कैंसर से लड़ाई का नया हथियार: जानिए क्या है Keytruda और कैसे काम करती है?

कैंसर के इलाज में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलाव आया है। पहले जहां इलाज का मुख्य आधार सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी था, वहीं अब एक नई तकनीक – इम्यूनोथेरेपी – ने उम्मीद की नई किरण दिखाई है। इसी श्रेणी की एक चर्चित दवा है Keytruda, जिसे वैज्ञानिक दुनिया में बड़ी उपलब्धि माना जाता है।

लेकिन जहां एक ओर यह दवा कई मरीजों के लिए जीवन बढ़ाने या कैंसर को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो रही है, वहीं इसकी ऊंची कीमत और नकली दवाओं का खतरा इसे एक गंभीर चिंता का विषय भी बना रहा है।

 

क्या है Keytruda और कैसे काम करती है?

Keytruda का असली नाम पेम्ब्रोलिज़ुमैब है। यह एक तरह की इम्यूनोथेरेपी दवा है, यानी यह शरीर की अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाकर कैंसर से लड़ने में मदद करती है।

हमारे शरीर में टी-सेल्स नाम की कोशिकाएं होती हैं, जो किसी भी बीमारी से लड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन कैंसर कोशिकाएं खुद को छुपाने के लिए एक तरह का “ब्रेक सिस्टम” इस्तेमाल करती हैं, जिससे टी-सेल्स उन्हें पहचान नहीं पाते।

Keytruda इसी ब्रेक को हटाने का काम करती है। यह टी-सेल्स पर मौजूद PD-1 नाम के रिसेप्टर से जुड़ जाती है, जिससे कैंसर कोशिकाएं छुप नहीं पातीं। इसके बाद शरीर का इम्यून सिस्टम उन्हें पहचानकर नष्ट करने लगता है।

 

किन-किन कैंसर में उपयोग होती है?

इस दवा को पहली बार 2014 में अमेरिका में स्किन कैंसर (मेलानोमा) के इलाज के लिए मंजूरी मिली थी। इसके बाद इसका उपयोग कई अन्य कैंसर में भी होने लगा, जैसे:

  • फेफड़ों का कैंसर
  • सर्वाइकल कैंसर
  • किडनी का कैंसर
  • कुछ आक्रामक स्तन कैंसर

आज यह दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली कैंसर दवाओं में शामिल है और 2024 में इसने लगभग 29.5 अरब डॉलर की बिक्री दर्ज की।

 

इम्यूनोथेरेपी कैसे अलग है?

पारंपरिक इलाज जैसे कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी सीधे कैंसर कोशिकाओं को मारते हैं, लेकिन इनके साथ कई बार स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित हो जाती हैं। इससे मरीज को कई साइड इफेक्ट्स झेलने पड़ते हैं।

इसके उलट, इम्यूनोथेरेपी शरीर के अंदर ही एक प्राकृतिक लड़ाई शुरू कर देती है। यह कैंसर को निशाना बनाती है और बाकी शरीर को कम नुकसान पहुंचाती है।

कुछ मामलों में यह देखा गया है कि अंतिम स्टेज के कैंसर में भी ट्यूमर पूरी तरह खत्म हो गया या मरीज की जिंदगी काफी लंबी हो गई।

New weapon to fight cancer Keytruda

इम्यूनोथेरेपी के अन्य विकल्प

Keytruda के अलावा भी इम्यूनोथेरेपी के कुछ और तरीके हैं:

  • CAR-T थेरेपी: इसमें मरीज की टी-सेल्स को बाहर निकालकर लैब में बदला जाता है और फिर शरीर में वापस डाला जाता है, ताकि वे कैंसर कोशिकाओं को पहचान सकें।
  • mRNA वैक्सीन: ये अभी विकास के दौर में हैं और कैंसर के दोबारा होने को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

भारत में CAR-T थेरेपी का एक स्वदेशी विकल्प NexCar19 भी उपलब्ध है, लेकिन यह अभी महंगा और सीमित है।

 

भारत में उपलब्धता और पहुंच

भारत में Keytruda जैसी दवाएं बड़े अस्पतालों में उपलब्ध हैं। लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या है – कीमत।

इस दवा की एक 100 mg की शीशी की कीमत 1.5 लाख रुपये से ज्यादा है। सामान्य तौर पर मरीज को हर तीन हफ्ते में 200 mg की जरूरत होती है। इसका मतलब है कि हर महीने लगभग 3 लाख रुपये या उससे ज्यादा खर्च आ सकता है।

यह खर्च ज्यादातर लोगों के लिए उठाना बहुत मुश्किल है।

 

कैसे मिलती है यह दवा?

कई मरीज इस दवा को सीधे खरीदने की बजाय कंपनी के “Patient Access Programme” के जरिए लेते हैं।

इस योजना के तहत:

  • मरीज को शुरुआत में कुछ डोज खरीदनी होती हैं
  • इसके बाद कंपनी कुछ डोज मुफ्त देती है

हालांकि इसके लिए कुछ शर्तें भी होती हैं, जैसे मरीज की आय और बीमा सीमा तय होती है।

कुछ मरीज स्वास्थ्य बीमा या सरकारी योजनाओं जैसे CGHS के जरिए भी इसका खर्च उठा पाते हैं।

 

इतनी महंगी क्यों है यह दवा?

Keytruda जैसी दवाएं “मोनोक्लोनल एंटीबॉडी” तकनीक से बनाई जाती हैं, जो साधारण दवाओं से काफी जटिल होती हैं।

लेकिन असली वजह इसकी ऊंची कीमत का पेटेंट भी है। जब तक कंपनी के पास पेटेंट होता है, तब तक वह दवा को अपनी तय कीमत पर बेच सकती है।

इस दवा का पेटेंट 2028 में खत्म होने की संभावना है। इसके बाद इसके सस्ते विकल्प (जेनेरिक दवाएं) बाजार में आ सकते हैं, जिससे कीमत 60-70% तक कम हो सकती है।

 

नकली दवाओं का बढ़ता खतरा

Keytruda से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा सामने आया है – नकली दवाओं का बाजार।

जांच में यह सामने आया कि:

  • नकली दवाएं असली जैसी पैकेजिंग में बेची जा रही हैं
  • अस्पताल स्तर पर भी कुछ गड़बड़ियां पाई गई हैं
  • कुछ मामलों में अंदरूनी लोगों की संलिप्तता भी सामने आई है

सबसे बड़ी समस्या यह है कि नकली और असली दवा में फर्क करना बहुत मुश्किल होता है।

 

मरीज कैसे करें असली दवा की पहचान?

मरीजों को कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए:

  • दवा हमेशा अस्पताल की फार्मेसी से ही लें
  • अधिकृत डिस्ट्रीब्यूटर से खरीदी गई दवा को प्राथमिकता दें
  • कंपनी के आधिकारिक प्रोग्राम के जरिए दवा लेना ज्यादा सुरक्षित होता है

इससे नकली दवा मिलने का खतरा काफी कम हो जाता है।

 

भारत में बढ़ता कैंसर का बोझ

भारत में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार:

  • 1990 में प्रति 1 लाख लोगों पर 84.8 मामले थे
  • 2023 में यह बढ़कर 107.2 हो गए

2022 में देश में लगभग 14 लाख कैंसर के मामले सामने आए थे, जो 2045 तक बढ़कर 24 लाख से ज्यादा हो सकते हैं।

इस बढ़ती संख्या के कारण सस्ती और प्रभावी दवाओं की जरूरत और भी ज्यादा बढ़ गई है।

 

सरकार के कदम

सरकार ने इस दवा को सस्ता बनाने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। इसमें आयात शुल्क हटाना भी शामिल है, जिससे इसकी कीमत थोड़ी कम हो सके।

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी यह दवा आम लोगों की पहुंच से बाहर है और इसके लिए और प्रयास करने की जरूरत है।

 

निष्कर्ष:

Keytruda जैसी दवाएं कैंसर के इलाज में एक नई दिशा दिखा रही हैं। यह दवा कई मरीजों के लिए उम्मीद बनकर सामने आई है और गंभीर मामलों में भी अच्छे नतीजे दे रही है।

लेकिन इसकी ऊंची कीमत, सीमित पहुंच और नकली दवाओं का खतरा इसे एक जटिल मुद्दा बना देता है।

आने वाले समय में जब इसके सस्ते विकल्प बाजार में आएंगे, तब शायद ज्यादा लोगों तक इसका फायदा पहुंच सकेगा