भोपाल की जमीन डील पर उठे सवाल : क्या अफसरों को पहले से थी बायपास और लैंड यूज बदलने की जानकारी?

मध्य प्रदेश की राजधानी Bhopal के कोलार इलाके से जुड़े गुराड़ी घाट गांव की जमीन खरीद का मामला इन दिनों चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। आरोप यह है कि साल 2022 में बड़ी संख्या में IAS, IPS और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों ने एक ही दिन यहां कृषि भूमि खरीदी और कुछ ही समय बाद उस इलाके में सरकारी विकास परियोजनाओं की घोषणा होने लगी।

अब जब उस जमीन की कीमत कई गुना बढ़ चुकी है, तो सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह सिर्फ एक सामान्य निवेश था या फिर अधिकारियों को पहले से आने वाले सरकारी प्रोजेक्ट्स की जानकारी थी? मामला इसलिए भी संवेदनशील बन गया है क्योंकि इसमें प्रशासनिक पारदर्शिता, सरकारी नियम और अंदरूनी जानकारी के इस्तेमाल जैसे मुद्दे जुड़ गए हैं।

 

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

यह मामला तब चर्चा में आया जब जमीन खरीद से जुड़े दस्तावेज और अधिकारियों के अचल संपत्ति विवरण यानी IPR रिकॉर्ड सामने आए। जानकारी के अनुसार 4 अप्रैल 2022 को गुराड़ी घाट गांव में करीब 2.023 हेक्टेयर यानी लगभग पांच एकड़ कृषि भूमि की रजिस्ट्री की गई।

दस्तावेजों में बताया गया कि यह खरीद एक ही दस्तावेज के जरिए हुई और इसमें करीब 50 हिस्सेदार शामिल थे। हालांकि वास्तविक खरीदारों की संख्या लगभग 41 बताई जा रही है।

बताया गया कि जमीन की रजिस्ट्री लगभग 5.5 करोड़ रुपये में हुई थी। उस समय यह सामान्य खेती वाली जमीन मानी जा रही थी। लेकिन अगले दो साल में हालात तेजी से बदल गए।

 

आखिर ऐसा क्या हुआ कि जमीन की कीमतें अचानक बढ़ गईं?

जमीन खरीद के करीब 16 महीने बाद अगस्त 2023 में मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल वेस्टर्न बायपास परियोजना को मंजूरी दी। यह परियोजना लगभग 3200 करोड़ रुपये की बताई गई।

सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि प्रस्तावित बायपास उसी इलाके के बेहद करीब से गुजरने वाला था जहां अधिकारियों ने जमीन खरीदी थी। बताया गया कि बायपास लाइन जमीन से करीब 500 मीटर की दूरी पर थी।

इसके बाद जून 2024 में एक और बड़ा बदलाव हुआ। जिस जमीन को पहले कृषि भूमि माना जा रहा था, उसका लैंड यूज बदलकर आवासीय कर दिया गया। यानी अब वहां घर और कॉलोनी बनाई जा सकती थी।

बस यहीं से जमीन की कीमतों में तेज उछाल आ गया। जो जमीन पहले कुछ करोड़ में खरीदी गई थी, उसकी कीमत अब 55 से 65 करोड़ रुपये तक बताई जा रही है। कुछ जगहों पर प्रति वर्ग फुट कीमत 2500 से 3000 रुपये तक पहुंचने की बात कही जा रही है।

 

एक ही दिन इतने अधिकारियों ने जमीन क्यों खरीदी?

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों ने एक ही दिन एक ही इलाके में निवेश क्यों किया?

दस्तावेजों के अनुसार निवेश करने वालों में केवल मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि दूसरे राज्यों में तैनात अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें महाराष्ट्र, हरियाणा, तेलंगाना और दिल्ली में पदस्थ अधिकारी भी बताए गए हैं।

IPR रिकॉर्ड में इस निवेश को “like-minded officers” यानी समान सोच वाले अधिकारियों का संयुक्त निवेश बताया गया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर एक साथ निवेश होना सामान्य बात नहीं मानी जा सकती।

अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल भविष्य के निवेश का मामला था या फिर सरकारी योजनाओं की जानकारी पहले से होने के कारण यह फैसला लिया गया?

 

अभी तक कोई हाउसिंग सोसायटी क्यों नहीं बनी?

मामले में एक और बात लोगों का ध्यान खींच रही है। जमीन का उपयोग बदलकर आवासीय कर दिए जाने के बाद भी अब तक वहां कोई हाउसिंग सोसायटी रजिस्टर्ड नहीं हुई है।

आमतौर पर जब किसी जमीन पर आवासीय परियोजना बननी होती है तो उसके लिए सोसायटी रजिस्ट्रेशन, प्लॉट आवंटन या डेवलपमेंट प्लान जैसी प्रक्रियाएं शुरू हो जाती हैं। लेकिन यहां अभी तक ऐसा कुछ सामने नहीं आया।

यही वजह है कि कई लोग इस निवेश को केवल “लॉन्ग टर्म प्रॉपर्टी गेम” के रूप में देख रहे हैं।

Questions raised on Bhopal land deal

अधिकारियों ने अब तक क्या कहा?

अब तक जिन अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, उनकी तरफ से सार्वजनिक रूप से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं आई है।

हालांकि बताया जा रहा है कि कई अधिकारियों ने अपनी संपत्ति रिपोर्ट में इस निवेश का जिक्र किया था, जो नियमों के अनुसार जरूरी होता है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि केवल संपत्ति घोषित कर देना ही काफी नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या किसी सरकारी परियोजना की जानकारी का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए किया गया?

 

क्या सरकारी प्रोजेक्ट की जानकारी से फायदा उठाया जा सकता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी बड़े सरकारी प्रोजेक्ट से पहले उसकी जानकारी बेहद संवेदनशील मानी जाती है।

जब किसी इलाके में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट, औद्योगिक कॉरिडोर या बायपास बनने वाला होता है, तो वहां जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। इसलिए ऐसी जानकारी सार्वजनिक होने से पहले गोपनीय रखी जाती है।

अगर किसी व्यक्ति को पहले से यह जानकारी मिल जाए कि किसी इलाके में बड़ा प्रोजेक्ट आने वाला है, तो वह वहां सस्ती जमीन खरीदकर बाद में बड़ा फायदा कमा सकता है।

यही कारण है कि सरकारी अधिकारियों पर हितों के टकराव से बचने के लिए कई नियम लागू किए जाते हैं।

 

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

यह पहला मामला नहीं है जब सरकारी परियोजनाओं से पहले जमीन खरीद को लेकर सवाल उठे हों।

 

अमरावती विवाद

Amaravati में नई राजधानी की घोषणा से पहले भी बड़े स्तर पर जमीन खरीद के आरोप लगे थे। आरोप था कि कुछ नेताओं और अधिकारियों के करीबियों ने पहले ही आसपास जमीन खरीद ली थी। बाद में जब राजधानी परियोजना आई तो जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ गईं। इस मामले में जांच एजेंसियां भी सक्रिय हुई थीं और मामला अदालत तक पहुंचा था।

 

नोएडा और गुरुग्राम के मामले

Noida, Greater Noida और Gurugram जैसे इलाकों में भी पहले ऐसे आरोप लग चुके हैं कि मेट्रो, एक्सप्रेसवे और एयरपोर्ट परियोजनाओं से पहले जमीन खरीद की गई थी। कुछ मामलों में विभागीय जांच भी हुई थी।

 

सरकारी अधिकारियों पर कौन से नियम लागू होते हैं?

भारत में सरकारी अधिकारियों के लिए संपत्ति खरीदने और निवेश करने को लेकर साफ नियम बने हुए हैं।

केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर Central Civil Services Conduct Rules लागू होते हैं, जबकि IAS, IPS और IFS अधिकारियों पर All India Services Conduct Rules लागू होते हैं।

इन नियमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी अधिकारी अपनी आय और संपत्ति को लेकर पारदर्शिता बनाए रखें।

 

क्या सरकारी अधिकारी जमीन खरीद सकते हैं?

हाँ, सरकारी अधिकारी जमीन, मकान, फ्लैट और दूसरी संपत्तियां खरीद सकते हैं। कानून उन्हें ऐसा करने से नहीं रोकता।

लेकिन कुछ शर्तें जरूरी होती हैं:

  • संपत्ति उनकी वैध आय के अनुसार होनी चाहिए
  • विभाग को इसकी जानकारी देनी होती है
  • किसी हितों के टकराव वाली स्थिति से बचना होता है
  • सरकारी पद का निजी फायदा नहीं उठाया जा सकता

अगर किसी अधिकारी की संपत्ति उसकी आय की तुलना में बहुत ज्यादा दिखाई देती है, तो जांच हो सकती है।

 

“Prior Intimation” और “Prior Permission” क्या होते हैं?

सरकारी अधिकारियों को कई मामलों में संपत्ति खरीदने से पहले अपने विभाग को जानकारी देनी होती है। इसे “Prior Intimation” कहा जाता है।

कुछ मामलों में पहले अनुमति लेना भी जरूरी होता है, जिसे “Prior Permission” कहा जाता है।

खासकर तब जब लेनदेन किसी ऐसे व्यक्ति या संस्था से जुड़ा हो जिसका अधिकारी के सरकारी काम से संबंध हो।

 

हर साल संपत्ति का ब्यौरा क्यों देना पड़ता है?

सरकारी अधिकारियों को हर साल अपनी संपत्ति का पूरा विवरण देना होता है। इसे IPR यानी Immovable Property Return कहा जाता है।

इसमें उन्हें बताना होता है कि उनके पास कितनी जमीन, मकान, निवेश और दूसरी संपत्ति है।

सरकार ऐसा इसलिए करती है ताकि:

  • भ्रष्टाचार पर नजर रखी जा सके
  • बेनामी संपत्ति रोकी जा सके
  • आय से अधिक संपत्ति के मामलों की पहचान हो सके

कई विभागों में समय पर IPR जमा नहीं करने पर प्रमोशन भी रुक सकता है।

 

नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?

अगर कोई अधिकारी संपत्ति छिपाता है, गलत जानकारी देता है या आय से ज्यादा संपत्ति पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

इसमें शामिल हो सकते हैं:

  • विभागीय जांच
  • निलंबन
  • प्रमोशन रोकना
  • वेतन संबंधी कार्रवाई
  • भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों के तहत केस

गंभीर मामलों में जांच एजेंसियां भी कार्रवाई कर सकती हैं।

 

मामले पर राजनीति भी तेज

इस मुद्दे पर अब राजनीतिक बयानबाजी भी बढ़ गई है। विपक्ष का आरोप है कि बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स से पहले अंदरूनी जानकारी के आधार पर जमीन खरीद की जाती है।

वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि अगर किसी तरह की गड़बड़ी सामने आती है तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी।

राजनीतिक बहस से अलग कई पूर्व अधिकारी भी इस मामले को गंभीर मान रहे हैं।

 

पूर्व अधिकारियों ने क्या कहा?

कुछ रिटायर्ड अधिकारियों ने कहा है कि एक ही दिन इतने अधिकारियों द्वारा जमीन खरीदना सामान्य निवेश जैसा नहीं लगता।

उनका कहना है कि अगर बाद में उसी इलाके में सरकारी परियोजना आ जाए और जमीन का लैंड यूज भी बदल जाए, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

स्थानीय ग्रामीण भी आरोप लगा रहे हैं कि पहले कम कीमत पर जमीन खरीदी गई और फिर सरकारी फैसलों से उसकी कीमत बढ़ गई।

 

असली सवाल क्या है?

इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह नहीं है कि अधिकारियों ने जमीन खरीदी या नहीं, क्योंकि कानून उन्हें निवेश करने से नहीं रोकता।

असल सवाल यह है कि क्या किसी सरकारी योजना की जानकारी सार्वजनिक होने से पहले उसका फायदा उठाया गया?

अगर ऐसा हुआ, तो यह केवल नैतिक सवाल नहीं होगा, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता के भरोसे से भी जुड़ा मामला बन जाएगा।