ट्रांसजेंडर कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! केंद्र-राज्यों को नोटिस, 6 हफ्ते में जवाब मांगा

भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर एक बार फिर बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है। यह मामला सिर्फ एक कानून का नहीं, बल्कि पहचान, गरिमा और व्यक्तिगत आज़ादी जैसे मूल अधिकारों से जुड़ा हुआ है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सभी पक्षों से 6 हफ्तों के भीतर जवाब मांगा है। इसके बाद इस मुद्दे पर तीन जजों की बड़ी बेंच सुनवाई करेगी। फिलहाल कोर्ट ने कोई अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है, क्योंकि यह कानून अभी लागू (नोटिफाई) नहीं हुआ है।

 

विवाद की जड़ क्या है?

यह पूरा विवाद 2026 में लाए गए संशोधन से शुरू हुआ है, जिसने 2019 के ट्रांसजेंडर कानून में कुछ बड़े बदलाव किए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये बदलाव ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों को कमजोर करते हैं।

सबसे बड़ा मुद्दा है – ‘सेल्फ आइडेंटिफिकेशन’ यानी अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार।
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह अधिकार ट्रांसजेंडर समुदाय को दिया था। लेकिन नए संशोधन में इस अधिकार को सीमित करने की बात कही जा रही है।

 

कोर्ट में क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने जोरदार दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि नया संशोधन सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले के खिलाफ है। उनके मुताबिक, यह कानून ट्रांसजेंडर लोगों से उनकी पहचान खुद तय करने का अधिकार छीनता है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति हार्मोनल थैरेपी ले रहा है, तो इस संशोधन के बाद उसकी स्थिति मुश्किल हो सकती है। कई लोग डर के कारण अपना इलाज तक रोक रहे हैं।

 

CJI की चिंता: क्या दुरुपयोग संभव है?

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि क्या ‘सेल्फ आइडेंटिफिकेशन’ के अधिकार का गलत इस्तेमाल हो सकता है? क्या कोई व्यक्ति झूठी पहचान बनाकर सरकारी लाभ लेने की कोशिश नहीं कर सकता?

इस पर सिंघवी ने जवाब दिया कि फिलहाल ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कोई आरक्षण लागू नहीं है, इसलिए गलत फायदा उठाने की संभावना बहुत कम है। उन्होंने कहा कि अगर बहुत ही कम मामलों में दुरुपयोग की संभावना है, तो उसके आधार पर पूरे समुदाय के अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते।

 

नया नियम: मेडिकल बोर्ड की भूमिका

2026 के संशोधन में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब ट्रांसजेंडर पहचान के लिए सिर्फ व्यक्ति की इच्छा पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए मेडिकल जांच और मेडिकल बोर्ड की सिफारिश जरूरी बताई गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे ट्रांसजेंडर व्यक्ति की निजता (प्राइवेसी) और गरिमा (डिग्निटी) का उल्लंघन होता है। अब जिला मजिस्ट्रेट मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर ही पहचान पत्र जारी करेंगे।

जस्टिस बागची ने इस पर टिप्पणी की कि संसद किसी कानून के आधार को बदल सकती है। यानी विधायिका को कानून में बदलाव का अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बदलाव संविधान के अनुरूप है या नहीं।

Supreme Court strict on transgender law

सरकार का पक्ष क्या है?

सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस कानून का मकसद किसी की पहचान छीनना नहीं है। बल्कि यह जबरन लिंग परिवर्तन और बच्चों के साथ होने वाले अत्याचार जैसे मामलों को रोकने के लिए लाया गया है।

उन्होंने साफ किया कि यह कानून किसी व्यक्ति को पुरुष या महिला के रूप में पहचान से बाहर नहीं करता। सरकार का कहना है कि यह संशोधन सुरक्षा और व्यवस्था को मजबूत करने के लिए है।

 

क्या याचिकाएं समय से पहले दाखिल हुईं?

एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया कि इस कानून को अभी तक लागू नहीं किया गया है। यानी केंद्र सरकार ने इसे नोटिफाई नहीं किया है।

एक पक्ष ने कोर्ट में कहा कि जब कानून लागू ही नहीं हुआ, तो उसके खिलाफ याचिका दाखिल करना जल्दबाजी है। उनका कहना था कि सरकार के साथ बातचीत चल रही है और कोर्ट का दखल उस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को नजरअंदाज करते हुए नोटिस जारी कर दिया और सभी पक्षों से जवाब मांगा।

 

2014 का ऐतिहासिक फैसला क्या कहता था?

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार ट्रांसजेंडर समुदाय को कानूनी पहचान दी थी। कोर्ट ने माना था कि हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपनी लैंगिक पहचान खुद तय करे।

इस फैसले में कहा गया था कि जेंडर सिर्फ शरीर के आधार पर तय नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति के मन और भावनाओं से जुड़ा होता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि इसके लिए किसी मेडिकल सर्टिफिकेट या सर्जरी की जरूरत नहीं है।

इस फैसले को आर्टिकल 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से जोड़ा गया था, जिसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है।

 

नए संशोधन में क्या-क्या बदला?

2026 के संशोधन में कई अहम बदलाव किए गए हैं:

 

1. परिभाषा में बदलाव: पहले ट्रांसजेंडर की पहचान व्यक्ति के अनुभव और भावना पर आधारित थी। अब इसमें मेडिकल और बायोलॉजिकल आधार जोड़े गए हैं।

 

2. सर्टिफिकेट अनिवार्य: अगर कोई व्यक्ति जेंडर अफर्मिंग सर्जरी कराता है, तो अब उसे नया सर्टिफिकेट लेना जरूरी होगा। पहले यह वैकल्पिक था।

 

3. सजा में अंतर: याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ यौन अपराधों में सजा कम रखी गई है, जो भेदभावपूर्ण है।

 

याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्क

याचिका दायर करने वाले लोगों में लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी, जैनब पटेल और अन्य शामिल हैं। उनका कहना है कि यह संशोधन संविधान के कई अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है:

  • आर्टिकल 14: समानता का अधिकार
  • आर्टिकल 15: भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा
  • आर्टिकल 19: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • आर्टिकल 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

उनका कहना है कि संसद किसी ऐसे अधिकार को खत्म नहीं कर सकती, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकार घोषित किया हो।

 

LGBTQIA+ समुदाय की प्रतिक्रिया

इस संशोधन का LGBTQIA+ समुदाय के कई संगठनों ने विरोध किया है। उनका कहना है कि इस कानून को लाने से पहले उनसे कोई सलाह नहीं ली गई।

नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स के कुछ सदस्यों ने विरोध में इस्तीफा तक दे दिया। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने भी सरकार से इस कानून को वापस लेने की मांग की है।

 

बड़ा संवैधानिक सवाल

यह मामला अब सिर्फ एक कानून तक सीमित नहीं रहा। यह एक बड़े सवाल में बदल गया है –

क्या संसद किसी ऐसे अधिकार को बदल सकती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकार बताया हो?

अगर कोर्ट इस संशोधन को सही मानता है, तो इसका असर सिर्फ ट्रांसजेंडर समुदाय तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य में मौलिक अधिकारों की व्याख्या को भी प्रभावित कर सकता है।

 

आगे क्या होगा?

अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। तीन जजों की बेंच इस मामले की गहराई से जांच करेगी और तय करेगी कि 2026 का संशोधन संविधान के दायरे में है या नहीं।

यह फैसला न सिर्फ ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक अहम मिसाल बन सकता है।

 

निष्कर्ष:

ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर भारत ने 2014 में एक प्रगतिशील कदम उठाया था, जिसमें व्यक्ति की पहचान को उसकी अपनी पसंद से जोड़ दिया गया था। लेकिन 2026 का नया संशोधन इस दिशा को बदलता नजर आ रहा है।