भारत के प्रधानमंत्री समय-समय पर विभिन्न देशों की आधिकारिक यात्राएं करते रहते हैं। इन दौरों का उद्देश्य केवल द्विपक्षीय समझौतों, व्यापारिक सहयोग या रणनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं होता, बल्कि इनमें राजनयिक शिष्टाचार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
जब कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्राध्यक्ष किसी दूसरे देश की यात्रा पर जाता है, तो वह आमतौर पर अपने साथ कुछ विशेष और सांस्कृतिक महत्व के उपहार ले जाता है। ये उपहार उस देश की विरासत, कारीगरी या कला-संस्कृति को दर्शाते हैं—जैसे बनारसी शॉल, मधुबनी पेंटिंग, कन्नौज का इत्र, कांजीवरम रेशमी साड़ी या पारंपरिक मूर्तियाँ। इसी तरह, जब कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री से मिलता है, तो वह भी भारतीय प्रधानमंत्री को अपने देश की सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने वाले उपहार देता है।
जैसे हाल ही में अमेरिका यात्रा के दौरान मशहूर बिजनेसमैन एलन मस्क ने प्रधानमंत्री मोदी को स्पेसएक्स की स्टारशिप फ्लाइट टेस्ट 5 का हीट शील्ड (कवच) से बना एक मोमेंटो भेंट किया, जो अंतरिक्षयान को उच्च तापमान से सुरक्षित रखने वाला एक तकनीकी उपकरण है।
🔹हाल की यात्राएं और भेंट किए गए उपहार:
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साइप्रस, कनाडा और क्रोएशिया की यात्रा पर गए थे। इस यात्रा के दौरान वह कनाडा में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन में भी शामिल हुए और विश्व नेताओं से मुलाकात की। इन अवसरों पर उन्होंने भारतीय पारंपरिक कला से जुड़े विशिष्ट उपहार भेंट किए। साइप्रस में उन्होंने राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिडेस को कश्मीर का पारंपरिक सिल्क कालीन भेंट किया। कनाडा में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को बौद्ध परंपरा में आत्मज्ञान और शांति का प्रतीक—पीतल का बोधि वृक्ष—भेंट किया। वहीं, कनाडा की गवर्नर जनरल मैरी साइमन को ओडिशा के कटक की ‘तारकासी’ कला में बना सिल्वर फिलिग्री वर्क क्लच पर्स भेंट किया गया।
इसी शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को छत्तीसगढ़ व झारखंड की जनजातीय धातु कला—डोकरा शिल्पकला में बनी नंदी की मूर्ति भेंट की। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ को महाराष्ट्र के कोल्हापुर की पारंपरिक धातु-कला से बनी चांदी की सुराही भेंट की गई। क्रोएशिया यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति जोरान मिलनोविच को पौराणिक कथाओं और प्राकृतिक रंगों पर आधारित ओडिशा की पट्टचित्र पेंटिंग भेंट की, जबकि प्रधानमंत्री आंद्रेज प्लेंकोविच को राजस्थान की पारंपरिक धातु-कला का प्रतीक सुंदर सिल्वर कैंडल स्टैंड दिया।
🔹 राजनीतिक उपहारों का ऐतिहासिक क्रम-
यदि राजनीतिक उपहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात करें, तो इसकी शुरुआत कम से कम ईसा पूर्व 1200 तक मानी जाती है। मिस्र और अन्य समकालीन शासकों के बीच हुए पत्राचार के संग्रह ‘अमार्ना पत्रों’ में यह उल्लेख मिलता है कि शासक एक-दूसरे को उपहार भेजते थे, जिनमें सोना, कीमती पत्थर, हथियार, हाथी-दांत और गुलाम शामिल होते थे। यदि उपहार की गुणवत्ता या मूल्य अपेक्षित स्तर से कम होता, तो शिकायतें भी दर्ज होती थीं। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय उपहारों का आदान-प्रदान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक आवश्यक राजनयिक परंपरा था।
मुगलकाल में तोशाखाना की परंपरा रही, जहाँ विदेशी मेहमानों द्वारा दिए गए उपहार दर्ज किए जाते थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के दौर में भी यह चलन रहा। वे जब भारतीय दरबारों में आते थे, तो कीमती वस्तुएँ जैसे बंदूकें, घड़ियाँ, कपड़े और दुर्लभ वस्तुएँ उपहारस्वरूप लाते और प्राप्त करते थे। इन उपहारों को केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि अधीनता और संबंधों के संकेत के रूप में देखा जाता था। इस्लामी दुनिया, विशेषकर ओटोमन साम्राज्य में भी ‘पेशकश’ देने की परंपरा रही, जहाँ उपहारों को शाही दरबार की मान्यता के तौर पर स्वीकार किया जाता था।
वर्तमान भारत में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या अन्य उच्च पदाधिकारी जब विदेश यात्रा करते हैं, तो उन्हें जो उपहार मिलते हैं, वे व्यक्तिगत नहीं होते, बल्कि उनके पद को दिए गए माने जाते हैं। इन उपहारों की देखरेख और संग्रहण के लिए भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अधीन ‘तोशाखाना’ नामक एक विभाग कार्यरत है। तोशाखाना का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करना है।
🔹 भारत में तोशाखाना व्यवस्था:
भारत में तोशाखाना व्यवस्था के तहत ₹5000 तक का उपहार कोई भी अधिकारी बिना मूल्य चुकाए अपने पास रख सकता है। यदि उपहार की कीमत ₹5000 से अधिक है, तो वह उसे केवल तब रख सकता है जब वह निर्धारित राशि जमा कर दे। यह राशि उपहार के मूल्य से ₹5000 घटाकर तय होती है। इसके अतिरिक्त, विदेश यात्रा से लौटने के एक महीने के भीतर इन उपहारों को तोशाखाना में जमा कराना अनिवार्य होता है। यह भी स्पष्ट रूप से निर्धारित है कि ये उपहार प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होते, बल्कि भारत सरकार की संपत्ति होते हैं।
एक उदाहरण के रूप में, वर्ष 2016 में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को एक विदेशी दौरे पर ₹50,000 की एक पेंटिंग उपहार में मिली थी। उन्होंने तोशाखाना के नियमों के अनुसार ₹45,000 चुकाकर उस पेंटिंग को अपने पास रखा। यह पारदर्शी व्यवस्था का स्पष्ट उदाहरण है।
🔹 क्या उपहारों को लेकर कभी विवाद भी हुआ है ?
हाँ, उपहारों को लेकर राजनीतिक विवाद भी समय-समय पर सामने आए हैं। पाकिस्तान में ऐसा ही एक विवाद तब उभरा जब 2018 में प्रधानमंत्री बने इमरान खान को खाड़ी देशों की यात्राओं के दौरान कई महंगे उपहार मिले। पाकिस्तान में भी तोशाखाना व्यवस्था है, जिसके तहत उपहारों को सरकारी खजाने में जमा कराना अनिवार्य होता है। लेकिन अगस्त 2022 में इमरान खान पर आरोप लगा कि उन्होंने इन उपहारों की जानकारी अपनी संपत्ति घोषणा में नहीं दी और कुछ महंगी घड़ियाँ—जैसे Rolex—बेच दीं, जिससे उन्होंने करीब 3.6 करोड़ पाकिस्तानी रुपये की कमाई की। इमरान खान ने सफाई दी कि उन्होंने कानूनी प्रक्रिया से 2.1 करोड़ रुपये देकर ये उपहार खरीदे और अनुमति लेकर बेचे।
हालांकि अक्टूबर 2022 में पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 5 वर्षों तक किसी भी सार्वजनिक पद के लिए अयोग्य करार दिया और भ्रष्टाचार कानूनों के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। यह स्पष्ट हुआ कि राजनयिक उपहार केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक जवाबदेही वाली सरकारी संपत्ति होते हैं।
पाकिस्तान में यह विवाद केवल इमरान खान तक सीमित नहीं रहा। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने कार्यकाल के दौरान विदेशी मेहमानों से मिली करोड़ों की BMW और टोयोटा लेक्सस कारें अपने पास रखीं और इसके बदले केवल 1.61 करोड़ रुपये अदा किए। नवाज शरीफ और उनकी पत्नी कुलसूम नवाज ने भी Rolex घड़ी, कीमती गहने और अन्य उपहार बहुत कम कीमत में अपने पास रख लिए। इन मामलों में परवेज मुशर्रफ, राजा परवेज अशरफ और यूसुफ रजा गिलानी जैसे नाम भी सामने आए। एक रिपोर्ट के अनुसार, इन नेताओं ने उपहार में मिली सोने की AK-47 तक अपने घर ले ली।
🔹 भारत में भी उपहारों को लेकर विवाद हुआ-
भारत में भी तोशाखाना से जुड़ी व्यवस्था को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। 2014 में जब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद से हटे, तब यह सामने आया कि उन्होंने विदेश यात्राओं के दौरान राष्ट्राध्यक्षों द्वारा दिए गए 101 उपहार अपने पास रखे। यह जानकारी बरेली के वकील मोहम्मद खालिद जिलानी द्वारा दायर RTI के माध्यम से सामने आई।
RTI के अनुसार:
- वर्ष 2004 से 2014 तक डॉ. सिंह को कुल 383 उपहार मिले, इनमें से 101 उपहार उन्होंने पद छोड़ते समय नियमों के तहत मूल्य चुका कर अपने पास रखे। यह जानकारी सार्वजनिक होने के बाद सवाल उठे कि क्या इन उपहारों का मूल्यांकन और खरीद पूरी पारदर्शिता से किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विदेश यात्राओं और कार्यक्रमों के दौरान बड़ी संख्या में उपहार मिलते हैं। इन उपहारों को तोशाखाना में दर्ज कर उनकी सार्वजनिक नीलामी की परंपरा 2018 में शुरू की गई। यह एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था के रूप में उभरी।
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए 2018 से तोशाखाना में दर्ज उपहारों की सार्वजनिक नीलामी की शुरुआत की।
2018 में पहली बार 1500 से अधिक उपहारों की नीलामी हुई, फिर 2019 में 2500 से अधिक उपहारों की नीलामी की गई। 2020 में COVID-19 के कारण यह प्रक्रिया स्थगित रही, लेकिन 2021 में फिर से 2500+ उपहारों की नीलामी की गई। इस नीलामी से प्राप्त आय को ‘नमामि गंगे मिशन’ के लिए दान किया गया। इस पहल से यह स्पष्ट संदेश गया कि राजनयिक उपहार केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति हैं, जिनका नियमानुसार उपयोग और लेखा-जोखा अनिवार्य है।

