नई दिल्ली में हाल ही में हुई ब्रिक्स समूह की एक अहम बैठक उस समय चर्चा का केंद्र बन गई जब इसमें शामिल सदस्य देश किसी साझा निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके। यह बैठक पश्चिम एशिया में जारी तनाव और संघर्ष को लेकर आयोजित की गई थी, लेकिन गहरे मतभेदों के कारण कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। खास तौर पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच मतभेद इतने तीखे थे कि बातचीत का नतीजा सिर्फ एक ‘अध्यक्षीय बयान’ तक सीमित रह गया।
यह बैठक 23 और 24 अप्रैल को आयोजित हुई थी, जिसमें ब्रिक्स देशों के उप विदेश मंत्री और मध्य पूर्व व उत्तरी अफ्रीका (MENA) मामलों के विशेष दूत शामिल हुए थे। इस बैठक का मकसद था पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष पर साझा रणनीति और दृष्टिकोण तैयार करना। लेकिन जो उम्मीद थी, वह पूरी नहीं हो सकी।
क्यों नहीं बन पाई सहमति?
सूत्रों के मुताबिक, बैठक में सबसे बड़ी बाधा ईरान और UAE के बीच टकराव रहा। दोनों देश इस समय पश्चिम एशिया के संघर्ष में अलग-अलग पक्षों के रूप में सामने आए हैं और दोनों की प्राथमिकताएं व मांगें भी अलग हैं।
ईरान चाहता था कि ब्रिक्स मंच से उसके खिलाफ हुए हमलों की खुलकर निंदा की जाए। वहीं UAE का रुख इससे अलग था और वह अपने नजरिए को लेकर अड़ा रहा। इस वजह से दोनों देशों के बीच सहमति बन पाना मुश्किल हो गया।
अन्य सदस्य देशों ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश जरूर की, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो पाया। नतीजतन, बैठक बिना किसी संयुक्त दस्तावेज के समाप्त हो गई।
‘अध्यक्षीय बयान’ क्यों जारी करना पड़ा?
जब किसी बहुपक्षीय बैठक में सभी देश किसी मुद्दे पर सहमत नहीं होते, तो संयुक्त बयान जारी नहीं किया जा सकता। ऐसे में बैठक की अध्यक्षता करने वाला देश अपने स्तर पर एक बयान जारी करता है, जिसे ‘अध्यक्षीय बयान’ कहा जाता है।
इस बैठक में भी भारत ने यही किया। इस बयान में यह जरूर कहा गया कि सभी देशों ने पश्चिम एशिया की स्थिति पर गहरी चिंता जताई, लेकिन इसमें किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध की बात नहीं कही गई।

किन मुद्दों पर हुई चर्चा?
हालांकि सहमति नहीं बन सकी, लेकिन बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इनमें शामिल थे –
- गाजा में जारी संघर्ष और मानवीय संकट
- फिलिस्तीन का मुद्दा
- संयुक्त राष्ट्र राहत एजेंसी (UNRWA) की भूमिका
- आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख
- लेबनान में संघर्षविराम का स्वागत
- सीरिया के पुनर्निर्माण की जरूरत
- यमन, इराक और लीबिया में राजनीतिक स्थिरता
इन सभी विषयों पर सदस्य देशों ने अपने-अपने विचार रखे, लेकिन साझा निष्कर्ष नहीं निकल पाया।
भारत का रुख क्या रहा?
इस पूरी स्थिति में भारत ने संतुलित और पहले से तय रुख को ही बनाए रखा। भारत लंबे समय से फिलिस्तीन मुद्दे पर ‘दो-राष्ट्र समाधान’ का समर्थन करता रहा है और इस बैठक में भी उसने यही बात दोहराई।
भारत का मानना है कि इजरायल और फिलिस्तीन के बीच स्थायी शांति तभी संभव है जब दोनों देशों को स्वतंत्र रूप से अस्तित्व का अधिकार मिले। इस रुख को भारत पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रख चुका है।
ब्रिक्स के लिए चुनौती क्यों?
ब्रिक्स एक ऐसा समूह है जिसमें अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक सोच वाले देश शामिल हैं। हाल के वर्षों में इसका विस्तार भी हुआ है और अब इसमें ईरान जैसे देश भी शामिल हो चुके हैं।
ऐसे में जब कोई मुद्दा सीधे सदस्य देशों के हितों से जुड़ा हो, तो सहमति बनाना और भी मुश्किल हो जाता है। यही इस बैठक में भी देखने को मिला।
ईरान और UAE दोनों ही ब्रिक्स के सदस्य हैं और दोनों के बीच चल रहा तनाव इस समूह के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरा है।
क्या भविष्य में बन पाएगी सहमति?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मतभेद भविष्य में भी सामने आ सकते हैं, खासकर तब जब समूह में शामिल देशों के हित आपस में टकराते हों।
हालांकि, यह भी सच है कि ब्रिक्स जैसे मंच पर बातचीत जारी रहना ही अपने आप में एक सकारात्मक संकेत है। इससे यह उम्मीद बनी रहती है कि समय के साथ कोई साझा रास्ता निकाला जा सकता है।
अगले कदम क्या होंगे?
अब अगली बड़ी बैठक ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की होगी, जो अगले महीने प्रस्तावित है। इसके बाद साल के अंत में शिखर सम्मेलन भी होना है।
इन बैठकों में फिर से पश्चिम एशिया का मुद्दा उठ सकता है और कोशिश की जाएगी कि किसी साझा बयान तक पहुंचा जा सके।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, इसलिए इस तरह की स्थिति उसके लिए कूटनीतिक चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए क्योंकि उसे सभी देशों को साथ लेकर चलना है, और अवसर इसलिए क्योंकि वह मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
भारत ने अब तक संतुलित और शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की है, जो उसकी विदेश नीति का अहम हिस्सा रहा है।
मानवीय सहायता में भारत की भूमिका
गाजा में जारी संकट के बीच भारत ने मानवीय सहायता भी भेजी है। अब तक करीब 70 मीट्रिक टन सहायता भेजी जा चुकी है, जिसमें दवाइयां और जरूरी सामग्री शामिल हैं।
इसके अलावा, भारत ने संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी UNRWA को आर्थिक मदद भी दी है, जिससे फिलिस्तीनी शरणार्थियों की मदद की जा सके।
निष्कर्ष:
नई दिल्ली में हुई यह बैठक भले ही किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन इसने यह साफ कर दिया कि ब्रिक्स जैसे बड़े मंच पर भी आंतरिक मतभेद कितने गहरे हो सकते हैं। पश्चिम एशिया का संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर रहा है।
ईरान और UAE के बीच टकराव ने इस बैठक को बेनतीजा बना दिया, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि आने वाले समय में ब्रिक्स को अपने अंदर के मतभेदों को संभालने के लिए और मजबूत तंत्र विकसित करना होगा।
