यही वजह है कि भविष्य के चंद्र ठिकाने के लिए साउथ पोल को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भविष्य में वहां मौजूद पानी का इस्तेमाल पीने और जीवन-रक्षा के लिए किया जा सकता है। पानी को अलग करके ऑक्सीजन बनाने और इसके घटकों का इस्तेमाल रॉकेट ईंधन के लिए करने की संभावना पर भी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं।

हालांकि, साउथ पोल पर काम करना आसान नहीं होगा। वहां जमीन ऊबड़-खाबड़ है, रोशनी की स्थिति चुनौतीपूर्ण है और रोशनी वाले तथा अंधेरे इलाकों के बीच तापमान में काफी अंतर हो सकता है।

इसीलिए नासा पहले रोबोटिक मिशनों के जरिए इस इलाके को समझना चाहता है। अंतरिक्ष यात्रियों के पहुंचने से पहले जरूरी तकनीकों को चांद पर आजमाया जाएगा।

 

मून बेस में भारत क्या योगदान दे सकता है?

भारत को इस कार्यक्रम में केवल एक भागीदार देश के तौर पर शामिल नहीं किया जा रहा है। इसरो ने कम लागत में जटिल अंतरिक्ष मिशन करने की अपनी क्षमता और चंद्र मिशनों का अनुभव साबित किया है।

भारत की कुछ क्षमताएं नासा के बड़े अंतरिक्ष ढांचे के साथ मिलकर काम कर सकती हैं।

 

चंद्र मिशनों का अनुभव भारत की सबसे बड़ी ताकत

भारत कई चंद्रयान मिशन कर चुका है। इनमें चंद्रयान-3 सबसे महत्वपूर्ण है, जिसने 2023 में चांद के साउथ पोल के पास ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग की थी।

यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आने वाले वर्षों में चांद का साउथ पोल दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण चंद्र खोज क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।

इसरो ने चांद के वातावरण में अंतरिक्ष यान को संचालित करने, उसकी दिशा नियंत्रित करने और सफल लैंडिंग कराने का व्यावहारिक अनुभव हासिल किया है।

अब जब दुनिया चांद पर एक बार जाकर लौटने के बजाय लगातार मिशन भेजने और वहां लंबे समय तक गतिविधियां चलाने की ओर बढ़ रही है, तो भारत का यह अनुभव और महत्वपूर्ण हो सकता है।

 

कम लागत में जटिल मिशन करना भारत की ताकत

इसरो की एक बड़ी खासियत कम लागत में जटिल अंतरिक्ष मिशन तैयार करने और संचालित करने की क्षमता है।

भारत ने सीमित संसाधनों में कई कठिन अंतरिक्ष मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए हैं। मून बेस जैसे बड़े कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लैंडर, उपकरण, वैज्ञानिक प्रयोग और दूसरे मिशन शामिल होंगे। ऐसे में लागत को नियंत्रित रखना महत्वपूर्ण होगा।

भारत को अमेरिका की हर तकनीक को दोहराने की जरूरत नहीं है। इसरो विशेष तकनीक, वैज्ञानिक उपकरण, प्रयोग और मिशन से जुड़े अपने अनुभव के जरिए योगदान दे सकता है।

 

वैज्ञानिक उपकरण और डेटा में भी भारत की भूमिका

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग पहले से चल रहा है। इसका बड़ा उदाहरण नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार यानी निसार (NISAR) मिशन है।

यह दोनों देशों का संयुक्त मिशन है, जिसका उद्देश्य पृथ्वी की जमीन और बर्फ की सतह में होने वाले बदलावों पर नजर रखना है। इससे प्राकृतिक आपदाओं, पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले बदलावों को समझने में मदद मिलेगी।

दोनों देश अब वैज्ञानिक रिसर्च और मानव अंतरिक्ष मिशनों से जुड़े दूसरे सहयोग पर भी काम कर रहे हैं।

हालिया बातचीत में आर्टेमिस ढांचे के तहत वैज्ञानिक डेटा साझा करने पर भी चर्चा हुई।

भविष्य में मून बेस से जुड़े सहयोग में चांद की भूगर्भीय संरचना, वहां मौजूद संसाधनों की मैपिंग, वैज्ञानिक उपकरण और ऐसे प्रयोग शामिल हो सकते हैं, जिनसे यह समझने में मदद मिले कि चांद पर लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी कैसे संभव होगी।

 

गगनयान से भारत को मिलेगा एक और फायदा

भारत गगनयान कार्यक्रम के जरिए अपनी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता विकसित कर रहा है।

अमेरिका के पास मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशनों का भारत से कहीं ज्यादा अनुभव है। लेकिन भारत की अपनी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता लगातार विकसित हो रही है।

ऐसे में भविष्य में दोनों देशों के बीच संयुक्त मिशन, नई तकनीक के विकास और अंतरिक्ष यात्रियों से जुड़े सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

भारत-अमेरिका सिविल स्पेस जॉइंट वर्किंग ग्रुप की हालिया बैठक में भी ह्यूमन स्पेसफ्लाइट टेक्नोलॉजी को सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया।

 

चांद की होड़ में चीन भी बड़ा खिलाड़ी

यहीं से नासा और इसरो के बीच सहयोग का रणनीतिक महत्व सामने आता है।

चीन भी चांद को लेकर तेजी से अपना कार्यक्रम आगे बढ़ा रहा है। चीन का चांग’ई-7 मिशन 2026 की दूसरी छमाही में चांद के साउथ पोल का अध्ययन करने के लिए निर्धारित है।

चीन ने 2030 तक चांद पर मानव लैंडिंग का लक्ष्य भी रखा है। इसके अलावा चीन और रूस मिलकर इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन (ILRS) विकसित कर रहे हैं। इसका उद्देश्य लंबे समय के लिए चांद पर एक रिसर्च आउटपोस्ट तैयार करना है।

कई देश चीन के नेतृत्व वाली इस पहल में शामिल हो चुके हैं।

दूसरी तरफ अमेरिका आर्टेमिस ढांचे के जरिए अंतरराष्ट्रीय देशों और निजी कंपनियों के साथ अपना चंद्र नेटवर्क तैयार कर रहा है।

इसलिए भविष्य में चंद्रमा की प्रतिस्पर्धा केवल यह नहीं होगी कि कौन पहले वहां पहुंचता है। असली मुकाबला इस बात का होगा कि कौन वहां जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी तैयार कर पाता है।

 

इस होड़ में भारत क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत की स्थिति इस पूरी चंद्र प्रतिस्पर्धा में अलग है। भारत का अपना स्वतंत्र अंतरिक्ष कार्यक्रम है। वह चीन के इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन का हिस्सा नहीं है। दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक और तकनीकी संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।

भारत के पास चंद्र मिशनों का अपना अनुभव है। इसलिए उसकी भागीदारी अमेरिका के नेतृत्व वाले चंद्र नेटवर्क में एक प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति को जोड़ सकती है।

भारत की मौजूदगी ग्लोबल साउथ के एक बड़े देश को भी इस अंतरराष्ट्रीय चंद्र सहयोग से जोड़ती है।

भविष्य की चंद्र अर्थव्यवस्था केवल अमेरिका और चीन के बीच तय नहीं होगी। जिन देशों के पास लॉन्च क्षमता, चंद्र विज्ञान, रोबोटिक्स, नेविगेशन और अंतरिक्ष तकनीक है, वे भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

भारत के लिए भी यह सहयोग फायदेमंद हो सकता है। इससे उसे नई अंतरिक्ष तकनीक, वैज्ञानिक सहयोग और मानव अंतरिक्ष मिशनों का अनुभव हासिल करने का अवसर मिल सकता है।

 

क्या यह पूरा मामला चीन को ध्यान में रखकर है?

पूरी तरह ऐसा कहना सही नहीं होगा। नासा का आधिकारिक रुख शांतिपूर्ण अंतरिक्ष खोज, वैज्ञानिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी पर आधारित है।

भारत और अमेरिका ने अंतरिक्ष की गतिविधियों को लंबे समय तक टिकाऊ और जिम्मेदार तरीके से आगे बढ़ाने से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देशों के प्रति भी प्रतिबद्धता जताई है।

लेकिन चीन इस पूरी तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है। एक तरफ अमेरिका चांद पर लंबे समय तक मानव मौजूदगी के लिए अपना ढांचा तैयार कर रहा है। दूसरी तरफ चीन साउथ पोल की खोज और मानव चंद्र मिशन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

इसलिए आने वाली चंद्र प्रतिस्पर्धा 20वीं सदी की अमेरिका-सोवियत अंतरिक्ष होड़ जैसी सीधी दो देशों की प्रतिस्पर्धा नहीं होगी।

यह अलग-अलग देशों, अंतरिक्ष एजेंसियों, निजी कंपनियों, तकनीकी संस्थानों और वैज्ञानिक संगठनों के नेटवर्क के बीच प्रतिस्पर्धा हो सकती है।

 

भारत को NASA के साथ इस साझेदारी से क्या मिलेगा?

भारत के लिए NASA का यह निमंत्रण तीन बड़े फायदे लेकर आ सकता है।

पहला फायदा टेक्नोलॉजी का है। एडवांस्ड स्पेस टेक्नोलॉजी में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ने से भारत अपनी क्षमताओं को तेजी से विकसित कर सकता है। खासतौर पर चंद्र मिशनों, रोबोटिक्स और दूसरे जटिल अंतरिक्ष अभियानों में अमेरिका के साथ काम करने से भारत को नई तकनीकों और अनुभव तक पहुंच मिल सकती है।

दूसरा फायदा ह्यूमन स्पेसफ्लाइट का है। भारत अपने गगनयान (Gaganyaan) कार्यक्रम के जरिए मानव को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता विकसित कर रहा है। NASA के साथ काम करने से भारत को मानव अंतरिक्ष मिशनों का महत्वपूर्ण अनुभव मिल सकता है। आगे चलकर यही अनुभव Low-Earth Orbit से आगे, चंद्रमा और दूसरे Deep Space Missions के लिए काम आ सकता है।

तीसरा फायदा रणनीतिक प्रभाव का है। अगर भारत Moon Base Programme में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तो भविष्य में चंद्रमा पर होने वाली गतिविधियों के Rules, Standards और Practices तय करने की प्रक्रिया में भी उसकी आवाज मजबूत हो सकती है।

इस सहयोग का एक महत्वपूर्ण आधार Artemis Accords भी है। यह समझौता शांतिपूर्ण अंतरिक्ष अन्वेषण, वैज्ञानिक सहयोग और अंतरिक्ष संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल के लिए एक ढांचा तैयार करता है। भारत ने 2023 में Artemis Accords पर हस्ताक्षर किए थे।

 

आर्टेमिस अकॉर्ड्स क्या है?

आर्टेमिस अकॉर्ड्स अंतरिक्ष में शांतिपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से चांद, मंगल और दूसरे खगोलीय पिंडों की खोज के लिए देशों के बीच सहयोग का एक ढांचा है।

इसकी शुरुआत 2020 में नासा और अमेरिकी विदेश विभाग ने की थी। इसमें शांतिपूर्ण अंतरिक्ष खोज, पारदर्शिता, वैज्ञानिक डेटा साझा करने, आपात स्थिति में सहायता, अंतरिक्ष संसाधनों के जिम्मेदार इस्तेमाल और दूसरे देशों के मिशनों में अनावश्यक बाधा नहीं डालने जैसे सिद्धांत शामिल हैं।

 

NASA के न्योते का भारत के लिए क्या मतलब है?

नासा के इस निमंत्रण का सबसे बड़ा महत्व केवल यह नहीं है कि भविष्य में भारत का कोई उपकरण मून बेस तक पहुंचेगा या नहीं।

बड़ी बात यह है कि भारत को चंद्रमा की अगली पीढ़ी की खोज में केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदार बनने का अवसर मिल रहा है।

चंद्रयान मिशनों ने भारत को चांद तक पहुंचने की क्षमता साबित करने में मदद की है। अब अगली चुनौती इस क्षमता को लंबे समय तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय चंद्र कार्यक्रम में बदलने की है।

अमेरिका और चीन चांद पर इंसानों की भविष्य की मौजूदगी के लिए अपनी-अपनी योजनाओं के साथ आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में भारत किसके साथ और किस तरह सहयोग करता है, इसका असर केवल वैज्ञानिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा।

चांद अब केवल अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला नहीं रह गया है। वहां तकनीक, कारोबार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रणनीतिक प्रभाव एक साथ जुड़ रहे हैं।

नासा का यह निमंत्रण भारत को इस बदलती चंद्र दुनिया को सिर्फ देखने के बजाय उसका हिस्सा बनने और उसे आकार देने का मौका देता है।

FAQ

  1. NASA चंद्रमा पर ISRO को क्यों शामिल करना चाहता है?
    NASA ने ISRO को Moon Base Programme में शामिल होने का निमंत्रण India-US Civil Space Joint Working Group की बैठक के दौरान दिया। भारत के Chandrayaan Missions, Lunar Exploration Experience और बढ़ती Human Spaceflight Capability इसे संभावित अंतरराष्ट्रीय साझेदार बनाती हैं।
  2. NASA को ISRO की कौन-सी Space Technology पसंद है?
    ISRO की Lunar Landing, Spacecraft Operations, Scientific Instruments और कम लागत में जटिल Space Missions संचालित करने की क्षमता भारत की प्रमुख ताकतों में शामिल है।
  3. ISRO के Moon Mission को सस्ता और सफल क्यों माना जाता है?
    ISRO ने सीमित संसाधनों और अपेक्षाकृत Lean Engineering के जरिए कई जटिल Space Missions किए हैं। Chandrayaan-3 की सफल Soft Landing इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
  4. NASA और ISRO के Moon Programme में क्या सहयोग हो सकता है?
    सहयोग Lunar Science, Scientific Instruments, Resource Mapping, Scientific Data Sharing, Technology Development और आगे चलकर Human Spaceflight जैसे क्षेत्रों में हो सकता है। हालिया बातचीत में Human Spaceflight Technology और Scientific Data Sharing पर भी चर्चा हुई।
  5. NASA का Moon Base Programme क्या है?
    यह चंद्रमा के South Pole क्षेत्र में चरणबद्ध तरीके से ऐसा Lunar Outpost विकसित करने की योजना है, जहां भविष्य में इंसान लंबे समय तक रह और काम कर सकें। NASA ने इसे तीन चरणों में बांटा है-पहला Experiment and Learn, दूसरा Infrastructure और Early Habitation तथा तीसरा Sustained Human Presence।
  6. Artemis Programme में ISRO की क्या भूमिका हो सकती है?
    भारत ने 2023 में Artemis Accords पर हस्ताक्षर किए हैं। अब NASA के Moon Base Programme में निमंत्रण के बाद ISRO के लिए Lunar Science, Technology, Scientific Instruments और अन्य सहयोग के रास्ते खुल सकते हैं। हालांकि, किसी खास भारतीय मिशन या Hardware Contribution की अंतिम भूमिका अभी अलग से तय होना बाकी है।

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