पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान युद्ध को लगभग दो महीने हो चुके हैं, लेकिन हालात अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। एक तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति समझौते की कोशिशें जारी हैं, वहीं दूसरी ओर हाल ही में सामने आई एक जानकारी ने पूरे क्षेत्र की राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को नई दिशा दे दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध के शुरुआती दिनों में इजराइल ने चुपचाप अपना मशहूर एयर डिफेंस सिस्टम ‘आयरन डोम’ संयुक्त अरब अमीरात में तैनात किया था।
यह कदम कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि पहली बार इजराइल ने अपने इस अत्याधुनिक रक्षा सिस्टम को किसी अन्य देश में भेजा। इससे साफ संकेत मिलता है कि पश्चिम एशिया में सुरक्षा सहयोग का नया ढांचा बन रहा है, जो भविष्य में क्षेत्रीय गठबंधनों को पूरी तरह बदल सकता है।
युद्ध की शुरुआत और यूएई पर हमला
जब युद्ध की शुरुआत हुई, तो हालात तेजी से बिगड़े। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के खिलाफ बड़े हमले किए। इन हमलों में ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इसके जवाब में ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाया।
ईरान ने न केवल इजराइल, बल्कि उन देशों को भी निशाना बनाया जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इसमें यूएई भी शामिल था। आंकड़ों के अनुसार, ईरान ने यूएई की ओर करीब 560 बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें दागीं, साथ ही 2250 से ज्यादा ड्रोन हमले भी किए गए।
हालांकि यूएई की एयर डिफेंस प्रणाली ने अधिकांश हमलों को रोक लिया, लेकिन कुछ मिसाइलें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल रहीं। इन हमलों में 11 लोगों की मौत हुई और करीब 188 लोग घायल हुए। इस दौरान यूएई को ईरान के सबसे बड़े निशानों में से एक माना गया।

यूएई ने मांगी इजराइल से मदद
जब हालात गंभीर होते गए, तो यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नहयान ने सीधे इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से संपर्क किया। उन्होंने देश की सुरक्षा के लिए मदद मांगी।
इसके बाद नेतन्याहू ने तुरंत फैसला लेते हुए इजराइल डिफेंस फोर्स (IDF) को निर्देश दिया कि वे यूएई की मदद करें। इसी के तहत एक आयरन डोम बैटरी, इंटरसेप्टर मिसाइलें और कई ऑपरेटर यूएई भेजे गए।
यह पहली बार था जब इजराइल ने अपने इस महत्वपूर्ण रक्षा सिस्टम को किसी विदेशी जमीन पर तैनात किया। इससे यह साफ हो गया कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुका है।
क्या है ‘आयरन डोम’ और क्यों है खास?
आयरन डोम दुनिया के सबसे प्रभावी एयर डिफेंस सिस्टम्स में से एक माना जाता है। इसे इजराइल और अमेरिका ने मिलकर विकसित किया है। इसकी खासियत यह है कि यह आने वाली मिसाइलों, ड्रोन, रॉकेट और मोर्टार को हवा में ही नष्ट कर सकता है।
इसकी सफलता दर 90% से ज्यादा बताई जाती है। इसकी एक और खास बात यह है कि यह हर मिसाइल को नहीं रोकता, बल्कि केवल उन्हीं खतरों को निशाना बनाता है जो आबादी या महत्वपूर्ण जगहों के लिए खतरा बनते हैं। इससे लागत भी कम होती है और सिस्टम ज्यादा प्रभावी रहता है।
यूएई में तैनाती के बाद इस सिस्टम ने कई मिसाइलों और ड्रोन को सफलतापूर्वक नष्ट किया, जिससे बड़े नुकसान को टाला जा सका।
इजराइल की सैन्य कार्रवाई भी जारी
सिर्फ रक्षा तक ही सीमित नहीं, इजराइल ने आक्रामक रणनीति भी अपनाई। रिपोर्ट्स के अनुसार, इजराइली वायुसेना ने ईरान के दक्षिणी हिस्सों में मौजूद कई शॉर्ट-रेंज मिसाइल लॉन्च साइट्स पर हमले किए। इन हमलों का मकसद था कि मिसाइलें लॉन्च होने से पहले ही नष्ट कर दी जाएं।
इससे यूएई और अन्य खाड़ी देशों पर हमलों का खतरा काफी हद तक कम हो गया।
यूएई-इजराइल रिश्तों में नई मजबूती
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के रिश्तों में बढ़ती नजदीकी को भी दर्शाता है। साल 2020 में दोनों देशों के बीच ‘अब्राहम समझौता’ हुआ था, जिसके बाद दोनों देशों ने आधिकारिक तौर पर संबंध सामान्य किए।
इस समझौते के बाद शिक्षा, व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा। दोनों देशों ने एक-दूसरे के यहां दूतावास खोले और सीधी उड़ानें भी शुरू कीं।
हालांकि 2025 में हमास-इजराइल युद्ध के दौरान कुछ मतभेद सामने आए थे, लेकिन ईरान के साथ चल रहे इस युद्ध ने दोनों देशों को फिर से करीब ला दिया है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि आयरन डोम की तैनाती सिर्फ एक सैन्य कदम नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक बड़े सुरक्षा नेटवर्क की नींव है। उनका कहना है कि पश्चिम एशिया में एक संयुक्त एयर डिफेंस सिस्टम तैयार किया जा रहा है, जिसमें कई देश शामिल हो सकते हैं।
इसका असर सिर्फ ईरान पर ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब, कतर और यहां तक कि अमेरिका की रणनीति पर भी पड़ेगा।
सऊदी अरब को क्यों नहीं मिला आयरन डोम?
दिलचस्प बात यह है कि जहां यूएई को इजराइल ने आयरन डोम दिया, वहीं सऊदी अरब को यह सुविधा नहीं मिली। जबकि सऊदी अरब भी ईरान के हमलों का सामना कर रहा था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब ने अमेरिका से कहा था कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को और तेज किया जाए। यहां तक कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस युद्ध को “ऐतिहासिक अवसर” बताया था।
हालांकि इजराइल और सऊदी अरब के बीच अभी तक पूरी तरह से संबंध सामान्य नहीं हुए हैं। सऊदी अरब ने साफ किया है कि वह इजराइल से रिश्ते तभी मजबूत करेगा जब फिलिस्तीन मुद्दे पर ठोस कदम उठाए जाएंगे।
क्षेत्रीय राजनीति पर असर
यूएई में आयरन डोम की तैनाती ने यह साफ कर दिया है कि पश्चिम एशिया में नए गठबंधन बन रहे हैं। अब देश केवल पारंपरिक सहयोगियों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाश रहे हैं।
यह घटनाक्रम यह भी दिखाता है कि युद्ध केवल मैदान में नहीं, बल्कि रणनीति और गठबंधनों के स्तर पर भी लड़ा जा रहा है।
क्या आगे बढ़ेगा यह सहयोग?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह सहयोग आगे बढ़ता है, तो आने वाले समय में एक संयुक्त रक्षा नेटवर्क तैयार हो सकता है, जिसमें अमेरिका, इजराइल और खाड़ी देश मिलकर काम करेंगे।
यह नेटवर्क ईरान जैसे देशों के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार कर सकता है। हालांकि इससे क्षेत्र में तनाव भी बढ़ सकता है, क्योंकि ईरान इसे अपने खिलाफ एक बड़े गठबंधन के रूप में देख सकता है।
