भारत के एविएशन सेक्टर में तेजी से हो रहे विस्तार के बीच पायलटों की संस्था फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने देश के नागरिक उड्डयन नियामक ढांचे में बड़े बदलाव की मांग की है। FIP ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे प्रस्ताव में मौजूदा डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी DGCA (DGCA) की जगह एक स्वतंत्र और वैधानिक सिविल एविएशन अथॉरिटी (CAA) बनाने की मांग की है।
FIP अध्यक्ष कैप्टन सीएस रंधावा की ओर से 6 अगस्त को भेजे गए इस प्रस्ताव में कहा गया है कि भारत का एविएशन सेक्टर जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसके मुकाबले मौजूदा रेगुलेटरी सिस्टम (नियामक व्यवस्था) में जरूरी संस्थागत स्वतंत्रता और तकनीकी क्षमता की कमी है। संस्था का तर्क है कि भारत अब दुनिया के सबसे बड़े घरेलू एविएशन बाजारों में शामिल है, ऐसे में विमान सुरक्षा, पायलट लाइसेंसिंग, एयरवर्थीनेस, यात्री अधिकार और एयर नेविगेशन जैसे मामलों की निगरानी के लिए एक आधुनिक और स्वतंत्र नियामक की जरूरत है।
भारत के बढ़ते एविएशन सेक्टर के बीच उठी बड़ी मांग
भारत का नागरिक उड्डयन क्षेत्र पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ा है। यात्री संख्या, विमानों की संख्या, एयरपोर्ट, एयर नेविगेशन सेवाओं और एविएशन ट्रेनिंग संस्थानों में बड़ा विस्तार हुआ है।
FIP के मुताबिक देश में कमर्शियल एयरक्राफ्ट का बेड़ा 850 से ज्यादा विमानों का हो चुका है, जबकि यात्रियों की संख्या 239 मिलियन यानी करीब 23.9 करोड़ से अधिक पहुंच चुकी है। इसके अलावा ड्रोन, एडवांस्ड एयर मोबिलिटी और नई एविएशन टेक्नोलॉजी के आने से इस क्षेत्र का रेगुलेशन पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल हो गया है।
FIP का कहना है कि इतनी बड़ी और तेजी से बदलती इंडस्ट्री को उसी पुराने प्रशासनिक ढांचे से रेगुलेट करना लंबे समय में चुनौती बन सकता है। संस्था ने इसलिए DGCA की जगह ऐसी अथॉरिटी बनाने की मांग की है, जिसके पास प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी स्तर पर ज्यादा स्वतंत्रता हो।

अभी DGCA क्या करता है
DGCA यानी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन भारत का प्रमुख नागरिक उड्डयन नियामक है। यह विमान सुरक्षा, एयरक्राफ्ट ऑपरेशन, पायलट और अन्य एविएशन लाइसेंसिंग, एयरवर्थीनेस और कई दूसरे रेगुलेटरी मामलों की निगरानी करता है।
मौजूदा व्यवस्था में DGCA केंद्र सरकार के नागरिक उड्डयन मंत्रालय से जुड़ा हुआ है। 2024 के भारतीय वायुयान विधेयक ने भी मौजूदा रेगुलेटरी ढांचे को मूल रूप से बरकरार रखा है। इसके तहत DGCA सुरक्षा और रेगुलेटरी काम देखता है, जबकि बीसीएएस (BCAS) एविएशन सिक्योरिटी और एएआईबी (AAIB) विमान दुर्घटनाओं की जांच से जुड़ा काम करता है। केंद्र सरकार को इन संस्थाओं पर व्यापक नियंत्रण और उनके आदेशों की समीक्षा का अधिकार भी दिया गया है। यही वह व्यवस्था है जिसे अब FIP बदलना चाहता है।

FIP को DGCA के मौजूदा ढांचे में क्या दिक्कत दिख रही है
FIP का सबसे बड़ा तर्क DGCA की संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर है। संस्था के मुताबिक DGCA एक बड़े और तेजी से बदलते एविएशन सेक्टर की जरूरतों के हिसाब से फैसले लेने में कई प्रशासनिक सीमाओं का सामना करता है।
FIP का कहना है कि महत्वपूर्ण रेगुलेटरी फैसलों के लिए मंत्रालय स्तर पर मंजूरी की जरूरत पड़ सकती है। वित्तीय शक्तियों पर भी सरकारी प्रक्रियाओं का असर रहता है। भर्ती और खरीद की प्रक्रियाएं भी सामान्य सरकारी नियमों के तहत चलती हैं, जिससे विशेषज्ञों की नियुक्ति और जरूरी तकनीकी संसाधन जुटाने में समय लग सकता है।

FIP के मुताबिक एविएशन रेगुलेशन सामान्य सरकारी प्रशासन से काफी अलग है। इसमें ऐसे लोगों की जरूरत होती है जिनके पास एयरलाइन और एविएशन इंडस्ट्री का व्यावहारिक अनुभव हो।

इसमें एयरलाइन कैप्टन, फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर, एयरवर्थीनेस इंजीनियर, एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट विशेषज्ञ, ह्यूमन फैक्टर्स विशेषज्ञ और फैटिग रिस्क मैनेजमेंट (Fatigue Risk Management) विशेषज्ञ शामिल हैं।
सरकारी वेतन ढांचे से एविएशन विशेषज्ञों को जोड़ना चुनौती
FIP ने अपने प्रस्ताव में विशेषज्ञों की भर्ती को भी बड़ी समस्या बताया है। एविएशन इंडस्ट्री में लंबे अनुभव वाले प्रोफेशनल्स को निजी एयरलाइंस और एविएशन कंपनियों में बाजार के हिसाब से वेतन मिलता है। ऐसे में सरकारी वेतन और भर्ती व्यवस्था के कारण विशेषज्ञों को नियामक संस्था में लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।
FIP का कहना है कि अगर नियामक के पास सीधे इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स को प्रतिस्पर्धी वेतन पर नियुक्त करने की शक्ति हो, तो सुरक्षा और तकनीकी निगरानी को मजबूत किया जा सकता है।
प्रस्ताव में इसी वजह से मार्केट बेस्ड रिम्यूनरेशन (Market-based Remuneration) यानी बाजार के अनुरूप वेतन व्यवस्था की मांग की गई है।
2003 से 2013 के बीच एविएशन में आया बड़ा बदलाव
FIP ने अपने प्रस्ताव में 2003 से 2013 के बीच भारतीय एविएशन सेक्टर में हुए बदलाव का भी उल्लेख किया है।
इस दौरान यात्री यातायात में तेज वृद्धि हुई। निजी एयरलाइंस की भूमिका बढ़ी, एयरक्राफ्ट फ्लीट का विस्तार हुआ और देश में नए एयरपोर्ट विकसित हुए। फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन और एमआरओ यानी मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल (Maintenance, Repair and Overhaul) सुविधाओं का भी विस्तार हुआ।
FIP का तर्क है कि एविएशन सेक्टर के इस विस्तार ने दिखाया कि एक आधुनिक एविएशन इंडस्ट्री को पारंपरिक सरकारी विभाग जैसी व्यवस्था से रेगुलेट करना पर्याप्त नहीं हो सकता।
आज ड्रोन और एडवांस्ड एयर मोबिलिटी जैसे नए क्षेत्र भी जुड़ चुके हैं। इससे नियामक के सामने तकनीकी और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
ICAO की ऑडिट रिपोर्ट का भी दिया हवाला
FIP ने अपने प्रस्ताव में इंटरनेशनल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन यानी आईसीएओ (ICAO) के यूनिवर्सल सेफ्टी ओवरसाइट ऑडिट प्रोग्राम यानी यूएसओएपी (USOAP) का भी हवाला दिया है।
संस्था के मुताबिक इन ऑडिट में सुरक्षा निगरानी, इंस्पेक्टर स्टाफिंग, तकनीकी विशेषज्ञता, रेगुलेटरी स्वतंत्रता और निगरानी क्षमता जैसे क्षेत्रों को मजबूत करने की जरूरत सामने आई है।
FIP का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एविएशन रेगुलेटर के पास पर्याप्त स्वतंत्रता, संसाधन और योग्य कर्मचारी होना जरूरी माना जाता है। इसलिए भारत को भी अपने रेगुलेटरी ढांचे को इसी दिशा में आगे बढ़ाना चाहिए।
संसद की समिति भी पहले उठा चुकी है स्वतंत्र नियामक की बात
यह मांग पूरी तरह नई नहीं है। भारत में स्वतंत्र सिविल एविएशन अथॉरिटी बनाने की कोशिश पहले भी हो चुकी है।
2013 में सिविल एविएशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया बिल संसद में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य DGCA की जगह एक ज्यादा स्वतंत्र नियामक बनाना था। बिल को संसद की स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा गया था।
संसदीय समिति ने नियामक की स्वायत्तता, प्रोफेशनल मैनेजमेंट, बेहतर स्टाफिंग, जवाबदेही, वित्तीय स्वतंत्रता और एविएशन सेफ्टी ओवरसाइट को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर सुझाव दिए थे।
बाद में इस दिशा में संशोधित प्रस्ताव भी आगे बढ़ा, लेकिन 15वीं लोकसभा भंग होने के साथ 2013 का बिल लैप्स हो गया।
यानी FIP की मौजूदा मांग दरअसल उस पुराने सुधार प्रस्ताव को नए एविएशन माहौल के हिसाब से फिर सामने लाती है।
2009-10 में भी बनी थी सिविल एविएशन अथॉरिटी की योजना
FIP के अनुसार भारत में स्वतंत्र सिविल एविएशन अथॉरिटी बनाने की संभावनाओं पर 2009-10 में एक फीजिबिलिटी स्टडी (Feasibility Study) भी कराई गई थी।
इसमें नई अथॉरिटी के गठन की जरूरत, उसके उद्देश्य, संगठनात्मक ढांचे, वित्तीय प्रभाव और इसे लागू करने की रणनीति का अध्ययन किया गया था। इसमें दुनिया के प्रमुख एविएशन रेगुलेटर्स के मॉडल और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं को भी देखा गया था।
2013-14 के दौरान इस विचार को काफी गति मिली। तत्कालीन सरकार ने सिविल एविएशन अथॉरिटी बिल संसद में पेश भी किया था। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक बिल 20 अगस्त 2013 को लोकसभा में पेश हुआ और स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया था।
हालांकि यह प्रक्रिया आगे स्थायी स्वतंत्र नियामक के रूप में लागू नहीं हो सकी और आज भी DGCA ही मुख्य एविएशन सेफ्टी रेगुलेटर है।
नई अथॉरिटी बनी तो क्या बदलेगा
FIP ने जिस सिविल एविएशन अथॉरिटी की मांग की है, वह सिर्फ DGCA का नाम बदलने तक सीमित नहीं है। प्रस्ताव में एक ऐसी वैधानिक संस्था की कल्पना की गई है जिसे प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर ज्यादा स्वतंत्रता मिले।
प्रस्तावित अथॉरिटी एविएशन सेफ्टी, एयरवर्थीनेस, लाइसेंसिंग, सर्टिफिकेशन, कंज्यूमर प्रोटेक्शन और रेगुलेटरी कंप्लायंस जैसे क्षेत्रों की निगरानी करेगी।
इसका उद्देश्य यह है कि एविएशन सेक्टर से जुड़े फैसले ज्यादा तेजी से और तकनीकी विशेषज्ञता के आधार पर लिए जा सकें।
FIP का मानना है कि इससे भारत के आईसीएओ मानकों और रिकमेंडेड प्रैक्टिसेज (Standards and Recommended Practices) के अनुपालन को मजबूत किया जा सकता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एविएशन सेफ्टी व्यवस्था में भरोसा बढ़ सकता है।
अथॉरिटी के लिए अलग फंड बनाने की मांग
FIP ने प्रस्तावित अथॉरिटी के लिए अलग फंड बनाने का सुझाव भी दिया है। इसके लिए सिविल एविएशन अथॉरिटी फंड बनाया जा सकता है। इसमें यूजर फीस, लाइसेंसिंग चार्ज और कॉस्ट-रिकवरी सेफ्टी ऑडिट से मिलने वाली राशि जमा करने का प्रस्ताव है।
FIP का तर्क है कि इससे अथॉरिटी की वित्तीय निर्भरता कम होगी और उसे हर छोटे-बड़े खर्च के लिए सरकारी बजट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
मौजूदा व्यवस्था को लेकर FIP ने यह भी कहा है कि DGCA से जुड़ी आय सीधे भारत की कंसोलिडेटेड फंड (Consolidated Fund of India) व्यवस्था में चली जाती है, जिससे नियामक के पास अपनी जरूरतों के हिसाब से वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
चेयरपर्सन से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों तक होगा प्रोफेशनल बोर्ड
FIP ने प्रस्तावित सीएए के लिए एक प्रोफेशनल बोर्ड बनाने का सुझाव दिया है। इसमें चेयरपर्सन, डायरेक्टर जनरल और एविएशन के अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं। इनमें फ्लाइट सेफ्टी, एयरवर्थीनेस, एयर नेविगेशन, कंज्यूमर अफेयर्स और पर्यावरण अनुपालन जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल करने की बात कही गई है।
इन पदों के लिए निश्चित कार्यकाल रखने का भी प्रस्ताव है। FIP के अनुसार इससे नियामक के नेतृत्व में स्थिरता आएगी और महत्वपूर्ण फैसलों को तकनीकी विशेषज्ञता के आधार पर लेने में मदद मिलेगी।
पायलट लाइसेंसिंग और थकान प्रबंधन में भी सुधार का दावा
FIP का कहना है कि स्वतंत्र अथॉरिटी बनने से पायलट लाइसेंसिंग की प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है। इसके साथ ही पायलटों की थकान से जुड़े नियमों और निगरानी को भी बेहतर बनाया जा सकता है। इसमें एफडीटीएल यानी फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (Flight Duty Time Limitation) से जुड़े नियमों की निगरानी महत्वपूर्ण होगी।
एयरलाइन पायलटों के लिए पर्याप्त आराम और ड्यूटी टाइम की निगरानी उड़ान सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। FIP का तर्क है कि बेहतर डिजिटल सिस्टम और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता से इस तरह के रेगुलेशन को ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है।
यात्रियों की शिकायतों और पर्यावरण पर भी नजर
प्रस्तावित सीएए का काम सिर्फ विमानों और पायलटों तक सीमित नहीं रहेगा। FIP ने पैसेंजर कंप्लेंट्स यानी यात्रियों की शिकायतों के लिए अलग व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया है। इसके साथ पर्यावरण अनुपालन और एयरक्राफ्ट नॉइज रेगुलेशन (Noise Regulation) की निगरानी के लिए भी अलग तंत्र बनाने की बात कही गई है।
इसका मतलब है कि प्रस्तावित अथॉरिटी एविएशन सेक्टर में सुरक्षा के साथ-साथ यात्री हित और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों पर भी ज्यादा व्यवस्थित तरीके से काम कर सकती है।
ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों का दिया उदाहरण
FIP ने अपने प्रस्ताव में ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों के एविएशन रेगुलेटर्स का उदाहरण दिया है। संस्था ने पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे दक्षिण एशियाई देशों का भी उल्लेख किया है और कहा है कि इन देशों में स्वायत्त या वैधानिक नागरिक उड्डयन प्राधिकरणों के मॉडल मौजूद हैं।
FIP का तर्क है कि जब भारत का एविएशन बाजार दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में शामिल हो रहा है, तब भारत को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जा रही आधुनिक रेगुलेटरी व्यवस्थाओं के अनुरूप बदलाव करना चाहिए।
हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि अलग-अलग देशों के एविएशन रेगुलेटरी मॉडल पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। इसलिए किसी दूसरे देश की व्यवस्था को सीधे भारत में लागू करने के बजाय उसकी जरूरत के मुताबिक मॉडल तैयार करना होगा।
2024 के नए कानून के बाद भी DGCA की भूमिका बरकरार
भारत ने 2024 में भारतीय वायुयान विधेयक पारित कर पुराना एयरक्राफ्ट एक्ट, 1934 बदलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। इस नए कानूनी ढांचे में DGCA की रेगुलेटरी भूमिका बरकरार रखी गई है।
यानी FIP की मौजूदा मांग किसी लागू हो चुके सरकारी फैसले का हिस्सा नहीं है, बल्कि नियामक ढांचे में आगे बदलाव के लिए दिया गया प्रस्ताव है। 2024 के कानून के तहत DGCA अभी भी विमानन सुरक्षा और रेगुलेटरी काम की प्रमुख संस्था है।
इसलिए अगर सरकार FIP के प्रस्ताव पर आगे बढ़ती है तो इसके लिए सिर्फ प्रशासनिक आदेश पर्याप्त नहीं होंगे। नई वैधानिक अथॉरिटी के अधिकार, ढांचा, फंडिंग, नियुक्तियां और DGCA से जिम्मेदारियों का हस्तांतरण तय करने के लिए अलग कानूनी और संस्थागत प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है।
प्रस्ताव किन लोगों तक पहुंचाया गया
FIP ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू, नागरिक उड्डयन सचिव एसके सिन्हा, कैबिनेट सचिव डॉ. टीवी सोमनाथन और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव को भी प्रस्ताव की प्रतियां भेजी हैं।
अब इस प्रस्ताव पर सरकार की ओर से क्या कदम उठाया जाता है, यह महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल यह पायलटों की संस्था की ओर से दिया गया सुधार प्रस्ताव है, न कि DGCA को तत्काल खत्म करने का सरकारी फैसला।
भारत के एविएशन सेक्टर के लिए इसका मतलब क्या है
भारत में एयर ट्रैफिक लगातार बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में विमानों, एयरपोर्ट और नई एविएशन टेक्नोलॉजी का विस्तार होने की उम्मीद है। ऐसे में रेगुलेटर की जिम्मेदारी भी बढ़ती जाएगी।
FIP का पूरा तर्क इसी बिंदु पर आधारित है कि तेजी से बढ़ते एविएशन सेक्टर के साथ उसका नियामक ढांचा भी उसी गति से आधुनिक होना चाहिए।
अगर स्वतंत्र सिविल एविएशन अथॉरिटी बनती है तो इसका संभावित फायदा तेज रेगुलेटरी फैसलों, विशेषज्ञों की बेहतर भर्ती, वित्तीय लचीलापन, डिजिटल निगरानी, पायलट लाइसेंसिंग और सुरक्षा निरीक्षण में मिल सकता है।
हालांकि किसी भी स्वतंत्र नियामक की सफलता सिर्फ उसकी स्वायत्तता पर निर्भर नहीं करेगी। उसके पास पर्याप्त विशेषज्ञ, स्पष्ट जवाबदेही, मजबूत निगरानी तंत्र और सरकार से स्वतंत्र लेकिन जवाबदेह निर्णय प्रणाली होना भी जरूरी होगा।
FAQ
1. पायलटों की संस्था DGCA को बदलने की मांग क्यों कर रही है?
फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स का कहना है कि भारत का एविएशन सेक्टर बहुत तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन मौजूदा नियामक ढांचे में प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी स्वतंत्रता की सीमाएं हैं। संस्था एक ज्यादा स्वतंत्र और विशेषज्ञ-आधारित नियामक चाहती है।
2. स्वायत्त सिविल एविएशन अथॉरिटी क्या होगी?
यह एक वैधानिक और स्वतंत्र एविएशन नियामक संस्था होगी, जिसके पास प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी स्तर पर ज्यादा स्वायत्तता होगी। इसका काम एविएशन सेफ्टी, एयरवर्थीनेस, लाइसेंसिंग, सर्टिफिकेशन, यात्री हित और रेगुलेटरी अनुपालन की निगरानी करना होगा।
3. DGCA की मुख्य भूमिका क्या है?
DGCA भारत में नागरिक उड्डयन की सुरक्षा और रेगुलेटरी निगरानी करता है। इसमें पायलट लाइसेंसिंग, एयरक्राफ्ट एयरवर्थीनेस, ऑपरेशनल सेफ्टी और विमानन से जुड़े कई तकनीकी नियमों की निगरानी शामिल है। मौजूदा कानूनी ढांचे में DGCA की भूमिका बरकरार है।
4. पायलट एक स्वतंत्र एविएशन रेगुलेटर की मांग क्यों कर रहे हैं?
FIP का कहना है कि एविएशन सेक्टर में विशेषज्ञों की जरूरत तेजी से बढ़ी है, जबकि सरकारी भर्ती, वेतन और वित्तीय प्रक्रियाओं के कारण विशेषज्ञों को आकर्षित करने और फैसलों में तेजी लाने में दिक्कत हो सकती है।
5. स्वायत्त एविएशन अथॉरिटी से उड़ान सुरक्षा में क्या सुधार हो सकता है?
FIP के अनुसार स्वतंत्र अथॉरिटी में तकनीकी विशेषज्ञों की बेहतर भर्ती, डिजिटल निगरानी, सेफ्टी इंस्पेक्शन, पायलट लाइसेंसिंग और फैटिग रिस्क मैनेजमेंट को मजबूत किया जा सकता है। इससे एविएशन सेफ्टी की निगरानी अधिक प्रभावी होने की उम्मीद है।
6. क्या सरकार ने DGCA को खत्म करने का फैसला कर लिया है?
नहीं। अभी ऐसा कोई सरकारी फैसला नहीं हुआ है। FIP ने 6 अगस्त को प्रधानमंत्री और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को एक प्रस्ताव भेजकर स्वतंत्र सिविल एविएशन अथॉरिटी बनाने की मांग की है। मौजूदा व्यवस्था में DGCA ही प्रमुख एविएशन सेफ्टी रेगुलेटर है।

