मट्टाला एयरपोर्ट बना सिरदर्द! श्रीलंका ढूंढ रहा नए निवेशक – क्या बदलेगी इसकी किस्मत?

श्रीलंका की सरकार ने अपने सबसे चर्चित लेकिन लंबे समय से घाटे में चल रहे हवाई अड्डे – मट्टाला राजपक्षे इंटरनेशनल एयरपोर्ट – को फिर से जिंदा करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने घरेलू और विदेशी निवेशकों से प्रस्ताव मांगे हैं, ताकि इस एयरपोर्ट को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाया जा सके। यह फैसला तब लिया गया है जब भारत और रूस की एक संयुक्त कंपनी के साथ 30 साल की लीज का प्लान आगे नहीं बढ़ पाया।
यह एयरपोर्ट पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चालू है, लेकिन यहां नियमित उड़ानों का लगभग अभाव रहा है। इसी वजह से इसे कई बार ‘भूतिया एयरपोर्ट’ या ‘दुनिया का सबसे खाली एयरपोर्ट’ जैसे नाम भी दिए गए। अब सरकार को उम्मीद है कि नए निवेशकों की मदद से यह स्थिति बदली जा सकती है।


क्यों चर्चा में है यह एयरपोर्ट?
श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से में स्थित यह एयरपोर्ट साल 2013 में शुरू किया गया था। इसे देश के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के नाम पर बनाया गया था। इस परियोजना को चीन से लिए गए बड़े कर्ज की मदद से पूरा किया गया था। उस समय इसे देश के विकास की बड़ी योजना के रूप में देखा गया था, लेकिन समय के साथ यह एक आर्थिक बोझ बन गया।
एयरपोर्ट के शुरू होने के बाद से ही यहां यात्रियों की संख्या बेहद कम रही। हालत यह रही कि यह अपने बिजली के बिल तक निकालने में सक्षम नहीं हो पाया। ऐसे में सरकार को हर साल इसमें पैसा लगाना पड़ा, जिससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ता गया।


निवेशकों के लिए नया मौका
सरकार ने अब इस एयरपोर्ट के लिए ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ यानी निवेश प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। इसके तहत कंपनियां, फर्म, संयुक्त उद्यम और अन्य संस्थाएं इस एयरपोर्ट के संचालन और विकास के लिए आवेदन कर सकती हैं।
सरकार का कहना है कि इस एयरपोर्ट में पर्यटन और व्यापार के लिहाज से काफी संभावनाएं हैं। खासकर दक्षिणी तट पर स्थित होने के कारण यहां विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है। इसके अलावा इसे लॉजिस्टिक्स और कार्गो हब के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि एयरपोर्ट के सभी हिस्सों – जैसे रनवे, टर्मिनल और अन्य सुविधाओं – के विकास के लिए निवेशकों को मौका दिया जाएगा।

Mattala Airport becomes a headache

पहले क्यों फेल हुआ लीज प्लान?

करीब दो साल पहले श्रीलंका सरकार ने इस एयरपोर्ट को 30 साल के लिए भारत और रूस की कंपनियों के एक संयुक्त उद्यम को देने की घोषणा की थी। लेकिन यह योजना जमीन पर नहीं उतर पाई।

इस असफलता के पीछे कई कारण बताए जाते हैं, जिनमें आर्थिक अनिश्चितता, निवेश जोखिम और एयरपोर्ट की कम उपयोगिता शामिल हैं। निवेशकों को यह भरोसा नहीं हो पाया कि यह प्रोजेक्ट भविष्य में लाभ दे पाएगा।

 

लोकेशन बनी सबसे बड़ी चुनौती

इस एयरपोर्ट की सबसे बड़ी समस्या इसकी लोकेशन मानी जाती है। यह एक वन्यजीव अभयारण्य के पास स्थित है और प्रवासी पक्षियों के रास्ते में आता है। इस कारण यहां कई बार ‘बर्ड स्ट्राइक’ यानी पक्षियों से टकराने की घटनाएं हुई हैं, जिससे उड़ानों को खतरा बना रहता है।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि एक समय सेना को बुलाकर रनवे से जानवरों – जैसे हिरण, जंगली भैंस और हाथी – को हटाना पड़ा। यह स्थिति किसी भी निवेशक के लिए चिंता का विषय बन सकती है।

 

सीमित उपयोग, कम कमाई

अभी यह एयरपोर्ट मुख्य रूप से एक बैकअप के रूप में इस्तेमाल होता है। जब राजधानी कोलंबो के मुख्य एयरपोर्ट पर मौसम खराब होता है, तब यहां विमानों को डायवर्ट किया जाता है। इसके अलावा कुछ कार्गो और चार्टर फ्लाइट्स ही यहां आती-जाती हैं।

लेकिन इनसे होने वाली कमाई इतनी नहीं है कि एयरपोर्ट का खर्च पूरा हो सके। यही कारण है कि सरकार इसे निजी हाथों में देकर बेहतर तरीके से चलाना चाहती है।

 

चीन का कर्ज और आर्थिक संकट का असर

यह एयरपोर्ट उन कई परियोजनाओं में शामिल है, जिन्हें चीन से लिए गए कर्ज से बनाया गया था। बाद में इनमें से कई प्रोजेक्ट्स आर्थिक रूप से सफल नहीं हो पाए।

श्रीलंका पर बढ़ते कर्ज का दबाव इतना ज्यादा हो गया कि 2022 में देश को अपने 46 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज पर डिफॉल्ट करना पड़ा। यह देश के इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक संकट था।

इस संकट से उबरने के लिए श्रीलंका को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मदद लेनी पड़ी। इसके बाद सरकार ने कई घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों को निजीकरण के जरिए सुधारने की कोशिश शुरू की।

 

हंबनटोटा पोर्ट का उदाहरण

इस एयरपोर्ट के पास ही हंबनटोटा बंदरगाह भी स्थित है। 2017 में श्रीलंका इस बंदरगाह का कर्ज चुकाने में असमर्थ रहा, जिसके बाद इसे चीन की एक कंपनी को 99 साल के लिए लीज पर देना पड़ा।

इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘कर्ज जाल’ को लेकर चिंता बढ़ा दी थी। अब मट्टाला एयरपोर्ट के मामले में भी सरकार सतर्कता बरतना चाहती है।

 

सरकार की रणनीति क्या है?

सरकार अब इस एयरपोर्ट को पूरी तरह बंद करने के बजाय इसे नए तरीके से इस्तेमाल करना चाहती है। इसके लिए तीन मुख्य रणनीतियों पर काम किया जा रहा है:

  1. निजी निवेश लाना – ताकि सरकार पर आर्थिक बोझ कम हो
  2. पर्यटन को बढ़ावा देना – दक्षिणी तट के आकर्षण का उपयोग करना
  3. लॉजिस्टिक्स हब बनाना – कार्गो और व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाना

सरकार का मानना है कि सही निवेश और योजना के साथ यह एयरपोर्ट भविष्य में मुनाफा दे सकता है।

 

क्या निवेशक आगे आएंगे?

यह सबसे बड़ा सवाल है। एयरपोर्ट की पिछली असफलता, कम यात्री संख्या और लोकेशन से जुड़ी समस्याएं निवेशकों को सोचने पर मजबूर कर सकती हैं।

हालांकि, अगर सरकार बेहतर नीतियां, कर छूट और सुविधाएं देती है, तो कुछ निवेशक इसमें रुचि दिखा सकते हैं। खासकर वे कंपनियां जो लंबे समय के निवेश में विश्वास रखती हैं और जोखिम लेने को तैयार हैं।

 

पर्यटन की उम्मीद

श्रीलंका एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल रहा है। समुद्र तट, जंगल और ऐतिहासिक जगहें यहां बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। अगर इस एयरपोर्ट को सही तरीके से पर्यटन से जोड़ा जाए, तो इसकी उपयोगिता बढ़ सकती है।

सरकार का मानना है कि यह एयरपोर्ट ‘एक्सोटिक टूरिज्म’ यानी खास और अनोखे पर्यटन के लिए एक बड़ा केंद्र बन सकता है।

 

आगे की राह

मट्टाला एयरपोर्ट का भविष्य अब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार निवेशकों को कितना आकर्षित कर पाती है और उन्हें कितनी सुविधाएं देती है।

अगर सही रणनीति अपनाई गई, तो यह एयरपोर्ट एक असफल परियोजना से सफल मॉडल में बदल सकता है। लेकिन अगर चुनौतियों का समाधान नहीं हुआ, तो यह सरकार के लिए बोझ बना रह सकता है।